Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
हर माँ अपने बच्चे से बहुत प्यार करती है, लेकिन कभी-कभी बच्चों की शरारत, जिद या गलतियों से माँ को इतनी तकलीफ़ होती है कि गुस्से में ज़ुबान से बद्दुआ निकल जाती है। बाद में दिल को पछतावा भी होता है।
इसलिए इस बात को समझना बहुत ज़रूरी है कि बच्चे अल्लाह की दी हुई नेमत हैं। उनकी गलतियों पर उन्हें समझाना और सुधारना चाहिए, लेकिन गुस्से में उनके लिए बुरे शब्द या बद्दुआ कहने से बचना चाहिए। इसके बजाय माँ अगर अपने बच्चे के लिए दिल से दुआ करे, तो यही उसकी सबसे खूबसूरत कोशिश हो सकती है।
इस लेख में हम जानेंगे कि बच्चों को बद्दुआ देने से क्यों बचना चाहिए, माँ की दुआ की क्या अहमियत है और बच्चों की हिफाज़त के लिए कौन-से दुआ और नेक अमल किए जा सकते हैं।
बच्चा गलती करे, आपको तकलीफ पहुँचाए। जितना मर्जी सताये, किसी हाल में भी बच्चे को बद्दुआ न दें।
शैतान धोखा देता है, माँ के दिल में यह बात डालता है कि मैं दिल से बद्दुआ नहीं दे रही, बस ऊपर-ऊपर से कह रही हूँ। और इस धोखे में कई बार माँयें आ जाती हैं और ज़बान से बुरे अलफाज़ कह जाती हैं।
याद रखना यह औलाद अल्लाह की नेमत है। इसको बद्दुआयें देना नेमत की नाकद्री है। अल्लाह कितना करीम है हम जैसे नाकद्रों को भी नेमतें अता फरमा देता है।
उसकी कद्र कीजिये और उसको दुआयें दीजिये बल्कि ये तंग करें तो इसके बदले में आप दुआएँ दें। यह नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत है-
जो आसी को कमली में अपनी छुपा ले
जो दूशमन को भी ज़ख़्म खाकर दुआ दे
उसको और क्या नाम देगा ज़माना
वह रहमत नहीं है तो फिर और क्या है।
तो रहमत का तकाज़ा यही है, मुहब्बत का तकाज़ा यही है कि बच्चे चाहे जितनी भी तकलीफ पहुँचाएँ तो माँ आख़िरकार माँ होती है। किसी हाल में भी अपनी ज़बान से बद्दुआ न दे। बल्कि बच्चों के लिये खूब दुआएँ किया करे। रात की तन्हाईयों में अपनी नमाज़ों में अल्लाह से लौ लगाकर बैठा करे।
हज़रत मरियम अलैहस्सलाम के लिये उनकी माँ ने कितनी दुआएँ कीं। और फिर ये दुआयें करती रहें। यही नहीं कि बच्चे की पैदाईश हो गई तो दुआएँ बन्द कर दीं। कुरआन मजीद में है कि यह उसके बाद भी वे दुआएँ करती रही:
ऐ अल्लाह ! मैंने अपनी इस बेटी को और इसकी आने वाली नसल को शैतान मर्दूद के ख़िलाफ़ आपकी पनाह में दिया । तो गोया बच्ची छोटी है मगर माँ की मुहब्बत देखिये ।
सिर्फ इस बच्ची के लिये ही दुआएँ नहीं माँग रही बल्कि उसकी आने वाली नसलों के लिये भी दुआयें माँग रही हैं। अल्लाह रब्बुल्- इज्जत को माँ की यह बात इतनी पसन्द आई कि फ़रमायाः
अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त ने फिर उस बच्ची को क़बूल फरमा लिया और फिर उसकी तरबियत परवरिश तहजीब और इल्म ऐसी अच्छी फ़रमाई कि बहुत ही अच्छी।
तो यह माँ की दुआ थी और पालने वाला और तरबियत करने वाला तो हकीकत में अल्लाह रब्बुल् – इज़्ज़त है । वह बन्दे की तरबियत फरमाते हैं। तो माँ की दुआओं को कबूलियत हासिल है।इसलिये दुआ कीजिये ताकि बच्चे पर अल्लाह रब्बुल् – इज़्ज़त की ख़ास नज़र हो जाये।
एक अनमोल वजीफा है।
जब बच्चे सो रहे हों तो उन पर हिफाज़त का ‘हिसार’ (घेरा और दायरा ) जरूर बना लिया करें। हमारे बुजुर्गों ने एक हिफाज़त का हिसार बताया और उसकी इतनी बरकतें हैं, उन्होंने फ़रमाया कि मौत के सिवा कोई मुसीबत नहीं आ सकती।
मेरे पीर-व-मुर्शिद ने जब इस आजिज़ को इस हिसार की इजाज़त दी तो फरमाने लगे कि हमने इस हिसार को कई बार मरने वालों को जो कब्र में पहुँच चुके थे, उनके गिर्द भी बाँधा, तो कश्फ की नज़र से देखा कि अल्लाह ने उनको उस रात के कब्र के अज़ाब को माफ फरमा दिया।
तो यह बुजुर्गों की तरफ से बहुत ही कीमती अमल है और इस आजिज़ को इसकी इजाज़त है और आज यह आजिज़ सब सुनने वाले मर्द और औरतों को इजाज़त दे रहा है ताकि ये अल्लाह रब्बुल् इज्जत की हिफाज़त में आ जायें।
