Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
कुरआन मजीद अल्लाह तआला का पाक कलाम है, इसलिए इसे सही तरीके से समझना हर मुसलमान के लिए बेहद ज़रूरी है। लेकिन क्या सिर्फ़ अरबी जान लेने से कुरआन का सही मतलब समझा जा सकता है? या फिर कुरआन को समझने के लिए नबी-ए-करीम ﷺ की हदीस, सहाबा-ए-किराम की तालीम और सही तफ़्सीर का सहारा लेना भी ज़रूरी है?
इस आर्टिकल में हम कुरआन और सही हदीस की रोशनी में जानेंगे कि कुरआन को सही समझने का असली तरीका क्या है, अपनी राय से तफ़्सीर करना क्यों ख़तरनाक हो सकता है, और इस्लाम ने हमें कुरआन समझने के लिए कौन-सा सही रास्ता बताया है। अगर आप कुरआन को सही मायनों में समझना चाहते हैं, तो इस लेख को आखिर तक ज़रूर पढ़ें।
इस किताब को नाज़िल करने वाला ख़ुद परवदिगार है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने बारे में इरशाद फ़रमाते हैं उससे ज़्यादा सच्ची बात भला किस की हो सकती है। दूसरी जगह फ़रमाया कह दीजिए अल्लाह ने सच कहा है। लिहाज़ा जिस ज़ात का यह कलाम है वह सबसे ज़्यादा सच्ची जात है।
इस कलाम को आगे पहुँचाने वाले जिब्राईल अलैहिस्सलाम हैं जिनकी अमानत व दयानत की गवाही खुद अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त युं कह रहे हैं अमानत कहते है कि अगर कोई चीज़ किसी ने सुपुर्द की हो तो उसे हू-बहू आगे पहुँचा देना।
लिहाज़ा इस आयत में अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त ने जिब्राईल अमीन की सदाक्त व अमानत की गवाही खुद दी है। जिस हादी बरहक रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह कलाम अता किया गया उनके बारे में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं आप तो अख़लाक़ के आला मर्तबे पर फाएज़ हैं।
यह वह ज़ात है जिसकी आँख ऐब से पाक है। लिहाज़ा फ़रमाया जो अपनी मर्जी से लब कुशाई नहीं फरमाते वह अपनी ख़्वाहिश से नहीं बोलते। किस्सा मुख़्तसर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त भी सच्चे, लाने वाले जिब्राईल अमीन भी सच्चे और साहिबे क़ुरआन पैग़म्बरे इस्लाम भी सच्चे। बस सच्चे का कलाम, सच्चे के ज़रिए, सच्चे तक पहुँचा।
कुरआन मजीद अल्लाह तआला की अमानत है परवरदिगार की यह अमानत उसके बंदों तक ठीक-ठीक पहुँच चुकी है। जिस तरह ये अल्फाज़ अल्लाह तआला ने नाज़िल फरमाएं हैं उसी तरह इसके मायने भी अल्लाह तआला ने बयान फ़रमा दिए हैं। लिहाज़ा ‘वही’ नाज़िल होने के इब्तिदाई दौर में जब क़ुरआनी आयतें उतरती थीं।
तो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम याद करने में जल्दी फ़रमाते थे। अल्लाह तआला ने इर्शाद फ़रमाया ! आप अपनी ज़बान को जल्दी न हिलाइए। कुरआन का जमा करवाना हमारे ज़िम्मे हैं।
कुरआन मजीद का जमा करवाना भी अल्लाह तआला ने अपने ज़िम्मे ले लिया और इसका बयान करना भी अपने ज़िम्मे ले लिया। यह नुक्ता बड़ा अहम है। जिस तरह कुरआन मजीद के अल्फाज़ अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त की ज़िम्मेदारी से उसके बंदों तक पहुँचे है।
उसी तरह उनके मायने व मतलब भी अल्लाह तआला के महबूब ने अल्लाह तआला के हुक्म से पहुँचा दिए। अब क़ुरआन दो तरह से हमारे पास मौजूद है। उसके अल्फाज़ भी ‘वही’ उसके मायने भी ‘वही’। किसी वंदे को यह इजाज़त नहीं है कि कुरआन मजीद को पढ़कर अपनी तबियत से माइने निकाले क्योंकि साहिबे कलाम ही अपने कलाम को बेहतर समझता है।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
