21/07/2026
Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein? Har Musalman Ke Liye Zaroori Jaankari

कुरआन मजीद को सही तरीके से कैसे समझें?हर मुसलमान के लिए ज़रूरी जानकारी |Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein? Har Musalman Ke Liye Zaroori Jaankari amazing story

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Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein? Har Musalman Ke Liye Zaroori Jaankari
Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

कुरआन मजीद अल्लाह तआला की आख़िरी और सबसे मुक़द्दस किताब है, जो पूरी इंसानियत के लिए हिदायत का ज़रिया है। हर मुसलमान की ख़्वाहिश होती है कि वह कुरआन को पढ़े, समझे और उस पर अमल करे। लेकिन एक अहम सवाल यह है कि कुरआन मजीद को सही तरीके से कैसे समझा जाए?

कुरआन को सही मायनों में समझने के लिए सिर्फ़ अरबी ज़बान जानना ही काफ़ी नहीं है। कुरआन की सही तफ़्सीर वही है जो हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने अपने सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) को सिखाई और जो भरोसेमंद तरीक़े से उम्मत तक पहुँची। इसलिए हमें कुरआन को अपनी राय से नहीं, बल्कि कुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद तफ़्सीर की रोशनी में समझना चाहिए।

इस आर्टिकल में हम आसान भाषा में जानेंगे कि कुरआन मजीद को सही तरीके से समझने का इस्लामी तरीका क्या है, तफ़्सीर की अहमियत क्या है और किन गलतियों से बचना चाहिए। यह जानकारी हर मुसलमान के लिए बेहद ज़रूरी है।

कुरआन मजीद सच्ची किताब है

कुरआन मजीद सच्ची किताब है,इस किताब को नाज़िल करने वाला ख़ुद परवदिगार है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने बारे में इरशाद फ़रमाते हैं उससे ज़्यादा सच्ची बात भला किस की हो सकती है। दूसरी जगह फ़रमाया कह दीजिए अल्लाह ने सच कहा है। लिहाज़ा जिस ज़ात का यह कलाम है वह सबसे ज़्यादा सच्ची जात है।

इस कलाम को आगे पहुँचाने वाले जिब्राईल अलैहिस्सलाम हैं जिनकी अमानत व दयानत की गवाही खुद अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त युं कह रहे हैं अमानत कहते है कि अगर कोई चीज़ किसी ने सुपुर्द की हो तो उसे हू-बहू आगे पहुँचा देना।

लिहाज़ा इस आयत में अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त ने जिब्राईल अमीन की सदाक्त व अमानत की गवाही खुद दी है। जिस हादी बरहक रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह कलाम अता किया गया उनके बारे में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं आप तो अख़लाक़ के आला मरतबे पर फाएज़ हैं।

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यह वह ज़ात है जिसकी आँख ऐब से पाक है। लिहाज़ा फ़रमाया जो अपनी मर्जी से लब कुशाई नहीं फरमाते वह अपनी ख़्वाहिश से नहीं बोलते। किस्सा मुख़्तसर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त भी सच्चे, लाने वाले जिब्राईल अमीन भी सच्चे और साहिबे क़ुरआन पैग़म्बरे इस्लाम भी सच्चे। बस सच्चे का कलाम, सच्चे के ज़रिए, सच्चे तक पहुँचा।

कुरआन मजीद अल्लाह तआला की अमानत है परवरदिगार की यह अमानत उसके बंदों तक ठीक-ठीक पहुँच चुकी है। जिस तरह ये अल्फाज़ अल्लाह तआला ने नाज़िल फरमाएं हैं उसी तरह इसके मायने भी अल्लाह तआला ने बयान फ़रमा दिए हैं।

लिहाज़ा ‘वही’ नाज़िल होने के इब्तिदाई दौर में जब क़ुरआनी आयतें उतरती थीं।तो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम याद करने में जल्दी फ़रमाते थे। अल्लाह तआला ने इर्शाद फ़रमाया ! आप अपनी ज़बान को जल्दी न हिलाइए। कुरआन का जमा करवाना हमारे ज़िम्मे हैं।

कुरआन मजीद का जमा करवाना भी अल्लाह तआला ने अपने ज़िम्मे ले लिया और इसका बयान करना भी अपने ज़िम्मे ले लिया। यह नुक्ता बड़ा अहम है। जिस तरह कुरआन मजीद के अल्फाज़ अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त की ज़िम्मेदारी से उसके बंदों तक पहुँचे है।

उसी तरह उनके मायने व मतलब भी अल्लाह तआला के महबूब ने अल्लाह तआला के हुक्म से पहुँचा दिए। अब क़ुरआन दो तरह से हमारे पास मौजूद है। उसके अल्फाज़ भी ‘वही’ उसके मायने भी ‘वही’। किसी वंदे को यह इजाज़त नहीं है कि कुरआन मजीद को पढ़कर अपनी तबियत से माइने निकाले क्योंकि साहिबे कलाम ही अपने कलाम को बेहतर समझता है।

