Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
इस्लामी तारीख़ में कुछ ऐसे वाक़िआत भी गुज़रे हैं जो इंसान को सिर्फ़ हैरत में नहीं डालते, बल्कि उसके सामने नीयत, निफ़ाक़ और अल्लाह की रज़ा का असल मयार भी साफ़ कर देते हैं। मस्जिदे ज़रार का वाक़िआ उन्हीं में से एक है।
ज़ाहिर में तो यह एक मस्जिद थी, जहां नमाज़ पढ़ने और इबादत करने की बात कही जा रही थी, लेकिन इसके पीछे कुछ मुनाफ़िक़ों की ऐसी साज़िश छिपी हुई थी जिसका मक़सद मुसलमानों के दरमियान फूट डालना, नुक़सान पहुंचाना और अपने लिए एक पनाहगाह तैयार करना था।
मुनाफ़िक़ों ने नबी-ए-करीम ﷺ से दरख़्वास्त की कि आप इस नई मस्जिद में तशरीफ़ लाकर नमाज़ अदा फ़रमा दें, ताकि उसे आपकी ताईद और बरकत हासिल हो जाए। लेकिन अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को उसकी हक़ीक़त से आगाह फ़रमा दिया और कुरआन-ए-करीम में उसकी असलियत खोलकर रख दी।
आख़िर वह कौन-सी साज़िश थी जिसकी वजह से एक मस्जिद को ही ढा देने का हुक्म दिया गया? और कुरआन-ए-करीम ने मस्जिदे ज़रार और मस्जिदे तक़्वा के बीच क्या फ़र्क़ बताया?
आइए, इस हैरतअंगेज़ वाक़िए को आसान और दिलचस्प अंदाज़ में समझते हैं और साथ ही यह भी जानते हैं कि इससे हमारे लिए नीयत, इत्तिहाद और अल्लाह की रज़ा के बारे में क्या बड़ा सबक़ मिलता है।
मस्जिदे जरार (रजब सन् 06 हिजरी)
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मालूम हुआ कि तबूक के मैदान में जो कि मदीना से चौदह मंज़िल पर दमिश्क़ के रास्ते पर वाक़े था, हिरक़्ल शाहे रूम ने मुसलमानों के मुक़ाबले के लिए भारी फ़ौज जमा कर ली है और उसके आगे का हिस्सा आगे बढ़कर बलक़ा तक आ पहुंचा है। आपने अरब में अकाल और गर्मी की तेज़ी के बावजूद जिहाद के लिए मुनादी कर दी और मुसलमान गिरोह-दर-गिरोह जिहाद के शौक़ में मदीना में जमा होने लगे।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अभी तैयारियों में लगे हुए थे कि मुनाफ़िक़ों ने वक़्त से फ़ायदा उठाकर सोचा कि मस्जिदे कुबा के मुक़ाबले में जो हिजरत के बाद सबसे पहली मस्जिद थी, इस बहाने से एक मस्जिद तैयार करें कि जो लोग कमज़ोरी या किसी और मजबूरी की वजह से मस्जिदे नबवी में न जा सकें, तो यहां नमाज़ पढ़ लिया करें, क्योंकि इस तरह मुसलमानों को बहकाने का भी मौक़ा हाथ आजाएगा और एक क़िस्म की फूट भी पैदा हो जाएगी।
यह सोचकर वह नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमते अक़्दस में हाज़िर हुए और कहने लगे कि हमने बूढ़े-कमज़ोर और मजबूरों के लिए क़रीब ही एक मस्जिद बनाई है। अब हमारी ख़्वाहिश है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वहां चलकर एक बार उसमें नमाज़ पढ़ लें, तो वह अल्लाह के नज़दीक मक़बूल हो जाए। आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि इस वक़्त तो मैं एक अहम ग़ज़वा के लिए जा रहा हूं, वापसी पर देखा जाएगा।
मगर जब आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कामियाब होकर खैरियत से वापस आए तो अल्लाह की वही के जरिए उस मस्जिद की तामीर की हक़ीक़ी वजहों को जान चुके थे, चुनांचे वापस तशरीफ़ लाकर सबसे पहले सहाबा रजि० को हुक्म दिया कि वे जाएं और उस मस्जिद को आग लगाकर ख़ाक स्याह कर दें।
