19/07/2026
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पहली नज़र माफ़, दूसरी हराम|Pehli Nazar maaf dusri Haram amazing story

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Pehli Nazar maaf dusri Haram.
Pehli Nazar maaf dusri Haram.

पहली नज़र माफ़, दूसरी हराम|

अचानक नज़र माफ़ है

कई मर्तबा ऐसा होता है कि राह चलते या आते-जाते गैर-महरम औरत सामने आ जाती है तो उसके चेहरे पर नज़र पड़ जाती है। ऐसी सूरत के बारे में हज़रत अली रजियल्लाहु अन्हु ने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सवाल पूछा तो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:

ऐ अली! एक मर्तबा नज़र पड़ जाने के बाद फिर दोबारा न देखो क्योंकि तुम्हारे लिए सिर्फ़ पहली नज़र माफ़ है, दूसरी नहीं।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

इससे मालूम हुआ कि पहली बार अचानक नज़र माफ़ है और अगर किसी वक़्त पहली नज़र ही इरादे के साथ डाली गई तो वह भी हराम होगी। और पहली नज़र माफ़ होने का मतलब यह भी नहीं कि पहली नज़र ही इतनी भरपूर हो कि दोबारा देखने की ज़रूरत ही न रहे। सिर्फ़ इतनी बात है कि अगर अचानक नज़र पड़ गई तो नज़रें फ़ौरन हटाने का हुक्म है।

हज़रत जरीर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मैंने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि जो नज़र अचानक पड़ जाती है उसके बारे में क्या हुक्म है? आप सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया : निगाह को फेर लो।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

कभी-कभी हकीम डाक्टर या जज किसी को शरई उज्ज्र की वजह से किसी ना-महरम का चेहरा देखना पड़ जाए तो बक़द्र ज़रूरत देखने के बाद नज़र को फ़ौरन हटा लेना चाहिए।

बदनज़री फ़साद का बीज

गैर-महरम की तरफ़ शहवत की नज़र से देखना फ़साद का बीज है। शैतान गैर-महरम के चेहरों को बनाकर पेश करता है। वैसे भी दूर से हर चीज़ भली नज़र आती है। इसीलिए तो कहावत मशहूर है कि दूर के ढोल सुहाने हुआ करते हैं।

बदनज़री करने से इनसान के दिल में गुनाह का बीज पड़ जाता है जो मौक़ा मिलने पर अपनी बहार दिखाता है। काबील ने हाबील की बीवी के हुस्न व जमाल पर नज़र डाली तो दिल व दिमाग पर ऐसा भूत सवार हुआ कि अपने भाई को क़त्ल कर दिया। दुनिया में सबसे पहली नाफ़रमानी कर बैठा।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

कुरआन मजीद में इस बुरी हरकत का जिक्र हुआ है। गुनाह की बुनियाद डालने की वजह से क़यामत तक जितने कातिल आएँगे उनका बोझ उसके सर पर होगा। मालूम हुआ कि पहली नज़र डालने का तो इख़्तियार होता है। फिर मामला उसके बाद गैर-इख़्तियारी वाला हो जाता है।

चले के एक नज़र तेरी बज़्म देख आएँ यहाँ जो आए तो बेइख़्तियार बैठ गए इसलिए बेहतर है कि पहलीनज़र से ही बचा जाए। खतरे में पड़ना मुहतात लोगों का काम नहीं होता।

बदनज़री ज़िना की पहली सीढ़ी है

मुसनद अहमद में नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद गरामी नक़ल किया है :

आँखों का ज़िना देखना है, कानों का ज़िना सुनना है, ज़बान का ज़िना बात करना है, हाथ का ज़िना पकड़ना है, पाँव का ज़िना चलना है, दिल का ज़िना आरजू और तमन्ना करना है, शर्मगाह उसकी तसदीन या तकज़ीब करती (झुठलाती) है।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

कोई मुस्लामन जब पहली मर्तबा किसी और की खूबसूरती देखे फिर अपनी निगाह को पस्त कर ले तो अल्लाह तआला उसको इबादत की लज़्ज़त अता फ़रमाते हैं।

तबरानी शरीफ़ में गैर-महरम से नज़र हटाने के बारे में रिवायत है : जिसने मेरे डर की वजह से (बदनज़री) छोड़ी मैं उसे ईमान अता करूँगा जिसकी हलावत वह दिल में महसूस करेगा।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

कितना नफ़ेमंद सौदा है कि बदनज़री की वक़्ती और आरज़ी लज़्ज़त को छोड़ने पर ईमान की हमेशा की हलावत और शीरनी नसीब होती है। साबित हुआ कि अल्लाह तआला ऐसे आदमी के सीने में ठंडक डाल देते हैं। वैसे भी दस्तूर है कि अमल की जजा उसी की क़िस्म से होती हैं बस जो आदमी गैर-महरम पर नज़रबाज़ी की लज़्ज़त को छोड़ेगा अल्लाह तआला उसको इबादत और ईमान की लज़्ज़त अता करेगा।

बदनज़री से कभी जी नहीं भरता

हज़रत अक़्दस थानवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं :
“बदनज़री चाहे कितनी ज़्यादा की जाए, चाहे हज़ारों मर्दों और औरतों को घूरा जाए और घंटों घूरा जाए सैरी (तसल्ली) नहीं होती।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

