Musibat Aur Bimari Par Sabr Karne Ka Sawab
इंसान की ज़िंदगी में कभी न कभी बीमारी, तकलीफ़, परेशानी और मुसीबत ज़रूर आती है। ऐसे वक़्त में बहुत से लोग मायूस हो जाते हैं, जबकि इस्लाम हमें सब्र, अल्लाह पर भरोसा और उसकी रहमत की उम्मीद रखने की तालीम देता है।
क़ुरआन और हदीस में बार-बार बताया गया है कि अगर एक मोमिन अपनी बीमारी और मुसीबत पर सब्र करता है, तो अल्लाह तआला उसके गुनाहों को माफ़ फ़रमाता है, उसके दर्जे बुलंद करता है और उसे बड़ा अज्र व सवाब अता फ़रमाता है।
इस आर्टिकल में हम हदीस की रौशनी में जानेंगे कि मुसीबत और बीमारी पर सब्र करने का क्या सवाब है, अल्लाह तआला सब्र करने वालों से क्यों खुश होता है और एक मोमिन को मुश्किल हालात में कैसा रवैया अपनाना चाहिए। आइए, इन ईमान अफ़रोज़ हदीसों और नसीहतों को आसान हिंदी में समझते हैं।
मुसीबतों और तकलीफों पर सब्र करने की फज़ीलत और जिस्मानी बीमारियों पर सब्र करने का सवाब:
हदीसः हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि एक बार हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उम्मे साइब रज़ियल्लाहु अन्हा के पास तशरीफ ले गये (यह एक सहाबी औरत थीं) आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनका हाल देखकर दरियाफ्त कियाः तुम क्यों कपकपा रहीं हो? कहने लगीं बुख़ार चढ़ा हुआ है, इसका नास हो। आपने इरशाद फरमायाः बुख़ार को बुरा न कहो, क्योंकि यह इनसानों के गुनाहों को इस तरह दूर कर देता है जैसे लोहे के मैल-कुचैल को आग की भट्टी दूर कर देती है। (मिश्कात शरीफ पेज 135)
तशरीहः औरतों को कोसने-पीटने और दुनिया भर की चीज़ों को बुरा-भला कहने की आदत होती है। बच्चों को भी कोसती रहती हैं। जानवरों तक के बारे में उल्टे-सीधे अलफाज़ इस्तेमाल करती हैं।
हज़रत उम्मे साइब रज़ियल्लाहु अन्हा को बुख़ार चढ़ा हुआ था, नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनकी मिज़ाज-पुरसी फ़रमायी, और हाल मालूम किया। उन्होंने औरतों की आदत के मुताबिक कह दिया कि बुखार ने तकलीफ़ दे रखी है, खुदा इसका बुरा करे।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह बात पसन्द न आई। आपने फरमाया कि बुख़ार को बुरा न कहो, क्योंकि उसने कोई ख़ता नहीं की, और यह मोमिन बन्दों का मोहसिन (एहसान करने वाला) भी है, क्योंकि बुख़ार की वजह से गुनाह धुल जाते हैं और ख़ताएँ दूर हो जाती हैं। जो चीज़ गुनाह माफ कराने का जरिया हो उसको बुरा कहना मोमिन की शान नहीं है।
एक बार नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मजलिस में बुख़ार का ज़िक्र हुआ। मजलिस में मौजूद किसी ने बुख़ार को बुरा कह दिया। उस शख़्स से भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यही फरमाया कि उसे बुरा-भला न कहो, क्योंकि यह गुनाहों से ऐसा साफ करते हैं जैसे आग लोहे का मैल-कुचैल साफ़ कर देती है। (इब्ने माजा)
एक और हदीस में है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बीमार की इयादत की यानी उनकी बीमारी क हाल पूछा उनको भी बुख़ार चढ़ा हुआ था। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे फरमाया कि तुम खुश हो जाओ क्योंकि अल्लाह तआला ने फरमाया है कि यह बुख़ार मेरी पैदा की हुई ख़ास किस्म की आग है। दुनिया में अपने मोमिन बन्दों पर मुसल्लत करता हूँ ताकि गुनाहों की वजह से कियामत के दिन जो आग का अज़ाब होना है उसके बदले यह बुख़ार की तकलीफ़ दुनिया में उसकी जगह ले ले। (इब्ने माजा)
