09/08/2026
1786182688561

माँ-बाप को कभी दुख मत देना! उनकी ख़िदमत का ऐसा सिला कि दिल छू जाएगा |Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena! Unki Khidmat Ka Aisa Sila Ki Dil Chhoo Jayega amazing story

Share now
Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!
Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

माँ-बाप हमारे लिए अल्लाह तआला की बहुत बड़ी नेमत हैं। बचपन में उन्होंने हमारी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखा, हमें प्यार दिया और हर मुश्किल में हमारा साथ दिया। लेकिन जब वही माँ-बाप बूढ़े हो जाएँ और उन्हें हमारी ज़रूरत पड़े, तो उस समय उनकी ख़िदमत करना हमारी बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है।

कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने माँ-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म दिया है और यहाँ तक फ़रमाया कि उनके सामने “उफ़” तक न कहना। इसलिए हमें उनकी बातों में सब्र करना, उनसे अदब से पेश आना और उनकी ख़ुशी का ख्याल रखना चाहिए।

आइए इस आर्टिकल में जानते हैं कि माँ-बाप का इस्लाम में क्या मक़ाम है और उनकी ख़िदमत के बारे में कुरआन और हदीस में क्या तालीम दी गई है।

अल्लाह रब्बुल-इज्ज़त नें इरशाद फ़रमाया कि- तुम अपने माँ-बाप के साथ अच्छा बर्ताव किया करो। अगर तुम्हारे सामने उनमें एक या दोनों बूढ़े हो जायें तो उनके सामने ‘हूँ’ भी न करना।

और न उनको झिड़कना और उनसे अदब के साथ बात करना और उनके सामने आजिज़ी से झुके रहना और उनके लिए यूँ दुआ करते रहना कि ऐ मेरे रब उन दोनों पर रहमत फ़रमाइए जैसा कि उन्होंने मुझको बचपन में पाला है।

और हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि जो शख्स अपने माँ-बाप को तकलीफ़ देगा, जन्नत उस पर हराम है। माँ-बाप को खुश रखना, अल्लाह तआला को खुश रखना है और उनको नाराज़ करना अल्लाह तआला को नाराज़ करना है।

एक दिन नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हल्काये असहाब में यह लफ़्ज़, दोहराये तीन बार कि नाक उसकी कट गयी। असहाब ने अर्ज़ की कि वह कम्बख्त है कौन, तौक़ीर जिसकी हज़रते बारी में घट गयी।

इरशाद यूँ हुआ कि वह फ़रज़न्द नाख़लफ़, घर जिसके जन्नत आयी, आकर पलट गयी। माँ-बाप के बुढ़ापे का न हो जिसे खयाल, उस ना सईद बेटे की क़िस्मत उलट गयी।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में एक शख्स ने अर्ज़ की- या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! मुझे कोई ऐसी नसीहत कीजिए जो दुनिया व आखिरत में काम आये। आपने फ़रमाया- तुम्हारे माँ-बाप ज़िन्दा है ? कहा हाँ ,हज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- तुम उनकी खिदमत किया करो। उनको एक लुकमा खिलाने के बदले तुमको जन्नत में एक महल मिलेगा।

एक और शख्स ने अर्ज़ की— या रसूल अल्लाह। मैं अपनी माँ की खिदमत भी करता हूँ। रोटी कपड़ा भी देता हूँ। मगर वह मुझसे लड़ती रहती है। अब जो आपका हुक्म हो वह करूँ।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया— तुम अपनी माँ की खिदमत करो। क़सम है अल्लाह तआला की अगर तुम अपने बदन का गोश्त का टुकड़ा भी अपनी माँ को खिला दोगे तो चौथाई हक़ भी उसका अदा न होगा। क्या तुमको मालूम नहीं कि जन्नत माँ और बाप के क़दमों के नीचे है।

माँ-बाप का यह मर्तबा सुनकर उस शख्स ने रोकर कहा, या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! आप सच फ़रमाते हैं क़सम है मुझको उस खुदा की जिसने आपको सच्चा रसूल बनाया है! अब मैं अपनी माँ की खूब ताबेदारी करूंगा। बस वह अपनी माँ के पास आया और उसके पाँव चूम कर कहा,

अम्मी जान! मुझको अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यही हुक्म दिया है कि अपनी माँ की खिदमत करो और उसको राजी रखो। माँ ने खुश होकर बेटे को गले से लगा लिया और अल्लाह व रसूल की तारीफ़ की,

पिसर माँ-बाप का लखते जिगर है,सरूरे जिस्म व जाँ नूरे नज़र है। अगर दम भर न वह उनको नज़र आये, जहाँ उनके लिए तारीक हो जाये।जुदा गर उनसे बेटा एक दम हो,जुदाई में बहुत-सा उनको ग़म हो।