यह कहाँ का इंसाफ है कि बात किसी और की हो और मुराद हम अपनी बयान करते फिरें। लिहाज़ा अल्फ़ाज़ भी वही एतेबार के काबिल हैं जो अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त ने नाज़िल फरमाए और मायने भी वही बेहतर एतिबार के काबिल जो अल्लाह तआला के महबूब ने बताए ।
कुरआन के समझने में गलती आजकल कुछ लोग अरबी दानी के नशे में क़ुरआन मजीद में अपनी मंशा ढूंढना शुरू कर देते हैं हालाँकि क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला की मंशा ढूंढना चाहिए किसी बंदे की मंशा को नहीं। जिसने यह नुक्ता समझ लिया वह आजकल के बड़े-बड़े फितनों से महफूज़ हो गया क्योंकि कुरआन मजीद के माइने अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त ने खुद अपने महबूब के ज़रिए अपने बंदों तक पहुँचा दिए हैं।
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अब कुरआन की तफ्सीर वही कहलाएगी जो सहाबा किराम ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सीखी और यूँ ऊपर से नीचे तक उम्मत में चली आई हो। लिहाज़ा जो उलूम नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि से हमें मिल चुके हैं उन्हीं उलूम को आगे पहुँचाने का नाम तफ़्सीर है।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
FAQ (सवाल व जवाब)
1. कुरआन को सही तरीके से कैसे समझें?
कुरआन को सही तरीके से समझने के लिए कुरआन की तफ़्सीर, सही हदीस और सहाबा-ए-किराम के समझाए हुए मायनों को अपनाना चाहिए। अपनी राय से तफ़्सीर करना सही तरीका नहीं है।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
2. क्या सिर्फ़ अरबी जानने से कुरआन समझा जा सकता है?
नहीं। अरबी भाषा जानना मददगार है, लेकिन कुरआन के सही मायने वही हैं जो अल्लाह के रसूल ﷺ ने बयान फ़रमाए और सहाबा-ए-किराम ने सीखे व आगे पहुँचाए।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
3. क्या अपनी समझ से कुरआन की तफ़्सीर करना सही है?
नहीं। इस्लामी उलमा ने हमेशा यही बताया है कि कुरआन की तफ़्सीर कुरआन, सही हदीस और सहाबा-ए-किराम की समझ के मुताबिक ही करनी चाहिए।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
4. कुरआन के मायने सबसे बेहतर कौन समझा सकता है?
सबसे बेहतर मायने अल्लाह के रसूल ﷺ ने बताए। इसके बाद सहाबा-ए-किराम, ताबेईन और भरोसेमंद मुफस्सिरीन की तफ़्सीर पर भरोसा किया जाता है।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
5. क्या हर मुसलमान के लिए कुरआन सीखना ज़रूरी है?
जी हाँ। हर मुसलमान को कुरआन पढ़ने, उसका सही मतलब समझने और उसकी शिक्षाओं पर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
6. कुरआन समझने के लिए कौन-सी चीज़ें ज़रूरी हैं?
कुरआन, सही हदीस, सहाबा-ए-किराम की तालीम, भरोसेमंद तफ़्सीर की किताबें और अहले-सुन्नत के उलमा से इल्म हासिल करना ज़रूरी है।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
7. कुरआन और हदीस का आपस में क्या रिश्ता है?
हदीस, कुरआन की तशरीह (व्याख्या) करती है। बहुत से अहकाम और मसाइल की पूरी समझ हमें हदीस शरीफ़ से मिलती है।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
8. इस लेख का मुख्य संदेश क्या है?
मुख्य संदेश यह है कि कुरआन को अपनी राय से नहीं, बल्कि कुरआन, सही हदीस और सहाबा-ए-किराम की रोशनी में समझना चाहिए। यही तरीका इंसान को सही दीन की समझ और गुमराही से बचाता है।Quran Ko Sahi Samajhne Ka Tariqa
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
