Qayamat Ka Insaf
दुनिया में बहुत से लोग दूसरों पर ज़ुल्म करके यह समझते हैं कि उनसे कभी हिसाब नहीं लिया जाएगा। लेकिन इस्लाम हमें बताता है कि क़यामत का दिन वह दिन होगा जब अल्लाह तआला हर छोटे-बड़े अमल का पूरा इंसाफ़ फ़रमाएंगे। न किसी पर ज़रा-सा भी ज़ुल्म होगा और न ही किसी का हक़ मारा जाएगा।
इस आर्टिकल में हम कुरआन की आयतों और सही हदीस की रोशनी में जानेंगे कि क़यामत के दिन ज़ालिम और मज़लूम का फैसला कैसे होगा, इंसानों और जिन्नों से कौन-कौन से सवाल किए जाएंगे, और आखिरत में अल्लाह का इंसाफ़ कितना मुकम्मल और बे-मिसाल होगा। अगर आप आखिरत की तैयारी करना चाहते हैं और अल्लाह के इंसाफ़ की हक़ीक़त समझना चाहते हैं, तो इस लेख को आखिर तक ज़रूर पढ़ें।
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा रिवायत फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में एक शख़्स आकर बैठ गया। उसने अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के रसूल ! बिला शुब्हा मेरे कुछ गुलाम हैं जो मुझसे झूठ बोलते हैं और मेरी ख़ियानत करते हैं और मेरी नाफरमानी करते हैं यह तो उनकी तरफ़ से है और मेरी तरफ से यह है कि मै उनको गालियां देता हूं और सज़ा में मारता भी हूं। अब मुझे आप यह बताए कि आख़िरत में मेरा और उनका क्या मामला होगा?
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जब कियामत का दिन होगा तो तेरे गुलामों को ख़ियानत और नाफरमानी और झूठ बोलने का और तेरे सज़ा देने का हिसाब होगा। अगर तेरी सज़ा उनके कुसूरों के बराबर होगी तो मामला बराबर रहेगा, न तुझे कुछ उनकी तरफ से मिलेगा, न तुझ पर कुछ बोझ पड़ेगा और अगर तेरी सज़ा उनकी हरकतों से ज़्यादा होगी तो उस ज़्यादा सज़ा का उनको तुझे बदला दिलाया जाएगा।
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का यह इरशाद सुनकर वह शख़्स रोता और चीख़ता हुआ वहां से चला गया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उससे फ़रमाया क्या तू अल्लाह तआला का यह इरशाद नहीं पढ़ता जिसमें तेरे मामले का साफ़ ज़िक्र किया गया है
और हम कियामत के दिन इंसाफ की तराजू कायम करेंगे सो किसी पर ज़रा-सा भी जुल्म न होगा और अगर कोई अमल राई के दाने के बराबर भी होगा तो हम उसे ज़ाहिर करेंगे और हम हिसाब लेने वाले काफी हैं।’
यह सुनकर उस शख़्स ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! मैं अपने और इन गुलामों के हक में इससे बेहतर कुछ नहीं समझता कि उनको अपने से जुदा कर दूं। आपको गवाह बनाकर कहता हूं कि वह सब आज़ाद हैं। (मिश्कात शरीफ)
जिन्नों को ख़िताब करके अल्लाह जल्ला शानुहू सवाल फ़रमायेंगे जैसा कि सूरह अबिया में फ़रमाया : और जिस दिन अल्लाह इन सबको जमा करेगा और फ़रमायेंगा ऐ जिन्नों की जमाअत! तुमने इंसानों में से बड़ी जमाअत बस में कर ली थी।’
आगे फ़रमाया : और कहेंगे जिन्नों के दोस्त आदमियों में से कि ऐ हमारे रब ! फ़ायदा उठाया हम में एक ने दूसरे से और हम पहुंच गये अपने उस मुकर्रर वक़्त को जो आपने हमारे लिऐ मुकर्रर फ़रमाया ।
दुनिया में तो लोग बुत वगैरह पूजते हैं, वे सच में ख़बीस जिन्न व शैतान ही की पूजा करते हैं, इस ख़्याल से कि वे हमारे काम निकालेंगे, उन की नियाज़ें चढ़ाते हैं और उनके आस-पास नाचते और गाते-बजाते हैं। इस्लाम से पहले यह भी क़ायदा था कि आड़े वक़्त में जिन्नों से मदद तलब किया करते थे,
जब आख़िरत में जिन्न और उनकी पूजा करने वाले पकड़े जाएंगे तो मुश्रिक कहेंगे कि हमारे परवरदिगार! वह तो हमने वक़्ती कार्रवाई कर ली थी और मौत का वादा आने से पहले-पहले दुनिया की ज़रूरतों के लिऐ हम एक-दूसरे से काम निकालने के कुछ उपाय कर लिया करते थे।
आगे फरमाया : अल्लाह तआला का इरशाद होगा कि दोज़ख़ है तुम्हारा ठिकाना । उसमें हमेशा रहोगे मगर हां, जो अल्लाह चाहे’ । बेशक तेरा रब हिकमत वाला और जानने वाला है और इसी तरह हम साथ मिला देंगे गुनहगारों को एक-दूसरे से उनके आमाल की वजह से।’