ये भी पढ़ें: अधूरा बच्चा भी माँ-बाप को जन्नत में ले जाएगा | सब्र करने वालों के लिए हदीस में बड़ी खुशखबरी|

अगर बेटे पे कोई सदमा आ जाये, पदर-ए-मादर के तन से जां निकल जाये,पिलाया दूध अपना तुमको माँ ने, खिलाये बाप ने माकूल खाने,लड़कपन से बड़ा तुमको किया है, जवाने खुश अदा तुम को किया है।

तुम उनके वास्ते नूरे बसर हो, सरापा रहमते जान व जिगर हो। तुम्हे इल्मो हुनर सिखला दिया है, पहुँचाना था जहाँ पहुँचा दिया है।वह खिदमत तुम्हारी करते रहे हैं.तुम्हारे वास्ते मरते रहे हैं।

जब ऐसा हक़ है माँ और बाप का,करो तुम ऐ पिसर हक़ उनका अदा । ज़बां पर लाओ मत ऐसी हिकायत, करे मादर पदर जिससे शिकायत । करोगे जो ख़िदमत माँ-बाप की, दोनों जहाँ में इज़्ज़त तुमको मिलेगी।Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

FAQ – माँ-बाप की ख़िदमत और उनका हक़

सवाल 1: इस्लाम में माँ-बाप का क्या मक़ाम है?
जवाब: इस्लाम में माँ-बाप का बहुत ऊँचा मक़ाम है। कुरआन में अल्लाह तआला ने अपनी इबादत के साथ माँ-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म दिया है। (सूरह अल-इसरा 17:23)Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

सवाल 2: क्या माँ-बाप के सामने “उफ़” कहना भी मना है?
जवाब: जी हाँ। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर माँ-बाप में से एक या दोनों बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें “उफ़” तक न कहो और न उन्हें झिड़को। (सूरह अल-इसरा 17:23)Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

सवाल 3: माँ-बाप से कैसे बात करनी चाहिए?
जवाब: उनसे अदब और नरमी से बात करनी चाहिए। कुरआन में उनके सामने आजिज़ी से झुकने और उनके लिए रहमत की दुआ करने की भी तालीम दी गई है। (सूरह अल-इसरा 17:23-24)Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

सवाल 4: माँ-बाप के लिए कौन-सी दुआ करनी चाहिए?
जवाब: कुरआन में यह दुआ सिखाई गई है:
“रब्बिर हम्हुमा कमा रब्बयानी सगीरा।”
अर्थ: “ऐ मेरे रब! उन दोनों पर रहमत फ़रमा, जैसे उन्होंने मुझे बचपन में पाला।” (सूरह अल-इसरा 17:24)Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

सवाल 5: क्या माँ की ख़िदमत का खास महत्व है?
जवाब: जी हाँ। सहीह हदीस में एक सहाबी ने पूछा कि मेरे अच्छे व्यवहार का सबसे ज़्यादा हक़दार कौन है? नबी ﷺ ने तीन बार “तुम्हारी माँ” फ़रमाया, फिर चौथी बार “तुम्हारे पिता” फ़रमाया। (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

सवाल 6: अगर माँ-बाप नाराज़ रहते हों तो क्या उनकी ख़िदमत करनी चाहिए?
जवाब: जी हाँ, जहाँ तक जायज़ हो, उनकी ख़िदमत और अच्छा व्यवहार जारी रखना चाहिए। लेकिन अगर वे किसी गुनाह का हुक्म दें, तो उस गुनाह में उनकी बात नहीं मानी जाएगी। फिर भी उनके साथ दुनिया के मामलों में अच्छा व्यवहार किया जाएगा। (सूरह लुक़मान 31:15)Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

सवाल 7: क्या माँ-बाप की मौत के बाद भी उनके लिए कुछ किया जा सकता है?
जवाब: जी हाँ। उनके लिए दुआ और इस्तिग़फ़ार करना, उनके जायज़ वादे पूरे करना और उनके दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करना नेकी के काम हैं।Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

सवाल 8: माँ-बाप की ख़िदमत से हमें क्या सीख मिलती है?
जवाब: सबसे बड़ी सीख यह है कि माँ-बाप की उम्र बढ़ने पर उनसे बे-रुखी नहीं, बल्कि और ज्यादा प्यार, सब्र और अदब से पेश आना चाहिए। उनकी ख़िदमत को बोझ नहीं बल्कि नेकी और सवाब का मौक़ा समझना चाहिए।Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Maa-Baap Ko Kabhi Dukh Mat Dena!

जज़ाकल्लाह खैर….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *