Astaghfirullah Padhne Ki Taqat!
इंसान से गलती और गुनाह हो जाना उसकी फितरत का हिस्सा है। लेकिन एक मोमिन की खूबसूरती यह है कि गलती होने के बाद वह मायूस नहीं होता, बल्कि अपने रब की तरफ लौटता है और दिल से माफी और मगफिरत मांगता है। इसी को तौबा और इस्तिग़फ़ार कहा जाता है।
हमारी ज़िंदगी में कई बार परेशानी, ग़म और तंगी के ऐसे हालात आते हैं जिनसे निकलने का रास्ता समझ नहीं आता। ऐसे समय में हमें अल्लाह तआला की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए। अस्तग़फ़ार हमें अपने रब के करीब लाता है और अपने गुनाहों पर शर्मिंदगी के साथ उसकी तरफ रुजू करने की याद दिलाता है।
नबी-ए-करीम ﷺ भी अक्सर अल्लाह तआला से इस्तिग़फ़ार फ़रमाते थे। इसलिए हमें भी अपनी ज़िंदगी में “अस्तग़फ़िरुल्लाह” को सिर्फ़ ज़ुबान का ज़िक्र नहीं, बल्कि सच्ची तौबा और अल्लाह की तरफ लौटने का ज़रिया बनाना चाहिए।
आइए जानते हैं कि इस्तिग़फ़ार का असल मतलब क्या है, कुरआन और हदीस में इसकी क्या अहमियत बताई गई है और हमें इससे क्या सीख मिलती है।
इंसानी फितरत में है की उससे गलती या गुनाह हो जाते है और इसके बाद इंसान अपने किये पर शर्मिंदा हो कर सच्चे दिल से अल्लाह तआला से माफ़ी तलब करता है तो उसे अस्तग़फ़ार कहते है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने फ़रमाया जो इंसान अस्तग़फ़ार (तौबा ) को अपने ऊपर लाज़िम कर ले तो अल्लाह तआला उसको हर तंगी से निकलने का एक रास्ता अता फरमाएगा और हर गम से निजात देगा और उसे ऐसी जगह से रोज़ी अता करेंगे जहाँ से उसको गुमान भी नहीं होगा।
आपको माफी क्यों मांगनी चाहिए?
जो भी गुनाह हम करते हैं वो क़यामत के दिन हमारे सामने होगा है, हाँ जिसको अगर अल्लाह तआला चाहे माफ कर दे तो अलग बात है। और हम जानते हैं कि इंसान होने के नाते हम में बहुत ही ऐब हैं और हमसे बेशुमार गुनाह होते रहते हैं । इसलिए हमें हमेशा गुनाहों के लिए माफ़ी मांगते रहना चाहिए ताकि अल्लाह तआला हमारे गुनाहों को मिटा दे और जन्नत के रास्ते को आसान कर दे ।
अस्तग़फ़ार का मतलब अपनी गलतियों की माफ़ी माँगना और गुनाहों की बख्शीश कराना है। हमारी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी हक़ीक़त यही है कि हम कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन फिर भी हम अक्सर गलती कर देते है और हम से गुनाह हो जाते हैं।
लेकिन अल्लाह तआला का वादा है कि जब हम अपने गुनाहों की माफ़ी मागेंगे और मगफिरत तलब करेंगे तो अल्लाह हमें माफ कर देगा चाहे हमारे गुनाह कितने ही बड़े क्यों न हों।
हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि सल्लम ने फ़रमाया कि इब्लिस ने परवरदिगारे आलम से कहा कि मुझे तेरी इज्जत व् जलाल की कसम जब तक इंसान की जान में जान है। मैं उसे गुमराह करता रहूँगा अल्लाह पाक ने उसको जवाब दिया कि मुझे कसम है अपनी बुजुर्गी और बढाई की, मैं भी उन्हें बख्शता रहूँगा, जब तक मुझसे तौबा करते रहेंगे।
अल्लाह पाक ने फरमाया क़यामत के दिन लोगो को बड़े बड़े दर्जे मिलेंगे, जिनको लेकर कहेंगे, इलाही, यह दर्जे हम को कैसे मिल गए, हमारे तो ऐसे अमाल नहीं थे अल्लाह पाक फ़रमाएंगे कि तुम्हारी औलाद जो तुम्हारे लिए अस्तगफार करती थी, यह उसकी वजह से है।
अल्लाह पाक ने फरमाया ” गुनाहों से तौबा अस्तगफार करने की वजह से, आदमी ऐसा हो जाता है, जैस गुनाह किया ही नहीं,
हुजुर नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि सल्लम बावजूद मासूम होने के, दिन में सत्तर बार अस्तगफार फरमाते थे।
अल्लाह पाक रहीम करीम है ऐसे में अल्लाह पाक अपने बन्दे के अस्तगफार करने से बहुत खुश होता है आइये जाने अस्तगफार के फायदे ,अस्तगफार के फायदे में से एक फायदा है दिलो में जंगो की सफाई हो जाती है
तौबा अस्तगफार पढने का दुसरा फायदा परेशानीयों एंव तंगियों से रूहानी इलाज ,अस्तगफार पढने से आपके लिए रहमत का दरवाजा खुलता है अस्तगफार करने वाले की दुआ अल्लाह पाक जरुर काबूल करता है।
अस्तगफार पढने वाले पर अल्लाह रहमत की बारिश करता है। ऐसी जगह से रोजी देता है कि जहाँ से वहम व् गुमान भी नहीं होता तो यह अस्तगफार पढ़ने के कुछ फायदे,