बीमारी की शक्ल में जो तकलीफें मोमिन बन्दों को होती हैं, मुबारक हैं। अल्लाह तआला से तकलीफ माँगनी तो न चाहिये लेकिन अगर तकलीफ आ जाये तो दिल की खुशी से सब्र करो। आफियत की दुआ भी करते रहो, लेकिन तकलीफ की वजह से अज्र व सवाब की भी पुख़्ता उम्मीद रखो। बीमारियाँ गुनाहों के लिए कफ़्फ़ारा (गुनाहों को धोने वाली) बन जाती हैं, और सवाब की उम्मीद रखने से बीमारी की तकलीफ हल्की हो जाती है।
मोमिन बन्दों की अजीब शान है, तन्दुरुस्त होते हैं तो खूब इबादत करते हैं, बीमार होते हैं तो सब्र करके सवाब पाते हैं। और बीमारी गुनाहों का क़फ़्फ़ारा (गुनाहों को धोने वाली) बन जाती है और चूँकि बीमारी बहुत बड़ा फायदा है इसलिए मोमिन बन्दों के हक़ में बीमारी मुसीबत नहीं रहती और तकलीफ़ की वजह से जो नेक आमाल छूट जाते हैं उनका सवाब भी मिलता है।
हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जब तकलीफ़ वाले बन्दों को कियामत के दिन सवाब मिलने लगेगा तो आफियत वाले लोग जो बीमार नहीं होते थे, तमन्ना करेंगे कि काश! दुनिया में हमारी खालें कैंचियों से काटी जातीं। ताकि बहुत ज़्यादा अज्र व सवाब के हकदार होते)। (तिर्मिज़ी शरीफ)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैं एक बार नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास हाज़िर हुआ। उस वक़्त आप बुख़ार में मुब्तला थे। मैंने जो हाथ लगाया तो बहुत तेज़ बुख़ार महसूस हुआ। अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! आपको बहुत सख़्त बुखार आता है? फ़रमाया हाँ! मेरा बुख़ार तुम में से दो आदमियों के बुख़ार के बराबर होता है।
मैंने अर्ज़ किया यह इस वजह से है कि आपका सवाब दोहरा है? फरमाया हाँ! उसके बाद इरशाद फरमायाः जिस किसी मुसलमान को बीमारी या और किसी वजह से तकलीफ पहुँचे तो अल्लाह तआला ज़रूर उसके ज़रिये से उसके गुनाहों को इस तरह मिटा देंगे जैसे दरख़्त से पत्ते गिर जाते हैं। (बुख़ारी व मुस्लिम)
एक हदीस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मोमिन की ऐसी मिसाल है जैसे खेती के पौधों को हवायें झुकाती चली जाती हैं। कभी गिराती हैं, कभी सीधा कर देती हैं। इसी तरह मोमिन बन्दा कुछ न कुछ दुख-तकलीफ में रहता है, यहाँ तक कि उसकी मौत आ जाये। और मुनाफिक की मिसाल ऐसी है जैसे सर्व का पेड़ जो अच्छी तरह से ज़मीन में जमा हुआ और सख़्त हो। हवायें उसे हिलाती-झुलाती नहीं हैं यहाँ तक कि उसका उखड़ना एक ही बार में हो जाता है। (बुख़ारी व मुस्लिम)
मतलब यह है कि मुनाफिक को चूँकि आख़िरत में बख़्शना नहीं है इसलिए उसकी ख़ताओं के बख़्शने के इन्तिज़ार की ज़रूरत नहीं। लिहाज़ा बीमारियाँ भेजकर उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा गुनाहों को ख़त्म करने वाला नहीं किया जाता। ज़िन्दगी भर ठीक-ठाक ऐश व आराम और मज़े से रहता है, फिर जब आख़िरत में अज़ाब होगा तो बहुत ही सख़्त होगा।
एक बार हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया बेशक मोमिन बन्दा जब बीमार हो जाये फिर अल्लाह उसको आराम दे दें, तो यह उसके पिछले गुनाहों का कफ़्फ़ारा गुनाहों का बदला हो जाता है, और आईन्दा के लिए नसीहत हो जाती है।
कि गुनाहों से परहेज़ करे और जब मुनाफिक कभी-कभार बीमार हो जाता है और उसके बाद आफियत चैन-सुकून पा लेता है तो उससे कोई सबक नहीं लेता। उसकी ऐसी मिसाल है जैसे ऊँट को उसके मालिकों ने बाँध दिया, फिर छोड़ दिया। उसे कुछ पता न चला कि उन्होंने क्यों बाँधा और फिर क्यों छोड़ा?
