ग़ीबत और चुगलखोरी में फर्क
ग़ीबत और चुगलखोरी में थोड़ा सा फर्क है। गीबत कहते हैं अगर कोई आदमी किसी की तारीफ करे तो उसे उसकी तारीफ अच्छी न लगे। यह उसकी बुराई की बात कर दे।
किसी के पीठ पीछे किसी की बुराई करना इसको ग़ीबत कहते हैं। लेकिन चुगलखोरी में बात तो वही होती है मगर साथ में यह भी नीयत होती है कि यह आदमी उससे दूर हो जाए।
ग़ीबत में यह नीयत होती है कि यह आदमी उसे बुरा समझने लग जाये। तो ग़ीबत और चुगलखोरी में यह फर्क है। ग़ीबत इसलिए की जाती है कि बन्दा उसे बुरा समझे और चुगलखोरी इसलिए की जाती है कि बन्दा दिल से उससे नफ़रत करने लग जाए और उससे कट जाए।
तो ताल्लुक तोड़ने की नीयत होती है। इसी को लगाई बुझाई कहते हैं। इससे रिश्तेदारियाँ टूटती हैं। लोग एक दूसरे से जुदा होते हैं।
इसलिए चुगलखोर इनसान अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त को हरगिज़ पसन्द नहीं। जहन्नम में ऐसी औरतों को वह अज़ाब दिया जाएगा। यह बात याद रखिये कि ये सब गुनाह सिर्फ औरतों ही में नहीं होते मर्दों में भी होते हैं।
अगर कोई मर्द भी ऐसा गुनाह करेगा तो उसको भी ऐसी ही सज़ा मिलेगी जैसी औरतों को मिल रही है। लेकिन हदीस पाक में औरतों के बारे में बात बताई गई, अब उनके जो-जो गुनाह मर्द कर रहे होंगे वे भी इसी के तहत आ जायेंगे और उनको भी इसी तरह की सज़ायें दी जायेंगी।
खूबसूरत बयान:कहीं आप भी इन बड़े गुनाहों में शामिल तो नहीं? Kahin aap bhi ine bade gunahon mein Shamil to nahin
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
