Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
दीन की सही मालूमात हासिल करना हर मुसलमान की ज़िंदगी का बहुत अहम हिस्सा है। हमें सिर्फ़ दुनिया की तालीम और रोज़गार के बारे में ही नहीं, बल्कि नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हलाल-हराम और अपने रोज़मर्रा के दीन से जुड़े मसाइल का इल्म भी होना चाहिए।
अक्सर हम अपनी ज़िंदगी के छोटे-छोटे कामों के लिए बहुत वक़्त निकाल लेते हैं, लेकिन दीन सीखने के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते। जबकि सही इल्म ही हमें यह समझाता है कि अल्लाह तआला को कौन सा अमल पसंद है और किन कामों से बचना चाहिए।
और सिर्फ़ खुद इल्म हासिल करना ही काफी नहीं, बल्कि अपने बीवी-बच्चों और घरवालों को भी ज़रूरी दीन की बातें सिखाना हमारी ज़िम्मेदारी है। आइए, इस बयान के ज़रिए समझते हैं कि दीन का इल्म हासिल करना क्यों ज़रूरी है और एक मुसलमान को अपने घरवालों की दीन की तालीम का कितना एहतिमाम करना चाहिए।
यहां यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि दीन के इल्म की दो किस्में हैं, पहली क़िस्म यह है कि दीन का इतना इल्म सीखना जो इन्सान को अपने फ़राइज़ और वाजिबात अदा करने के लिये ज़रूरी है,
जैसे यह कि नमाज़ कैसे पढ़ी जाती है? नमाज़ों में रक्अतों की तादाद कितनी है ? नमाज़ में कितने फ़राइज़ और वाजिबात हैं? रोज़ा कैसे रखा जाता है, और किस वक़्त फ़र्ज़ होता है? जकात कब फ़र्ज़ होती है, और कितनी मिकदार (मात्रा) में किन अफ़राद को अदा की जाती है?
और हज कब फ़र्ज़ होता है ? और यह कि कौन सी चीज़ हलाल है और कौन सी चीज़ हराम है ? जैसे झूठ बोलना हराम है, ग़ीबत करना हराम है, शराब पीना हराम है, खिन्जीर खाना हराम है, यह हलाल व हराम की बुनियादी मोटी मोटी बातें सीखना,
इसलिये इतनी मालूमात हासिल करना जिसके ज़रिये इन्सान अपने फ़राइज़ और वाजिबात अदा करे और हराम से अपने आपको बचा सके, हर मुसलमान और औरत के जिम्मे लाज़मी फर्ज़ है।
हदीस शरीफ़ में आया है कि: यानी इल्म का तलब करना हर मुसलमान मर्द और औरत के जिम्मे फर्ज़ है। इस से मुराद यही इल्म है। इतना इल्म हासिल करने के लिये जितनी भी कुरबानी देनी पड़े कुरबानी दे, जैसे मां बाप को छोड़ना पड़े तो छोड़े, बीवी को और बहन भाईयों को छोड़ना पड़े तो छोड़े,
इसलिये कि इतना इल्म हासिल करना फ़र्ज़ है। अगर कोई यह इल्म हासिल करने से रोके, जैसे मां बाप रोकें, बीवी रोके, या बीवी को शौहर रोके तो उनकी बात मानना जायज़ नहीं ।
इल्म की दूसरी किस्म यह है कि आदमी दीन के इल्म की बाकायदा पूरी तफ़सीलात हासिल करे और बाकायदा आलिम बने, यह हर इन्सान के जिम्मे फर्जे जैन (लाज़मी फ़र्ज़) नहीं है, बल्कि यह इल्म फ़र्जे किफ़ाया है। अगर कुछ लोग आलिम बन जायें तो बाकी लोगों का फरीज़ा भी अदा हो जाता है।
जैसे एक बस्ती में एक आलिम है और दीन की तमाम ज़रूरतों के लिये काफी है, तो एक आदमी के आलिम बन जाने से बाकी लोगों का फरीजा भी साकित हो जायेगा,
और अगर कोई बड़ी बस्ती हो या शहर हो तो उसके लिये जितने आलिमों की ज़रूरत हो, उस जरूरत के मुताबिक उतने लोग आलिम बन जायें तो बाकी लोगों का फ़रीज़ा हो जायेगा ।
बहरहाल ! जब हुज़ूरे अक्स सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह महसूस किया कि इन हज़रात ने फर्ज़े जैन के लायक जो इल्म था वह बीस दिन में हासिल कर लिया है, और अब उनको और यहां रोकने में यह अन्देशा है कि उनके घर वालों की हक़ तल्फी न हो।
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इसलिये आपने उन हज़रात से फरमाया कि अब आप अपने घरों को वापस जाओ, लेकिन साथ ही यह तंबीह भी फ़रमा दी कि यह न हो कि घर वालों के पास जाकर गफलत के साथ जिन्दगी गुज़ारना शुरू कर दो, बल्कि आप (स.व)ने फ़रमाया कि जो कुछ तुमने यहां रह कर इल्म हासिल किया और जो कुछ दीन की बातें यहां सीखीं वे बातें अपने घर वालों को जाकर सिखाओ। बिमार का हाल चाल पूछना।
इस से पता चला कि हर इन्सान के जिम्मे यह भी फ़र्ज़ है कि वह जिस तरह खुद दीन की बातें सीखता है, अपने घर वालों को भी सिखाये, उनको इतनी दीन की बातें सिखाना जिनके जरिये वे सही मायनों में मुसलमान बन सकें और मुसलमान रह सकें,
यह तालीम देना भी हर मुसलमान के जिम्मे फर्जे ऐन है। और यह ऐसा ही फर्ज है जैसे नमाज़ पढ़ना फर्ज है, जैसे रमजान में रोजे रखना फर्ज है, जकात अदा करना और हज अदा करना फ़र्ज़ है, ये काम जितने जरूरी हैं, इतना ही घर वालो को दीन सिखाना भी ज़रूरी है।
FAQ — दीन का इल्म सीखने से जुड़े सवाल-जवाब
सवाल 1: क्या दीन का इल्म सीखना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है?