मजलिस में यह बात हो ही रही थी कि एक शख़्स ने कहाः या रसूलल्लाह! बीमारी क्या चीज़ है? मैं तो कभी बीमार ही नहीं हुआ। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हमारे पास से उठ जा, क्योंकि तू हमारी जमाअत में से नहीं है। (अबू दाऊद शरीफ)
देखो! कैसी बड़ी बात है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस शख़्स को फरमा दिया कि तू हमारी जमाअत में से नहीं है। इससे मालूम हुआ कि दुख-तकलीफ मोमिन की ख़ास निशानी है, और उससे घबराना नहीं चाहिये। और बीमारी को बुरा कहना इस वजह से भी दुरुस्त नहीं है कि उसके ज़रिये गुनाह माफ होते हैं, और इस वजह से भी कि बीमारी अल्लाह का भेजी हुई है। जो तकलीफ है अल्लाह के हुक्म से है, इसमें बीमारी और मुसीबत का क्या कसूर है? कायनात का पैदा करने वाला यानी अल्लाह पाक जो चाहेगा वह होगा।
तकलीफों और मसीबतो पर सब्र करने का सवाब
हदीसः हज़रत अता रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुझसे फरमाया कि मैं तुम्हें एक जन्नती औरत् न दिखाऊँ? मैंने अर्ज किया हाँ! ज़रूर दिखायें इस पर उन्होंने एक औरतं की तरफ इशारा करते हुए फरमाया कि देखो यह काले रंग की औरत है इसके बारे में जन्नती होने की खुशखबरी है। किस्सा इसका यह है कि यह नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुई और अर्ज़ कियाः या रसूलल्लाह! मुझे मिर्गी का दौरा पड़ जाता है और उस दौरे में मेरे बदन के हिस्सों से कपड़ा हट जाता है और जिस्म के अंग खुल जाते हैं।
आप सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम अल्लाह पाक से दुआ फरमा दीजिये कि मेरी यह तकलीफ दूर हो जाये। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अगर तुम चाहो तो सब्र करो, तुम्हें उसके बदले जन्नत मिलेगी, और अगर तुम चाहो तो मैं दुआ कर दूँगा कि अल्लाह पाक आफियत चैन-सुकून दे दे। यह सुनकर उन्होंने कहा कि मैं सब्र करती हूँ। आप यह दुआ फरमा दें कि दौरे के वक़्त मेरे कपड़े न खुला करें। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसके लिए यह दुआ फरमा दी। (मिश्कात शरीफ पेज 137)
तशरीहः इस हदीस में भी यही बात बतायी और समझायी गयी है कि बीमारियाँ और तकलीफें मोमिन बन्दों के लिए नेमत हैं। जो शख़्स मर्द हो या औरत तकलीफ पर सब्र कर ले और बीमारी की बेचैनी को सह ले उसके लिए बड़े दरजे हैं।
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सहाबी मर्द और औरतें हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातों पर पुख़्ता यकीन रखते थे और जन्नत मिल जाने को बड़ी दौलत समझते थे, इसी वजह से तो उस सियाह-फाम (काले रंग की) औरत ने जिसका हदीस शरीफ में ज़िक्र हुआ जन्नत की खुशख़बरी का यकीन रखते हुए सब्र ही को इख़्तियार किया, और हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से आफियत की दुआ न कराने की तरजीह दी।
अलबत्ता इस दुआ की ख़्वाहिश की कि दौरा पड़ने के वक़्त जिस्म न खुला करे। इस ज़माने के लोग कुरआन व हदीस की तालीमात से दूर जा रहे हैं, इसलिए कोई तकलीफ आती है तो बेसब्री में चीख उठते हैं और बीमारी पर सब्र करके अज्र व सवाब लेने पर ज़रा भी ज़ेहन नहीं ले जाते।
हसूर यहया बिन सईद ताबिई रहमतुल्लाहि अलैहि का बयान है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मौजूदगी में एक शख़्स बीमारी में मुब्तला हुए बगैर वफात पा गये। यह सुनकर हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः कैसी अफ़सोसनाक बात कह रहे हो, तुम्हें पता नहीं, अगर अल्लाह उसको बीमारी में मुब्तला फरमाते तो उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा फ़रमा देते। यानी उसके गुनाहों को माफ फरमा देते)।(मुवत्ता इमाम मालिक)
एक हदीस में है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से दरियाफ्त किया गया कि किन लोगों को ज़्यादा तकलीफ़ में डाला जाता है। आप सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः सबसे ज़्यादा तकलीफ में हज़रात अम्बिया अलैहिमुस्सलाम मुब्तला होते हैं। फिर उनके बाद जो जिस कद्र ऊँचे दरजे वाला होता है उसी कद्र तकलीफों में मुब्तला होता है। फिर फरमाया इनसान अपनी दीनी हैसियत के मुताबिक मुब्तला किया जाता है।