फिर आगे फ़रमाया : ‘ऐ जिन्नो और इंसानों की जमाअत ! क्या तुम्हारे पास तुम में से रसूल नहीं आये थे जो तुमको मेरी आयतें सुनाते थे और उस दिन के पेश आने से डराते थे। जिन्न व इंसान इकरार करते हुए अर्ज़ करेंगे कि हमने अपने गुनाह का इकार कर लिया और उनको दुनिया की ज़िंदगी ने धोखा दिया और इकरारी होंगे कि वे काफ़िर थे।’
इस आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि जिन्नों और इंसानों से इकट्ठा ख़िताब और सवाल होगा कि रसूल तुम्हारे पास पहुंचे या नहीं? सवाल के जवाब में जुर्म का इकरार करेंगे और यह मानेंगे कि हां! रसूल हमारे पास आये थे।
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सच में हम ही मुजरिम हैं। इस आयत में है कि अपने काफिर होने का इकरार करेंगे और कुछ आयतों में है कि ‘मा कुन्ना मुश्रिकीन’ (हम मुश्रिक न थे) कहेंगे। इस शुब्हे का जवाब यह है कि पहले इंकार करेंगे और फिर आमालनामों और गवाहियों के ज़रिए इकारर कर लेंगे और यह इंसान का कायदा है कि पहले जुर्म मानने से इंकार करते है।
फिर जब इस तरह जान छूटती नज़र नहीं आती तो यह समझकर शायद इकरार करने ही से खलासी हो जाए, इक्रार कर लेता है लेकिन वहां काफिर व मुश्रिक की खलासी न होगी ।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब)
1. क़यामत के दिन सबसे पहले किस चीज़ का हिसाब होगा?
जवाब: क़यामत के दिन हर इंसान के छोटे-बड़े सभी अमलों का हिसाब होगा। किसी पर ज़रा-सा भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा और हर हक़दार को उसका पूरा हक़ मिलेगा।Qayamat Ka Insaf
2. क्या ज़ालिम को क़यामत के दिन उसके ज़ुल्म की सज़ा मिलेगी?
जवाब: जी हाँ। अगर किसी ने किसी पर ज़ुल्म किया होगा, तो क़यामत के दिन उससे उसका पूरा हिसाब लिया जाएगा और मज़लूम को उसका हक़ दिलाया जाएगा।Qayamat Ka Insaf
3. अगर किसी ने दुनिया में किसी का हक़ मारा हो तो क्या होगा?
जवाब: अगर तौबा करके हक़ अदा नहीं किया गया, तो क़यामत के दिन उसका फैसला अल्लाह तआला करेंगे और मज़लूम को इंसाफ़ मिलेगा।Qayamat Ka Insaf
4. क्या जिन्नों से भी क़यामत के दिन सवाल किया जाएगा?
जवाब: जी हाँ। कुरआन के मुताबिक जिन्नों और इंसानों दोनों से उनके ईमान, अमल और रसूलों की पैरवी के बारे में सवाल किया जाएगा।Qayamat Ka Insaf
5. क्या क़यामत के दिन कोई अपने गुनाह छिपा सकेगा?
जवाब: नहीं। उस दिन हर अमल सामने लाया जाएगा। इंसान के आमालनामे, गवाहियाँ और उसके अपने अज़ा भी उसके बारे में गवाही देंगे।Qayamat Ka Insaf
6. क्या अल्लाह तआला किसी पर नाइंसाफ़ी करेंगे?
जवाब: हरगिज़ नहीं। अल्लाह तआला सबसे बड़े इंसाफ़ करने वाले हैं। क़यामत के दिन किसी पर राई के दाने के बराबर भी ज़ुल्म नहीं होगा।Qayamat Ka Insaf
7. क़यामत के दिन कामयाब कौन होगा?
जवाब: वह इंसान जो ईमान, नेक अमल, तौबा, इंसाफ़ और लोगों के हुकूक अदा करके अल्लाह के सामने हाज़िर होगा।Qayamat Ka Insaf
8. इस्लाम हमें दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करने की शिक्षा देता है?
जवाब: इस्लाम इंसाफ़, रहम, सच्चाई, अमानतदारी और लोगों के हुकूक अदा करने की तालीम देता है। किसी पर ज़ुल्म करना या उसका हक़ मारना बहुत बड़ा गुनाह है।Qayamat Ka Insaf
9. अगर किसी से गलती या ज़ुल्म हो जाए तो क्या करना चाहिए?
जवाब: फ़ौरन अल्लाह तआला से सच्चे दिल से तौबा करें और जिस व्यक्ति का हक़ मारा है, उससे माफ़ी माँगकर उसका हक़ वापस करें।Qayamat Ka Insaf
10. इस बयान से हमें क्या सबक मिलता है?
जवाब: सबसे बड़ा सबक यह है कि दुनिया की ताक़त, दौलत और पद हमेशा नहीं रहेंगे। आख़िरत में हर इंसान को अल्लाह के सामने जवाब देना होगा, इसलिए हमेशा इंसाफ़ करें, ज़ुल्म से बचें और लोगों के हुकूक अदा करें।Qayamat Ka Insaf
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Qayamat Ka Insaf
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Qayamat Ka Insaf
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Qayamat Ka Insaf
जज़ाकल्लाह खैर….
