Goad Lekar Beta Banana Islam Mein Kaisa Hai?
गोद लेकर किसी बच्चे को अपना बेटा या बेटी बनाना आज हमारे समाज में एक आम बात है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस्लाम में गोद लिए हुए बच्चे का क्या हुक्म है? क्या उसे अपने सुल्बी बेटे की तरह अपना नाम और नसब दिया जा सकता है? और क्या गोद लिए हुए बेटे की बीवी से निकाह हमेशा के लिए हराम हो जाती है?
इन सवालों को समझने के लिए हमें रसूलुल्लाह ﷺ के ज़माने के एक बेहद अहम और दिलचस्प वाक़िए को समझना होगा—हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु का वाक़िआ। हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु को नबी-ए-करीम ﷺ ने आज़ाद फ़रमाया और अपनी सरपरस्ती में रखा। उस दौर में लोग उन्हें मुंह बोला बेटा समझते थे और इसी वजह से उन्हें “ज़ैद बिन मुहम्मद” भी कहा जाने लगा।
फिर अल्लाह तआला ने कुरआन-ए-करीम के ज़रिए नसब के बारे में साफ़ हिदायतें नाज़िल फ़रमाईं और जाहिलियत की उस रस्म को खत्म किया गया जिसमें मुंह बोले बेटे को हक़ीक़ी बेटा समझा जाता था।
इस वाक़िए में हमारे लिए नसब, रिश्तों, सरपरस्ती और अल्लाह के हुक्म के सामने सर झुका देने के बारे में बहुत बड़ी नसीहतें छिपी हुई हैं। आइए, हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु का यह अहम वाक़िआ तफ़्सील से समझते हैं और जानते हैं कि इस्लाम ने गोद लिए हुए बच्चों के बारे में क्या खूबसूरत और इंसाफ़ पर आधारित उसूल बताए हैं।
गोद लेकर बेटा बनाना
जाहिलियत की रस्मों में से एक रस्म ‘तबन्ना’ भी है। यह रस्म किसी न किसी शक्ल में हर मुल्क में पाई जाती रही है, बल्कि हिंदुओं में आज भी मौजूद है। यह रस्म हसब-नसब से ताल्लुक़ और समाजी निज़ाम, दोनों लिहाज से ख़राब और फ़ितरत के ख़िलाफ़ है। इस रस्म के ख़त्म करने के लिए अल्लाह तआला ने जिस वाक़िए को चुना, वह इस तरह है-
हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु
हज़रत ज़ैद बिन हारिस बिन शुरहबील अरब के इज़्ज़तदार क़बीला बनी कलब के एक आदमी थे और एक हादसे की वजह से बचपन ही में गुलाम बना लिए गए और उकाज़ के बाजार में हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा के भतीजे हकीम बिन हिज़ाम ने उनको अपनी फूफी के लिए ख़रीद लिया। ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जीवन-साथी होने के बाद उनको हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में हिबा कर दिया।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनको आज़ाद कर के अपना बेटा बना लिया और उसी दिन से लोग बाग जैद को इब्ने मुहम्मद कहने लगे। इत्तिफ़ाक़ की बात कि बनी कलब के कुछ लोग हज की नीयत से मक्का आए तो जैद को पहचान लिया। जैद के बाप हारिसा और उनके भाई काब को जब यह मालूम हुआ तो वह मक्का आए और हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज़ किया, अब जैद को हमारे हवाले कर दीजिए और फ़िदए की रकम ले लीजिए।
हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, ‘इससे बेहतर यह बात है कि जैद आ जाएं और उसके सामने ये दोनों शक्लें रख दी जाएं, वह तुम्हारे साथ जाना कुबूल करता है या मेरे साथ रहना चाहता है और जो उसकी मर्जी हो, उस पर हम भी राजी हो जाएं।’
हारिसा खुशी-खुशी इस पर राजी हो गए, क्योंकि वह यक़ीन रखते थे कि बेटा बहरहाल बाप ही को तर्जीह देगा। चुनांचे जैद बुलाए गए। जाते अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मालूम किया, इनको पहचानते हो?