अगर दीन में सख़्त है तो उसकी तकलीफ और सख़्त हो जाती है, और अगर अपने दीन में नर्म यानी कमज़ोर है तो उसके लिए खुदा पाक की तरफ से आसानी कर दी जाती है। बराबर इसी तरह तकलीफें रहती हैं यहाँ तक कि यह दीन से जुड़ा हुआ शख़्स ज़मीन पर इस हाल में चलता-फिरता है कि उसपर तकलीफों की वजह से कोई गुनाह बाकी नहीं रहता। (तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जब अल्लाह तआला अपने बन्दे के साथ भलाई का इरादा फरमाते हैं तो उसके गुनाहों की सज़ा दुनिया में ही मौत से पहले दे देते हैं। और जब किसी को अज़ाब में मुब्तला करना चाहते हैं तो दुनिया में उसके गुनाहों के बदले में सज़ा नहीं देते, और सज़ा को रोक लेते हैं, ताकि कियामत के दिन पूरी सज़ा दें। (तिर्मिज़ी)
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से यह भी रिवायत है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि बड़ा इनाम, बड़ी मुसीबत के साथ वाबस्ता लगा हुआ और जुड़ा हुआ है, और बेशक अल्लाह तआला जब किसी कौम से मुहब्बत फरमाते हैं तो उनको मुसीबत में मुब्तला फरमा देते हैं। उस मुसीबत पर जो खुदा तआला से राजी रहा उसके लिए अल्लाह की रिज़ा है, और जो नाराज़ हुआ अल्लाह भी उससे नाराज़ होगा।(तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)
हदीसः हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि मोमिन बन्दा मर्द हो या औरत बराबर तकलीफों में मुब्तला किया जाता है, और ये तकलीफें उसकी जान में और माल में और औलाद में आती रहती हैं। इन तकलीफों की वजह से मोमिन बन्दा इस हाल में हो जाता है कि उसपर कोई गुनाह भी बाकी नहीं रहता। (मिश्कात शरीफ पेज 136)
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तशरीहः इस हदीस से साफ मालूम हुआ कि तकलीफों की वजह से मोमिन के गुनाहों का कफ़्फ़ारा होता है। कोई ज़रूरी नहीं कि उसके लिए उसके जिस्म में ही तकलीफ पहुँचे, बल्कि उसकी जान को जो तकलीफ पहुँचे और औलाद को जो तकलीफ पहुँचे और माल में जो नुकसान पहुँचे, यह सब गुनाहों का कफ़्फ़ारा है, और यह मोमिन के हक में इस एतिबार से बेहतर भी है कि सिर्फ जिस्म ही पर सारी तकलीफें आतीं तो जीना दूभर हो जाता। गुनाहों का कफ़्फ़ारा हो जाये और दरजे बुलन्द हो जायें इसके लिए अल्लाह तआला ने मुसीबतों को बाँट दिया। कुछ जान में, कुछ माल में, कुछ औलाद में तकलीफें तकसीम कर दी गईं।
और यह बात भी जान लेनी चाहिये कि औलाद के दुख-दर्द पर औलाद को सवाब अपनी जगह मिलता है और बच्चों को जो तकलीफ होती है माँ-बाप को उनका अलग मुस्तकिल सवाब मिल जाता है। मोमिन बन्दे का काम यह है कि सब्र व शुक्र के साथ ज़िन्दगी गुज़ारता रहे। तकलीफ तो काफिरों को भी पहुँचती है, लेकिन मोमिन और काफिर की तकलीफ़ में ज़मीन-आसमान का फर्क है। मोमिन अपनी तकलीफ पर अज्र व सवाब लेता है और आख़िरत में दरजे पायेगा। और काफिर को जो तकलीफ पहुँचती है उसकी वजह से आख़िरत में उसे कुछ मिलने वाला नहीं।
गोया मुसलमान को तकलीफ पहुँचती ही नहीं, जिस तकलीफ की आख़िरत में कीमत मिल गयी वह क्या तकलीफ है? देखो! दुनिया कमाने के लिए मज़दूर और काश्तकार और व्यापारी लोग कितनी तकलीफ उठाते हैं लेकिन उस तकलीफ को खुशी से सहते हैं बल्कि तकलीफ ही नहीं समझते, क्योंकि उसका नफा मिलता रहता है।
मोमिन का हर हाल बेहतर है। तकलीफ में सब्र करता है तो उसका भी सवाब पाता है, और आराम में शुक्र करता है तो उसका भी सवाब पाता है। गरज़ यह कि चित और पट दोनों में फायदा है। जब यह बात है तो मोमिन को किसी हाल में परेशान होने का कोई मौका नहीं।
हज़रत अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः मुसलमान को जो कुछ दुख-तकलीफ, थकन और परेशानी, रंज और चिन्ता और घुटन पहुँच जाये तो उसके ज़रिये अल्लाह पाक उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा फरमा देते हैं। यहाँ तक कि अगर काँटा भी लग जाये तो वह भी गुनाहों के माफ होने का ज़रिया बन जाता है। (बुख़ारी व मुस्लिम)
FAQ (सवाल व जवाब)
Q1. इस्लाम में मुसीबत और तकलीफ़ क्यों आती है?