यह कहाँ का इंसाफ है कि बात किसी और की हो और मुराद हम अपनी बयान करते फिरें। लिहाज़ा अल्फ़ाज़ भी वही एतेबार के काबिल हैं जो अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त ने नाज़िल फरमाए और मायने भी वही बेहतर एतिबार के काबिल जो अल्लाह तआला के महबूब ने बताए ।

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कुरआन के समझने में गलती आजकल कुछ लोग अरबी दानी के नशे में क़ुरआन मजीद में अपनी मंशा ढूंढना शुरू कर देते हैं हालाँकि क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला की मंशा ढूंढना चाहिए किसी बंदे की मंशा को नहीं। जिसने यह नुक्ता समझ लिया वह आजकल के बड़े-बड़े फितनों से महफूज़ हो गया क्योंकि कुरआन मजीद के माइने अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त ने खुद अपने महबूब के ज़रिए अपने बंदों तक पहुँचा दिए हैं।

अब कुरआन की तफ्सीर वही कहलाएगी जो सहाबा किराम ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सीखी और यूँ ऊपर से नीचे तक उम्मत में चली आई हो। लिहाज़ा जो उलूम नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि से हमें मिल चुके हैं उन्हीं उलूम को आगे पहुँचाने का नाम तफ़्सीर है।

FAQ (सवाल-जवाब)

1. कुरआन मजीद को सही तरीके से कैसे समझें?

कुरआन मजीद को सही तरीके से समझने के लिए उसकी तफ़्सीर, सहीह हदीस और सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की समझ को अपनाना चाहिए। अपनी राय से मतलब निकालने से बचना चाहिए।

2. क्या सिर्फ़ अरबी जान लेने से कुरआन समझा जा सकता है?

नहीं। अरबी जानना मददगार है, लेकिन कुरआन के सही मायने समझने के लिए तफ़्सीर और हदीस का इल्म भी ज़रूरी है।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

3. तफ़्सीर क्या होती है?

तफ़्सीर का मतलब है कुरआन की आयतों की सही व्याख्या (समझाना), जैसा कि नबी-ए-करीम ﷺ ने सहाबा-ए-किराम को सिखाया और जो भरोसेमंद तरीक़े से उम्मत तक पहुँची।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

4. क्या अपनी समझ से कुरआन की तफ़्सीर करना सही है?

इस्लामी उलमा ने बताया है कि बिना इल्म के अपनी राय से कुरआन की तफ़्सीर करना सही नहीं है। कुरआन को हमेशा भरोसेमंद तफ़्सीर और सहीह हदीस की रोशनी में समझना चाहिए।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

5. कुरआन समझने के लिए सबसे पहले क्या करना चाहिए?

सबसे पहले सही नियत रखें, कुरआन की तिलावत करें, उसका तरजुमा पढ़ें और किसी भरोसेमंद तफ़्सीर का सहारा लें। अगर कोई बात समझ न आए तो किसी योग्य आलिम से पूछें।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

6. क्या हर मुसलमान के लिए कुरआन समझना ज़रूरी है?

जी हाँ। हर मुसलमान को अपनी क्षमता के अनुसार कुरआन को पढ़ना, समझना और उस पर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

7. कुरआन पढ़ने का सबसे बड़ा मक़सद क्या है?

कुरआन का सबसे बड़ा मक़सद इंसान को सही रास्ता दिखाना, अल्लाह की पहचान कराना और ऐसी ज़िंदगी सिखाना है जो दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी दिलाए।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

8. अगर कोई आयत समझ में न आए तो क्या करें?

जल्दबाज़ी में अपनी राय न बनाएं। किसी भरोसेमंद तफ़्सीर, सहीह हदीस या योग्य आलिम-ए-दीन से उसकी सही व्याख्या जानें।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

9. कुरआन पढ़ना बेहतर है या समझकर पढ़ना?

दोनों अहम हैं। तिलावत का अपना सवाब है, लेकिन कुरआन को समझकर पढ़ना और उस पर अमल करना इंसान की ज़िंदगी में असली बदलाव लाता है।

10. कुरआन पर अमल करने का क्या फ़ायदा है?

कुरआन पर अमल करने से इंसान का ईमान मज़बूत होता है, अच्छे अख़लाक पैदा होते हैं, दिल को सुकून मिलता है और अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करने का रास्ता आसान होता है।Quran Majeed Ko Sahi Tarike Se Kaise Samjhein?

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।

जज़ाकल्लाह खैर….

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