दुआ मोमिन की सबसे बड़ी ताक़त और सबसे अज़ीम इबादतों में से एक है। जब इंसान अपने दोनों हाथ उठाकर पूरे यक़ीन और इख़लास के साथ अल्लाह तआला से दुआ करता है, तो वह अपने रब से सीधा रिश्ता जोड़ता है। क़ुरआन और हदीस में दुआ की ऐसी फ़ज़ीलत बयान की गई है कि अल्लाह तआला अपने बंदों को बार-बार दुआ करने का हुक्म देता है और उसकी क़ुबूलियत का वादा भी फ़रमाता है।
इस लेख में हम दुआ माँगने की फ़ज़ीलत, दुआ की अहमियत, दुआ की क़ुबूलियत और इस विषय में 11 बेहतरीन हदीसों को आसान भाषा में जानेंगे। अगर आप भी चाहते हैं कि आपकी दुआएँ क़ुबूल हों और अल्लाह तआला की रहमतें आप पर नाज़िल हों, तो इस पोस्ट को आखिर तक ज़रूर पढ़ें।Dua Mangne Ki Fazilat
दुआ माँगने की फ़ज़ीलत का बयान
हदीस शरीफ में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया : “दुआ माँगना भी बिल्कुल इबादत करने की तरह है। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दलील के तौर पर कुरआन करीम की यह आयत तिलावत फरमाई :
तर्जुमा – “और तुम्हारे पर्वरदिगार ने फरमाया है मुझ से दुआ माँगा करो, मैं तुम्हारी दुआ कुबूल करूँगा। बेझिझक जो लोग तकब्बुर की वजह से मेरी इबादत से मुँह मोड़ते हैं वह जलील और रुसवा हो कर ज़रूर ही जहन्नम में दाखिल होंगे।” (पारा 24, सूरः मोमिन, आयत 60)Dua Mangne Ki Fazilat
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वस्ललम ने इरशाद फरमयाः
“तुम में से जिस शख़्स के लिये दुआ का दरवाज़ा खोल दिया गया यानी दुआ माँगने की तौफीक दे दी उस के लिये रहमत के दरवाज़े खोल दिये गये। अल्लाह पाक से जो दुआएँ माँगी जाती हैं उन में अल्लाह पाक को सब से अधिक पसंद यह है कि उस से (दुनिया और आखिरत में अम्न और सुकून की दुआ माँगी जाये।
इसी हदीस की दूसरी सनद में “उस के लिये जन्नत के दरवाज़े खोल दिये गये” आया है। और एक दूसरी सनद में “उस के लिये क़ुबूलियत के दरवाजे खोल दिये गये” आया है। और तीनों शब्दों का मतलब एक ही है।
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :
“दुआ के अलावा कोई चीज़ तक़दीर के फैसले को रद्द नहीं कर सकती, नेक अमल के अलावा कोई चीज उम्र को बढ़ा नहीं सकती।Dua Mangne Ki Fazilat
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया : तक़दीर के फैसले से बचने में कोई उपाय काम नहीं देता (हाँ) अल्लाह से दुआ माँगना उस आफत और मुसीबत में फायदा पहुँचाता है जो नाज़िल हो चुकी है, और उस मुसीबत में भी जो अभी तक नाज़िल नही हुई।
और बेशक बला नाज़िल होने को होती है कि इतने में दुआ उस से जा मिलती है, इसलिये क़यामत तक इन दोनों में खींचा तानी होती रहती हैं और इस तरह इन्सान दुआ की बदौलत उस बला और मुसीबत से छुटकारा पा जाता है
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया :
“अल्लाह पाक के नज़दीक दुआ से ज्यादा और किसी चीज की अहमियत नही”
एक और हदीस में नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:
“जो शख्स अल्लाह से कोई सवाल नहीं करता, अल्लाह पाक उस से नाराज़ हो जाते हैं।”Dua Mangne Ki Fazilat
इसी हदीस की दूसरी सनद में “जो अल्लाह से नहीं माँगता वह उस से नाराज़ हो जाता है” आया है और दोनों का मतलब एक ही है।
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा को मुख़ातिब कर के फरमाया :