Ans: मुसीबत और तकलीफ़ इंसान की आज़माइश होती है। अल्लाह तआला इनके ज़रिए ईमान की परीक्षा लेते हैं, गुनाहों को माफ़ फ़रमाते हैं और बंदे के दर्जे बुलंद करते हैं।
Q2. क्या बीमारी पर सब्र करने से गुनाह माफ़ हो जाते हैं?
Ans: जी हाँ। हदीस शरीफ़ के मुताबिक, बीमारी और तकलीफ़ मोमिन के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती है, बशर्ते वह सब्र करे और अल्लाह से अज्र की उम्मीद रखे।
Q3. क्या बीमारी को बुरा-भला कहना सही है?
Ans: नहीं। नबी-ए-करीम ﷺ ने बीमारी और बुख़ार को बुरा कहने से मना फ़रमाया है, क्योंकि यह गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया बनते हैं।
Q4. मुसीबत आने पर एक मुसलमान को क्या करना चाहिए?
Ans: मुसीबत के वक़्त सब्र करना चाहिए, अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए, दुआ करनी चाहिए और उसकी रहमत से कभी मायूस नहीं होना चाहिए।
Q5. क्या हर बीमारी अल्लाह की तरफ़ से होती है?
Ans: जी हाँ। हर बीमारी और हर शिफ़ा अल्लाह तआला के हुक्म से होती है। इसलिए इलाज करना भी चाहिए और साथ ही अल्लाह से शिफ़ा की दुआ भी करनी चाहिए।
Q6. क्या मुसीबत पर सब्र करने वालों के लिए जन्नत की खुशखबरी है?
Ans: जी हाँ। कई हदीसों में सब्र करने वाले मोमिनों के लिए बड़े अज्र, ऊँचे दर्जे और जन्नत की खुशखबरी बयान की गई है।
Q7. क्या माल, औलाद या रोज़गार में होने वाला नुकसान भी गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन सकता है?
Ans: जी हाँ। हदीसों के मुताबिक, जान, माल और औलाद में आने वाली तकलीफ़ें भी मोमिन के लिए गुनाहों की माफ़ी और सवाब का ज़रिया बन सकती हैं।
Q8. क्या बीमारी में इलाज करवाना चाहिए या सिर्फ़ सब्र करना चाहिए?
Ans: इस्लाम इलाज करने की भी तालीम देता है। इसलिए इलाज कराना, दवा लेना और साथ में सब्र व दुआ करना—तीनों बातें अपनानी चाहिए।
Q9. सबसे ज़्यादा आज़माइश किन लोगों पर आती है?
Ans: हदीस शरीफ़ के मुताबिक, सबसे ज़्यादा आज़माइश अल्लाह के नबियों पर आई, फिर उनके बाद नेक और दीनदार लोगों पर उनके दर्जे के मुताबिक आज़माइश आती है।
Q10. मुसीबत के समय सबसे बेहतर अमल क्या है?
Ans: सब्र करना, नमाज़ की पाबंदी करना, अल्लाह से दुआ माँगना, इस्तिग़फ़ार करना, उसकी रहमत पर भरोसा रखना और हर हाल में उसी की रज़ा पर राज़ी रहने की कोशिश करना सबसे बेहतर अमल है।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