चूंकि हक़ीक़त में उस मस्जिद की बुनियाद ‘तक्वा’ और ‘अल्लाह की रिज़ा’ की जगह ‘मुसलमानों में फूट’ पर रखी गई थी, इसलिए बेशक वह इसी की हक़दार की और उसको ‘मस्जिद’ कहना हक़ीक़त के ख़िलाफ़ था, इसलिए कुरआन ने इस देखने में ‘मस्जिद’ और अन्दर से ‘बैतुश-शर्र’ यानी शरारतों का अड्डा की तामीर के बारे में हक़ीक़ते हाल को रोशन करते हुए बतला दिया कि यह मस्जिदे तक़्वा नहीं, बल्कि ‘मस्जिदे ज़रार’ कहलाने की हक़दार है।
तर्जुमा – और मुनाफ़िक़ों में से वे लोग भी हैं जिन्होंने इस ग़रज़ से एक मस्जिद बनाकर खड़ी की कि नुक़्सान पहुंचाएं, कुफ़्रं करें, मोमिनों में फूट डालें और उनके लिए एक पनाहगाह पैदा करें जो अब से पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ चुके हैं, वे ज़रूर क़स्में खाकर कहेंगे कि हमारा मतलब इसके सिवा कुछ न था कि भलाई हो, लेकिन अल्लाह की गवाही यह है कि वे अपनी क़स्मों में बिल्कुल झूठे हैं।
ऐ पैग़म्बर! तुम इस मस्जिद में खड़े न होना, इस बात की कि तुम उसमें खड़े हो और अल्लाह के बन्दे तुम्हारे पीछे नमाज़ पढ़ें वही मस्जिद हक़दार है जिसकी बुनियाद पहले दिन से तक़्वा पर रखी गई है यानी मस्जिदे कुबा और मस्जिदे नबवी इसमें ऐसे लोग आते हैं जो पसन्द करते हैं कि पाक व साफ़ रहें और अल्लाह भी पाक व साफ़ रहने वालों को ही पसन्द करता है। (9:107-108)
ये भी पढ़ें: फ़ासिक़ की ख़बर पर तुरंत यक़ीन मत करो! कुरआन का बड़ा हुक्म और ग़ज़वा बनी मुस्तलिक़ का हैरतअंगेज़ वाक़िआ
सबक़
1. निफ़ाक़ एक ऐसा मरज़ है जो इंसानों की तमाम अच्छी फ़ज़ीलतें और अच्छे अख़लाक़ को तबाह व बर्बाद करके उसकी इंसानियत को हैवानियत से बदल देता है और उसके फ़िक्र व अमल में आपस में मेल न रहने से उसकी जिंदगी से असफ़लुस्साफ़िलीन’ (सबसे गहरे गढ़े) में गिरा देता है।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
2. एक ही ‘अमल’ अमल करने वाले की नीयत के फ़र्क़ से ‘पाक’ भी हो सकता है और नापाक भी, तैयब भी बन सकता है और ‘ख़बीस’ भी । मस्जिद की तामीर एक भला काम है और अज्र व सवाब की वजह, मगर जबकि अल्लाह की रिज़ा के लिए हो और इबादते इलाही का हक़ीक़ी मक्सद पेशेनज़र रहे।
तर्जुमा: ‘अल्लाह की मस्जिदों को तो बस वही आबाद करता है जो अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान लाया और नमाज़ अदा की और जकात दी और अल्लाह के सिवा किसी से न डरा ।’ (9:18)Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
और यही ‘भला काम’ ‘बुरा काम’ और नफ़रत भरा काम बन जाता है, जबकि उसका मक्सद शैतानी काम हो या मुसलमानों के दर्मियान फूट डालना या नमाज़ की आड़ में इस्लाम के ख़िलाफ़ पनाहगाह और जासूसी का मर्कज़ बनाना हो, इसीलिए यह भला काम जंब काफ़िरों के हाथों अंजाम पाए तो गैर-मक़बूल और मर्दूद है।
तर्जुमा – ‘मुश्रिकों का हक़ नहीं है कि वे अल्लाह की मस्जिद को आबाद करें, हालांकि वे अपनी जानों पर कुफ्र की गवाही देते हैं।’ (9:17)Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
FAQ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — मस्जिदे ज़रार
सवाल 1: मस्जिदे ज़रार क्या थी?