वह हिसार ( दायरा और घेरा) क्या है? वह यह है कि पहले दुरुद शरीफ पढ़ लिया करें, फिर अल्हम्दु शरीफ पूरी पढ़ लिया करें। फिर आयतुल कुर्सी पढ़ें और चारों कुल पढ़ें, आखिर में दुरूद शरीफ पढ़ लें।
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यानी अव्वल व आखिर में दुरूद शरीफ पढ़ना और दरमियान में सूरः फातिहा आयतुल कुर्सी और चारों कुल पढ़ना और यह सब कुछ पढ़कर अपने गिर्द, बच्चों के गिर्द, घर के गिर्द,
जहाँ बिज़नेस, दुकान दफ्तर वगैरह हो उन सबका तसव्वुर करके उनके गिर्द अपने तसव्वुर में एक दायरा बना दें जिस-जिस चीज़ के गिर्द आप दायरा बना देंगी, वे सब चीजें अल्लाह रब्बुल्- इज्जत की हिफाजत में आ जायेंगी।
अल्लाह के कलाम की हमने बड़ी बरकतें देखीं और सैकड़ों वाकिआत हैं अल्लाह रब्बुल – इज्जत की हिफाज़त के, जिनको बताने का अब मुनासिब वक्त नहीं है।
इसलिये इतना कह देना काफी है कि यह हिसार जिस दिन में और जिस रात में आप बच्चों के गिर्द बनायेंगी। आपके बच्चे फ़ितनों से, आफ्तों से, मुसीबतों से महफूज़ रहेंगे।
और जिस दिन कोई मुसीबत आनी होगी आप देखना कि आप इस अमल को भूल बैठेगीं। तब कोई मुसीबत आयेगी, वरना तो अल्लाह रब्बुल्-इज्जत की हिफाज़त में रहेंगे।
FAQ — बच्चों को बद्दुआ न देने और माँ की दुआ की अहमियत
1. क्या गुस्से में बच्चों को बद्दुआ देनी चाहिए?
नहीं। बच्चों की गलती पर उन्हें समझाना और सही रास्ता दिखाना बेहतर है। गुस्से में बद्दुआ देने के बजाय उनके लिए हिदायत और नेक होने की दुआ करनी चाहिए।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
2. अगर गुस्से में बच्चे को बद्दुआ निकल जाए तो क्या करें?
अल्लाह से माफी माँगें और बच्चे के लिए अच्छी दुआ करें। कोशिश करें कि दोबारा गुस्से में ऐसी बात ज़ुबान पर न आए।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
3. क्या माँ की दुआ बच्चे के लिए बहुत अहम है?
जी हाँ, माँ अपने बच्चे के लिए हमेशा भलाई, हिदायत, नेक सेहत और कामयाबी की दुआ करती रहे। दुआ अल्लाह से मदद माँगने का बहुत खूबसूरत ज़रिया है।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
4. बच्चे बहुत परेशान करें तो माँ क्या करे?
गुस्से में बद्दुआ देने के बजाय कुछ देर शांत हो जाएँ, बच्चे को समझाएँ और अल्लाह से उसके लिए हिदायत की दुआ करें।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
5. क्या बच्चों की हिफाज़त के लिए कुरआनी आयतें पढ़ी जा सकती हैं?
जी हाँ, कुरआन की तिलावत और मस्नून दुआओं के जरिए अल्लाह से बच्चों की हिफाज़त और भलाई माँगी जा सकती है।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
6. बच्चों के लिए कौन-सी दुआ करनी चाहिए?
माँ अपने शब्दों में भी दुआ कर सकती है—“या अल्लाह! मेरे बच्चों को नेक, ईमानदार और अच्छे अख़लाक़ वाला बना और उन्हें हर बुराई से महफूज़ फरमा।”Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
7. क्या बच्चे की गलती पर उसे डाँटना गलत है?
नहीं, बच्चे की गलती पर प्यार और समझदारी से उसे रोकना और सही-गलत समझाना ज़रूरी हो सकता है। लेकिन अपमान और बद्दुआ से बचना चाहिए।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
8. माँ को बच्चों के लिए कब दुआ करनी चाहिए?
किसी एक समय की पाबंदी नहीं। माँ नमाज़ के बाद, तहज्जुद में और अपनी सामान्य दुआओं में बच्चों के लिए हमेशा भलाई और हिदायत माँग सकती है।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
9. क्या बच्चे के सोने के समय उसके लिए दुआ की जा सकती है?
जी हाँ। बच्चे के लिए अल्लाह से हिफाज़त, सुकून और भलाई की दुआ करना अच्छी बात है।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
10. इस लेख का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
बच्चे अल्लाह की नेमत हैं। उनकी गलतियों पर उन्हें सुधारने की कोशिश करें और गुस्से में बद्दुआ देने के बजाय उनके लिए हिदायत, नेक ज़िंदगी और अल्लाह की हिफाज़त की दुआ करें।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Bachchon Ko Kabhi Badddua Mat Dena
जज़ाकल्लाह खैर….