जैद ने कहा, ‘क्यों नहीं, यह मेरे वालिद हैं और यह मेरे चचा हैं।’ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, ‘ये लेने आए हैं। अब तुम मुख्तार हो, इनके साथ चले जाओ या मेरे पास रहो।’
जैद ने अर्ज किया, ‘मैं आप पर किसी को तर्जीह नहीं दे सकता। मेरे बाप चचा जो कुछ भी हैं, आप ही हैं।’
हारिसा ने यह सुना तो रंज व तक्लीफ़ के साथ कहा, ‘जैद ! किस कदर अफ़सोस है तुझ पर कि गुलामी को आज़ादी पर और बाप-दादा और ख़ानदान पर अजनबी को तर्जीह दे रहा है।’
जैद ने कहा, ‘इस हस्ती के साथ रह कर मेरी आंखों ने जो कुछ देखा है, उसके बाद मैं दुनिया और उसकी हर चीज़ को उसके सामने हेच समझता हूं।’
तब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हारिसा और हाज़िरीन को बतलाया कि मैं ने जैद को आज़ाद कर दिया है। अब वह मेरा गुलाम नहीं, बल्कि बेटा है। हारिसा ने यह सुना तो बहुत खुशी जाहिर की और बाप और चचा दोनों मुतमइन वापस हो गए और कभी-कभी आकर देख जाते और आंखें ठंडी कर लिया करते थे।
तिर्मिजी की एक मुख्तसर रिवायत में हारिसा की जगह उसके दूसरे बेटे हबला के आने और नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ ऊपर की बातचीत का जिक्र हुआ है।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत जैद की मजीद क़द्रअफ़ज़ाई के लिए उनका निकाह अपनी दूध पिलाई उम्मे ऐमन के साथ कर दिया, जिसके पेट से हजरत उसामा पैदा हुए और उसके बाद इरादा किया कि उनकी शादी अपनी फुफेरी बहन जैनब बिन्त जहश के साथ कर दें। यह हाशमी ख़ानदान की बेटी और आपकी फूफी उमैया बिन्त अब्दुल मुत्तलिब की बेटी थीं, इसलिए जैनब और जैनब के भाई इस निकाह पर राजी नहीं थे, तब अल्लाह की वह्य ने नाज़िल होकर यह हुक्म दिया कि जिस बात का हुक्म अल्लाह और उसका रसूल दे, फिर उसकी ख़िलाफ़वर्जी किसी के लिए जायज नहीं है।
तर्जुमा-‘जब अल्लाह और उसका रसूल कोई फ़ैसला कर दे, तो फिर किसी मोमिन मर्द और औरत को उनके मामले में कोई अख्तियार बाकी नहीं रहता और जो आदमी अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे, बेशक वह खुली गुमराही में पड़ गया।(33-36)
वही के नाज़िल होने पर हज़रत जैनब और उसके भाइयों ने आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फ़ैसले के सामने सर झुका दिया और इस तरह आपने ख़ानदान से ही अमली तौर पर नसब पर फ़खर करने की जड़ काट दी, ताकि आपका अमल नमूना बने।
हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु का सबसे बड़ा शरफ़ यह है कि कुरआन में उनका नाम खुलकर आया है। यह शरफ़ रसूल के किसी सहाबी को नसीब नहीं हुआ।
बेटा बनाने की रस्म की रोकथाम
हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा अगरचे निकाह बंधन में जकड़े हुए थे, लेकिन हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा का यह फ़ितरी रुझान मिट न सका कि वह कुरैशी हाशमी हैं और उनका शौहर आज़ाद किया हुआ गुलाम। इसी तरह हज़रत ज़ैद को यह फ़क्ष हासिल था कि वह बहरहाल अरब के मुअज़्ज़ज़ क़बीले के फ़र्द और नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुंह बोले बेटे हैं और जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा पर उनको क़व्वाम (सरदार) होने का शरफ़ हासिल है।