रब्बिग फिर लि वतुब इलैह इन्नका अंतत तव्वाबुर रहीम
तर्जुमा : ए अल्लाह मेरी मगफिरत फरमा मेरी तौबा क़ुबूल फरमा बेशक तू ही तौबा कबूल करने वाला और रहम करने वाला है।
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असताग्फिरुल लाहल लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवल हय्युल क़य्यूमु व अतूबू इलैहही
तर्जुमा : मैं अल्लाह से बखशिश चाहता हूँ जिसके सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, वो हमेशा जिंदा रहने वाला है और कायम रहने वाला है और मैं उसी की तरफ़ रुजू करता हूँ
अस्तग़फिरुल्लाहि रब्बी मिन कुल्ली ज़म्बिंव व आतुबो इलैह,
तर्जुमा :मैं बख्शिश चाहता हूं उस अल्लाह से, जिस के सिवा कोई माबूद नहीं, मगर वही हमेशा जिन्दा रहेगा और मै उसी की तरफ मुतवज्जेह हूं।
अल्लाह रब्बुल-इज्जत हमें अस्तग़फ़ार करने की तौफीक अता फरमाए आमीन।
FAQ – अस्तग़फ़ार और तौबा
सवाल 1: अस्तग़फ़ार का क्या मतलब है?
जवाब: अस्तग़फ़ार का मतलब है अल्लाह तआला से अपने गुनाहों और गलतियों की माफ़ी मांगना और उसकी तरफ़ लौटना।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 2: “अस्तग़फ़िरुल्लाह” का मतलब क्या है?
जवाब: “अस्तग़फ़िरुल्लाह” का मतलब है: “मैं अल्लाह से बख्शिश और माफ़ी मांगता हूँ।”Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 3: क्या सिर्फ़ “अस्तग़फ़िरुल्लाह” कह देना ही तौबा है?
जवाब: सिर्फ़ ज़ुबान से कहना काफी नहीं। सच्ची तौबा में गुनाह पर शर्मिंदगी, उसे छोड़ने की कोशिश और दोबारा न करने का इरादा भी होना चाहिए। अगर किसी इंसान का हक़ मारा हो तो उसका हक़ लौटाना भी ज़रूरी है।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 4: क्या अल्लाह बड़े से बड़ा गुनाह भी माफ़ कर सकता है?
जवाब: जी हाँ, अगर इंसान सच्चे दिल से तौबा करे तो अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए। कुरआन में अल्लाह तआला अपनी रहमत से मायूस होने से मना फ़रमाता है। (सूरह अज़-ज़ुमर 39:53)Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 5: क्या नबी ﷺ भी अस्तग़फ़ार करते थे?
जवाब: जी हाँ। सहीह हदीस में आता है कि नबी ﷺ एक दिन में सत्तर से अधिक बार अल्लाह से इस्तिग़फ़ार करते थे। (सहीह अल-बुख़ारी)Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 6: क्या अस्तग़फ़ार परेशानी और ग़म से राहत का ज़रिया है?
जवाब: कुरआन में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम से इस्तिग़फ़ार करने को कहा और अल्लाह की तरफ़ से बारिश, माल और औलाद जैसी नेमतों का ज़िक्र किया। (सूरह नूह 71:10-12) इसलिए इस्तिग़फ़ार बड़ी नेमत और रहमत का ज़रिया है।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 7: क्या कोई खास अस्तग़फ़ार पढ़ना चाहिए?
जवाब: “अस्तग़फ़िरुल्लाह” कहना भी इस्तिग़फ़ार है। इसके अलावा नबी ﷺ ने सैय्यिदुल-इस्तिग़फ़ार भी सिखाया है, जिसे सहीह बुख़ारी में बयान किया गया है।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 8: दिन में कितनी बार अस्तग़फ़ार करना चाहिए?
जवाब: इसकी कोई ऐसी संख्या नहीं कि हर व्यक्ति के लिए वही अनिवार्य हो। जितना अधिक इस्तिग़फ़ार किया जाए उतना अच्छा है। नबी ﷺ खुद अक्सर इस्तिग़फ़ार करते थे।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 9: अगर बार-बार गुनाह हो जाए तो क्या दोबारा तौबा करनी चाहिए?
जवाब: जी हाँ। इंसान से फिर गलती हो जाए तो अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए, बल्कि सच्चे दिल से दोबारा तौबा करनी चाहिए और गुनाह से बचने की कोशिश करनी चाहिए।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
सवाल 10: अस्तग़फ़ार से हमें सबसे बड़ी सीख क्या मिलती है?
जवाब: सबसे बड़ी सीख यह है कि गुनाह हो जाने के बाद अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए। गलती के बाद अपने रब की तरफ़ लौटना और सच्चे दिल से माफ़ी मांगना एक मोमिन की खूबी है।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Astaghfirullah Padhne Ki Taqat
जज़ाकल्लाह खैर….