जवाब: मस्जिदे ज़रार वह इमारत थी जिसे मुनाफ़िक़ों ने ज़ाहिर में नमाज़ और इबादत के लिए बनाया था, लेकिन उसके पीछे मुसलमानों को नुक़सान पहुंचाने और उनके दरमियान फूट डालने का मक़सद था। कुरआन-ए-करीम ने सूरह अत-तौबा में इसकी हक़ीक़त बयान की है।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 2: मस्जिदे ज़रार का ज़िक्र कुरआन में कहां आया है?
जवाब: मस्जिदे ज़रार का ज़िक्र सूरह अत-तौबा, आयत 107 और 108 में आया है। इन आयतों में उसके पीछे छिपे मक़सद को बयान किया गया और ऐसी जगह नमाज़ पढ़ने से मना किया गया।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 3: मुनाफ़िक़ों ने मस्जिदे ज़रार क्यों बनवाई थी?
जवाब: कुरआन के मुताबिक़ उनके मक़सद में मुसलमानों को नुक़सान पहुंचाना, कुफ़्र को बढ़ावा देना, मोमिनों के बीच फूट डालना और पहले से अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के मुख़ालिफ़ लोगों के लिए एक पनाहगाह तैयार करना शामिल था।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 4: क्या मस्जिद बनाना हमेशा सवाब का काम है?
जवाब: मस्जिद बनाना बहुत बड़ा नेक काम है, लेकिन हर अमल की क़ुबूलियत उसकी नीयत और मक़सद से जुड़ी होती है। अगर कोई नेक काम अल्लाह की रज़ा के बजाय फितना, निफ़ाक़ या मुसलमानों में फूट डालने के लिए किया जाए तो उसका ज़ाहिरी रूप उसे नेक अमल नहीं बना देता।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 5: मस्जिदे ज़रार को गिराने का हुक्म क्यों दिया गया?
जवाब: क्योंकि उसकी बुनियाद तक़्वा और इबादत के बजाय मुसलमानों को नुक़सान पहुंचाने और उनमें फूट डालने के मक़सद पर रखी गई थी। इसलिए नबी-ए-करीम ﷺ ने सहाबा किराम को उसे ख़त्म करने का हुक्म दिया।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 6: मस्जिदे ज़रार से हमें क्या सबक़ मिलता है?
जवाब: सबसे बड़ा सबक़ यह है कि सिर्फ़ किसी काम का ज़ाहिरी रूप देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। नीयत, मक़सद और अमल की हक़ीक़त भी अहम है। साथ ही मुसलमानों में इत्तिहाद बनाए रखना और फितने से बचना बेहद ज़रूरी है।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 7: मस्जिदे ज़रार और मस्जिदे क़ुबा में क्या फ़र्क़ था?
जवाब: मस्जिदे क़ुबा की बुनियाद तक़्वा पर रखी गई थी, जबकि मस्जिदे ज़रार के पीछे फितना और मुसलमानों को नुक़सान पहुंचाने का मक़सद था। सूरह अत-तौबा की आयत 108 में अल्लाह तआला ने उस मस्जिद की तारीफ़ की जिसकी बुनियाद पहले दिन से तक़्वा पर रखी गई।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 8: मस्जिदे ज़रार का वाक़िआ किस दौर में हुआ था?
जवाब: यह वाक़िआ ग़ज़वा-ए-तबूक के दौर से जुड़ा हुआ है और सूरह अत-तौबा में इसका ज़िक्र आया है।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 9: क्या इस वाक़िए का ताल्लुक़ निफ़ाक़ से है?
जवाब: जी हां। यह वाक़िआ बताता है कि निफ़ाक़ इंसान को ज़ाहिरी तौर पर नेक काम का लिबास पहनाकर भी अंदर से उसका मक़सद बिल्कुल उलट कर सकता है। इसलिए मुसलमान को अपने दिल और नीयत की इस्लाह की फ़िक्र करनी चाहिए।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
सवाल 10: मस्जिदे ज़रार से आज के मुसलमानों को क्या सीखना चाहिए?
जवाब: हमें चाहिए कि हर नेक काम अल्लाह की रज़ा के लिए करें, न कि दिखावे, शख़्सी फ़ायदे या मुसलमानों में फूट डालने के लिए। साथ ही किसी के बारे में बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाने के बजाय कुरआन और सही दीन की हिदायत को सामने रखना चाहिए।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Masjide Zarar Ka Hairatangez Waqia
खुदा हाफिज़ ….