चुनांचे इन आपसी टकराव वाली ज़ेहनियतों ने उनके आपस में मुहब्बत का रिश्ता क़ायम न होने दिया और आख़िरकार जैद इस पर तैयार हो गए कि हज़रत जैनब को तलाक़ दे दें। हज़रत ज़ैद ने कई बार इस इरादे का जिक्र हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से किया, लेकिन आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह समझ कर कि शायद देर या मुद्दत का ज़्यादा हो जाना मुहब्बत के बढ़ने की वजह बने, जैद को तलाक़ देने से रोका।
हज़रत जैद और हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा की नाचाक़ी ने अब सूरतेहाल बदल दी और अल्लाह की वह्य ने यह फ़ैसला कर दिया कि वक़्त आ गया है कि अब बेटा बनाने की बुरी रस्म ख़त्म कर दी जाए और जिस तरह हसब-नसब के फ़न के पहलू को अपने ख़ानदान ही में सबसे पहले तोड़ा, उसी तरह इसकी शुरूआत भी ख़ुद जाते अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ही अमल से हो और यह इस तरह कि जैद रज़ियल्लाहु अन्हु जब तलाक़ दे दें तो फिर जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह आप से हो जाए, क्योंकि इससे एक तरफ़ जैनब और उनके ख़ानदान को जो सदमा पहुंचे, उसे दूर किया जा सके और दूसरी ओर गोद लिए बेटे की बुरी रस्म की रोकथाम हो सके।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जब वह्य इलाही ने यह नक़्शा बतलाया, तो एक बशर होने के नाते आपके दिल में यह जज़्बा पैदा हुआ कि जैद अगर जैनब को तलाक़ न दें तो अच्छा है ताकि जैनब के ख़ानदान को भी तौहीन महसूस न हो और मैं भी मुनाफ़िक़ों और मुश्रिकों के इस ताने से बचा रहूं कि वे यह कहेंगे, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने बेटे की बीवी को अपनी बीवी बना लिया, हालांकि दूसरों के लिए बेटे की बीवी को हराम बताते हैं।
चुनांचे आप बराबर जैद को तलाक़ से बाज़ रखते रहे, मगर जब किसी तरह आपस में निभ न सकी तब जैद ने तलाक़ दे ही दी और इद्दत गुज़रने पर ख़ुदा का हुक्म हुआ कि अब आप जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा को अपनी बीवी बनाएं ताकि आगे मुंह बोले बेटे की रस्म का खात्मा हो और मुसलमानों के समाज में यह तंगी न पैदा हो सके कि मुंहबोले बेटे की बीवी के निकाह को सुलबी बेटे की बीवी की तरह हराम समझा जाए और साथ ही अल्लाह तआला की वह्य ने यह भी वाजेह कर दिया कि ख़ुदा जो फ़ैसला कर चुका है वह तो ज़ाहिर होकर ही रहेगा और तुम्हारे बशरी ख़ौफ़ से वह टलने वाला नहीं है और सच भी यह है कि अल्लाह के हुक्म के मुक़ाबले में इंसानी समाज का डर बिल्कुल बेकार की बात है।
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कुरआन ने मुंह बोले बेटे की रोकथाम के मामले को दो हिस्सों में बांट दिया है कि एक ज़ेहनी व इल्मी इंक़िलाब और दूसरा अमली, चुनांचे जेहनी इस्लाह व इंक़िलाब के लिए नीचे लिखी आयतें नाज़िल फ़रमाईं –