बदनज़री ऐसी प्यास लगाती है जो कभी नहीं बुझती। इस्तिस्क्ना (प्यास की बीमारी) का मरीज़ इतना पानी पिए कि पेट फटने को आए तो भी प्यास खत्म नहीं होती। अल्लाह तआला ने एक से बढ़कर एक को खूबसूरत बनाया है। इनसान कितने ठप्पे देखेगा।

नतीज़ा यही निकलती है कि एक को देखा है दूसरे को देखने की हवस है। इस दरिया में सारी उम्र बहते रहेंगे तो भी किनारे पर नहीं पहुँचेगे। इसलिए कि यह दरिया वह है जिसका किनारा नहीं।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

बदनज़री जख्म को गहरा करती है

नज़र का तीर जब पेवस्त हो जाता है तो फिर दिल की कुढ़न बढ़ना शुरू हो जाती हैं जितनी बदनज़री ज़्यादा की जाएगी उतना ही जख्म ज़्यादा गहरा होता है। हाफ़िज़ इब्ने कय्युम रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं :

“निगाह का तीर फेंका जाए तो फेंकने वाला पहले क़त्ल हो जाता है। वजह यह है कि निगाह डालने वाला दूसरी निगाह को अपने जख्म का मदावा (तसल्ली) समझता है हालाँकि वह जख्म को ज़्यादा गहरा करता है। (अल् जवाब काफ़ी-417)Pehli Nazar maaf dusri Haram.

ये भी पढ़ें:बदनज़री का अंजाम और नज़र की हिफाज़त|

लोग कांटों से बचकर चलते हैं हमने फूलों से जख्म खाएँ हैं हाफ़िज़ इब्ने कय्युम रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है :

आँख बंद करना आसान है मगर बाद की तकलीफ़ पर सब्र करना मुश्किल काम है।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

बदनज़री के नुकसान

बदनज़री के कई नुकसान हैं:
दिल की पाकीज़गी खत्म होने लगती है।
इबादत में दिल नहीं लगता।
शैतान इंसान को गुनाह की तरफ़ आसानी से ले जाता है।
बेहयाई और फ़ितने बढ़ते हैं।
इंसान का ईमान कमज़ोर होने लगता है।
बड़े गुनाहों का रास्ता खुल जाता है।

इसीलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी निगाहों की हिफ़ाज़त करे और हर उस चीज़ से बचे जो अल्लाह की नाराज़गी का सबब बन सकती है।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

FAQ (Frequently Asked Questions)

1. क्या पहली नज़र का गुनाह होता है?

अगर पहली नज़र अचानक पड़ जाए और इंसान फ़ौरन अपनी निगाह हटा ले, तो वह माफ़ है। लेकिन जानबूझकर दोबारा देखना या नज़र टिकाकर देखना जायज़ नहीं।

2. क्या बदनज़री सिर्फ़ मर्दों के लिए मना है?

नहीं। क़ुरआन करीम में मर्दों और औरतों दोनों को अपनी निगाहें नीची रखने और शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करने का हुक्म दिया गया है।

3. बदनज़री के क्या नुकसान हैं?

बदनज़री दिल को गुनाह की तरफ़ ले जाती है, शहवत को बढ़ाती है, इबादत की लज़्ज़त कम कर देती है, दिल का सुकून छीन लेती है और बड़े गुनाहों की शुरुआत बन सकती है।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

4. अगर रास्ते में अचानक किसी गैर-महरम पर नज़र पड़ जाए तो क्या करें?

फ़ौरन अपनी नज़र फेर लें और दोबारा देखने से बचें। यही सुन्नत और शरीअत की तालीम है।

5. क्या डॉक्टर या ज़रूरत के समय गैर-महरम को देखना जायज़ है?

अगर शरई ज़रूरत हो, जैसे इलाज, गवाही या न्यायिक कार्य, तो केवल ज़रूरत भर देखना जायज़ है। बिना ज़रूरत नज़र टिकाना सही नहीं।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

6. क्या बदनज़री से ईमान पर असर पड़ता है?

हाँ। हदीसों में बताया गया है कि बदनज़री ईमान को कमज़ोर करती है, जबकि अल्लाह के डर से नज़र बचाने वाले को ईमान की मिठास और इबादत की लज़्ज़त नसीब होती है।

7. नज़र की हिफ़ाज़त कैसे करें?

  • अपनी निगाहें नीची रखें।
  • गैर-महरम को घूरने से बचें।
  • फ़ितने वाले माहौल और कंटेंट से दूर रहें।
  • क़ुरआन की तिलावत और ज़िक्र की आदत बनाएँ।
  • अल्लाह से इस्तिक़ामत और नज़र की हिफ़ाज़त की दुआ करें।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

8. क्या बदनज़री से तौबा क़ुबूल होती है?

जी हाँ। अगर इंसान सच्चे दिल से तौबा करे, गुनाह छोड़ दे और दोबारा न करने का पक्का इरादा करे, तो अल्लाह तआला बहुत ग़फ़ूर और रहीम है।Pehli Nazar maaf dusri Haram.

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।

जज़ाकल्लाह खैर….

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