“तुम अल्लाह से दुआ माँगने में आजिज़ न बनो यानी कोताही न करो इसलिए कि दुआ करते रहने की सूरत में कोई शख्स हरगिज़ अचानक किसी आफत से हलाक न होगा।”
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:
“जो शख़्स यह चाहे कि अल्लाह तआला उस की दुआ मुसीबत और परेशानी के समय कुबूल फरमायें उसे चाहिये कि वह अच्छी हालत में भी अधिक से अधिक दुआ माँगा करे।”Dua Mangne Ki Fazilat
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया :
“दुआ मोमिन का हथियार है, दीन का सुतून है, आसमान और ज़मीन का नूर है”
एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक ऐसी कौम के पास से गुज़रे जो किसी मुसीबत में गिरिफतार थी तो उन की हालत को देख कर आप सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
और ऐसा मालूम होता है कि यह लोग अल्लाह पाक से अम्न सुकून की दुआ नहीं माँगा करते थे।”
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एक और हदीस में आया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया :
“जो भी मुसलमान कुछ माँगने के लिये अल्लाह पाक की ओर अपना मुँह उठाता है और दुआ माँगता है तो अल्लाह पाक उस को वह चीज़ यक़ीनन देते हैं। या वही चीज उस को तुरन्त दे देते हैं, या उस के लिए दुनिया और आखिरत में उस को जमा कर देते हैं। “Dua Mangne Ki Fazilat
सवाल व जवाब
1. दुआ क्या है?
दुआ अल्लाह तआला से अपनी ज़रूरत, मदद, रहमत और मग़फ़िरत माँगने का नाम है। यह एक महान इबादत है, जिससे बंदा अपने रब के क़रीब होता है।
2. क्या दुआ करना भी इबादत है?
जी हाँ। हदीस शरीफ़ में नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया कि “दुआ ही इबादत है।” इसलिए हर मुसलमान को ज़्यादा से ज़्यादा दुआ करनी चाहिए।
3. दुआ कब सबसे ज़्यादा क़ुबूल होती है?
दुआ की क़ुबूलियत के कई मुबारक वक़्त हैं, जैसे:
- तहज्जुद का वक़्त
- अज़ान और इक़ामत के बीच
- सज्दे की हालत में
- जुमे के दिन
- रोज़ेदार की इफ़्तार से पहले
- सफ़र के दौरान
4. क्या दुआ तक़दीर बदल सकती है?
हदीसों में आया है कि दुआ अल्लाह के हुक्म से आने वाली मुसीबतों को टालने और आसानी का ज़रिया बनती है। इसलिए हर हाल में दुआ करते रहना चाहिए।
5. अगर दुआ तुरंत क़ुबूल न हो तो क्या करें?
मायूस नहीं होना चाहिए। अल्लाह तआला हर दुआ सुनता है। कभी उसी वक़्त पूरी करता है, कभी बेहतर समय के लिए रख देता है और कभी उसके बदले कोई बड़ी मुसीबत टाल देता है।
6. दुआ करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
- सिर्फ़ अल्लाह तआला से दुआ करें।
- पूरे यक़ीन और इख़लास के साथ दुआ करें।
- हलाल रोज़ी कमाएँ।
- सब्र रखें और जल्दबाज़ी न करें।
- अल्लाह की हम्द और नबी-ए-करीम ﷺ पर दरूद शरीफ़ पढ़कर दुआ शुरू और खत्म करें।
7. क्या हर मुसलमान को रोज़ दुआ करनी चाहिए?
जी हाँ। दुआ सिर्फ़ मुसीबत के समय ही नहीं, बल्कि खुशहाली और आसानी के दिनों में भी करनी चाहिए। इससे अल्लाह तआला की रहमत और बरकत नसीब होती है।
8. दुआ का सबसे बड़ा फ़ायदा क्या है?
दुआ से बंदे का अल्लाह पर भरोसा मज़बूत होता है, दिल को सुकून मिलता है, गुनाह माफ़ होते हैं, रहमतें नाज़िल होती हैं और दुनिया व आख़िरत की भलाई हासिल होती है।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