तर्जुमा – ‘और अल्लाह ने तुम्हारे मुंह बोले बेटों को तुम्हारा (हक़ीक़ी बेटा) नहीं बना दिया। यह क़ौल तुम्हारे अपने मुंह की बात है और अल्लाह सच बात कहता है और वही सीधी राह दिखाता है। तुम इन मुंह बोले बेटों को उनके (हक़ीक़ी) बापों की निस्बत से पुकारा करो। यही अल्लाह के नज़दीक इंसाफ़ का तरीक़ा है और अगर तुमको उनके बाप-दादों के नाम मालूम न हों तो वे तुम्हारे दीनी भाई हैं और तुम्हारे दोस्त हैं।’ (33 : 3-4)
चुनांचे सहाबा रजि० साफ़ करते हैं कि हमने उसी वक़्त से हज़रत जैद को इब्ने मुहम्मद कहना छोड़ दिया और जैद बिन हारिसा कहने लगे।
और बेटा बनाने के अमली पहलू की रोकथाम को रोशन करने के लिए ये आयतें उतरीं –
तर्जुमा – ‘और (वह वक़्त ज़िक्र के क़ाबिल है) जब तुम उस आदमी से कहते थे, जिस पर अल्लाह ने और तुमने इनाम किया कि अपनी बीवी को रोके रख और तलाक़ न दे और अल्लाह से डर और सूरते हाल यह थी कि तुम अपने जी में इस बात को छिपाए हुए थे जिसको अल्लाह ज़ाहिर करने वाला था। तुम लोगों के तान व तंज़ से डरते थे और अल्लाह ज़्यादा हक़दार है कि उससे डरा जाए,
सो जब ज़ैद अपनी ज़रूरत पूरी कर चुका और उसने तलाक़ दे दी तो हमने उस जैनब का निकाह तुझसे कर दिया ताकि आगे मुसलमानों पर तंगी न रहे कि वह अपने मुंह बोले बेटों की बीवियों से निकाह कर सकें। जब उनके मुंह बोले बेटे अपनी हाजत पूरी कर लें यानी तलाक़ दे दे और अल्लाह का यह हुक्म अटल है।'(33-37)
कुरआन की इन आयतों का मतलब अपने मुताल्लिक़ मस्अले के साथ इतना साफ़ और खुला हुआ है कि उसमें किसी दूसरे मतलब की गुंजाइश तक नहीं और न किसी क़िस्म की कोई पेचेदगी ही है कि जो मामले के रुख को किसी दूसरी ओर फेरने की वजह हो इसलिए मुनासिब समझते हैं कि इस मामले से मुताल्लिक़ खुराफ़ाती दास्तान से बिल्कुल ही आंखें फेर ली जाएं।
सबक़ और नसीहत
इस बात के बावजूद कि पैग़म्बर व रसूल इस हक़ीक़त से आशना होते और उस पर यक़ीन रखते हैं कि अल्लाह का फ़ैसला अटल और रद्द करने के क़ाबिल नहीं होता है, फिर भी अगर कोई बात ऐसी हो जिसमें उनकी जात वक़्त के खुद के गढ़े हुए अख़लाक़ी पहलू की बुनियाद पर तान व तंज़ की वजह बनती हो, तो बशर के तक़ाज़े की बुनियाद पर वे उसकी मार से बचे रहने की कोशिश करते हैं और उम्मीद करते हैं कि अल्लाह तआला जिस भले मक़्सद के लिए ऐसी सूरत पैदा करना चाहता है, काश वह किसी ऐसी शक्ल में ज़ाहिर हो कि उनके इस तान व तंज़ से बच जाए, लेकिन जबकि ख़ुदा की मस्लहत इसी ख़ास सूरत में छिपी होती है तो वक़्त आने पर नबी व रसूल अपनी जाती ख़्वाहिश को पीठ पीछे डाल कर ख़ुदा के फ़ैसले पर सर झुका देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. क्या इस्लाम में बच्चा गोद लेना जायज़ है?
जी हाँ, किसी अनाथ या बच्चे की किफ़ालत और परवरिश करना बहुत नेक काम है। लेकिन गोद लिए हुए बच्चे को हक़ीक़ी औलाद समझकर उसका नसब बदलना जायज़ नहीं है।
2. गोद लिए हुए बच्चे को अपने नाम से जोड़ना कैसा है?
इस्लाम में बच्चे का असली नसब मालूम हो तो उसे उसके हक़ीक़ी वालिद के नाम से ही पुकारना चाहिए। कुरआन-ए-करीम में भी नसब की हिफ़ाज़त का हुक्म दिया गया है।
3. हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु कौन थे?
हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु रसूलुल्लाह ﷺ के बहुत करीबी सहाबी थे। उन्हें नबी-ए-करीम ﷺ ने आज़ाद फ़रमाया और अपनी सरपरस्ती में रखा था।
4. क्या हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु को नबी ﷺ ने अपना बेटा बनाया था?
जाहिलियत के उस दौर के रिवाज के मुताबिक़ उन्हें मुंह बोला बेटा माना गया था। लोग उन्हें “ज़ैद बिन मुहम्मद” कहने लगे थे। बाद में कुरआन-ए-करीम ने साफ़ कर दिया कि मुंह बोला बेटा हक़ीक़ी बेटा नहीं बन जाता और हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु को उनके असली वालिद की तरफ़ मंसूब करके ज़ैद बिन हारिसा कहा जाने लगा।
5. इस्लाम ने मुंह बोले बेटे की रस्म क्यों खत्म की?
इस्लाम ने नसब की हिफ़ाज़त और रिश्तों की सही पहचान के लिए इस रस्म को खत्म किया। किसी बच्चे की मोहब्बत, परवरिश और किफ़ालत अपनी जगह बहुत अच्छी है, लेकिन उसे हक़ीक़ी बेटे की तरह नसब देना अलग मामला है।
6. क्या गोद लिया हुआ बच्चा महरम बन जाता है?
सिर्फ़ गोद लेने से बच्चा महरम नहीं बन जाता। अगर शरई तौर पर रज़ाअत का रिश्ता कायम हो जाए तो उसके अलग अहकाम होते हैं। वरना बड़े होने के बाद गैर-महरम होने के अहकाम का लिहाज़ करना पड़ता है।
7. क्या गोद लिए हुए बेटे को विरासत में हिस्सा मिलता है?
गोद लिया हुआ बच्चा अपने-आप हक़ीक़ी औलाद की तरह फ़राइज़ में वारिस नहीं बनता। हालांकि उसके लिए वसीयत की जा सकती है और अपनी ज़िंदगी में हिबा भी किया जा सकता है, शरई उसूलों के मुताबिक़।
8. हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु का नाम कुरआन में क्यों आया?
हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु को यह ख़ास शरफ़ हासिल है कि कुरआन-ए-करीम में उनका नाम साफ़ तौर पर आया है। सूरह अल-अहज़ाब में उनके वाक़िए का ज़िक्र मिलता है।
9. हज़रत ज़ैद और हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हुमा का निकाह क्यों हुआ?
रसूलुल्लाह ﷺ के ज़रिए हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह कराया गया। इसके ज़रिए नसब और जाहिलियत की सामाजिक सोच के बारे में एक अहम अमली मिसाल क़ायम हुई।
10. हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह नबी ﷺ से क्यों हुआ?
हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु से तलाक़ के बाद, अल्लाह तआला के हुक्म से हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह नबी-ए-करीम ﷺ से हुआ। इससे यह बात साफ़ हुई कि मुंह बोला बेटा हक़ीक़ी सुल्बी बेटे की तरह नहीं होता और उसके तलाक़ के बाद उसकी पूर्व पत्नी से निकाह को हक़ीक़ी बेटे की पत्नी जैसा हराम नहीं समझा जाएगा।
11. क्या इस्लाम अनाथ बच्चों की परवरिश से रोकता है?
बिल्कुल नहीं। इस्लाम तो यतीमों की किफ़ालत, उनकी परवरिश और उनके साथ हुस्न-ए-सुलूक की बहुत ताकीद करता है। रोक उस चीज़ से है जिसमें बच्चे का असली नसब मिटाकर उसे हक़ीक़ी औलाद की तरह पेश किया जाए।
12. इस वाक़िए से हमें क्या सबक़ मिलता है?
इस वाक़िए से सबसे बड़ा सबक़ यह मिलता है कि अल्लाह तआला के हुक्म के सामने इंसानी रस्मों और समाजी दबाव की कोई हैसियत नहीं। साथ ही हमें नसब की हिफ़ाज़त, रिश्तों की सही पहचान और बच्चों की किफ़ालत का ख़याल रखना चाहिए।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
खुदा हाफिज़ ….