जवाब: जी हाँ। हर मुसलमान मर्द और औरत पर इतना ज़रूरी दीन का इल्म हासिल करना फ़र्ज़ है जिससे वह अपने फ़राइज़ और वाजिबात सही तौर पर अदा कर सके और हराम कामों से बच सके।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 2: सबसे पहले कौन सा दीन का इल्म सीखना चाहिए?
जवाब: सबसे पहले नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज से जुड़े ज़रूरी मसाइल तथा हलाल-हराम की बुनियादी मालूमात हासिल करनी चाहिए। अपने हालात के मुताबिक़ जो मसाइल पेश आते हों, उनका इल्म भी सीखना चाहिए।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 3: फ़र्ज़-ए-ऐन और फ़र्ज़-ए-किफ़ाया में क्या फर्क है?
जवाब: फ़र्ज़-ए-ऐन वह इल्म है जिसकी ज़रूरत हर मुसलमान को अपनी ज़िंदगी के फ़राइज़ अदा करने के लिए होती है। जबकि दीन की पूरी तफ़सीली तालीम हासिल करके आलिम बनना फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 4: क्या औरतों के लिए भी दीन का इल्म सीखना ज़रूरी है?
जवाब: जी हाँ। औरतों पर भी अपने ज़रूरी दीन के मसाइल सीखना लाज़मी है, ताकि वह अपने इबादात और रोज़मर्रा के मामलात सही तरीके से अंजाम दे सकें।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 5: क्या घरवालों को दीन की बातें सिखाना भी ज़रूरी है?
जवाब: जी हाँ। इंसान को खुद दीन सीखने के साथ अपने घरवालों, खास तौर पर बीवी-बच्चों को भी ज़रूरी दीन की तालीम देने का एहतिमाम करना चाहिए।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 6: बच्चों को दीन की तालीम कब से देनी चाहिए?
जवाब: बच्चों को छोटी उम्र से ही अल्लाह की पहचान, कलिमा, नमाज़, अच्छे अख़लाक़ और हलाल-हराम की बुनियादी बातें प्यार और हिकमत के साथ सिखानी चाहिए।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 7: क्या सिर्फ़ दुनिया की तालीम हासिल करना काफी है?
जवाब: दुनिया की तालीम अपनी जगह ज़रूरी हो सकती है, लेकिन मुसलमान के लिए अपने दीन के ज़रूरी मसाइल से बेख़बर रहना सही नहीं। दुनिया और आख़िरत दोनों की कामयाबी के लिए दीन की सही मालूमात ज़रूरी हैं।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 8: दीन का इल्म हासिल करने का सबसे बड़ा फायदा क्या है?
जवाब: दीन का इल्म इंसान को सही और गलत, हलाल और हराम तथा जायज़ और नाजायज़ में फर्क समझाता है और उसे अपनी ज़िंदगी शरीअत के मुताबिक़ गुज़ारने में मदद देता है।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 9: क्या दीन का इल्म सीखकर दूसरों तक पहुंचाना भी सवाब का काम है?
जवाब: जी हाँ, सही और भरोसेमंद दीन की बातें दूसरों तक पहुंचाना नेक काम है। मगर किसी हदीस या मसले को शेयर करने से पहले उसकी सहीहियत और सही मतलब का ख्याल रखना चाहिए।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
सवाल 10: हमें दीन का इल्म किससे सीखना चाहिए?
जवाब: दीन के मसाइल भरोसेमंद और योग्य उलमा-ए-किराम तथा प्रमाणित इस्लामी किताबों से सीखने चाहिए, ताकि मालूमात सही और मुस्तनद हों।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Deen Ka Ilm Seekhna Har Musalman Par Farz Hai
खुदा हाफिज़…..
