कबीरा गुनाहों की सूची
मुख्तसर तौर पर हम हाफिज़ ज़हबी की किताब से कबीरा यानी बड़े-बड़े गुनाहों की फेहरिस्त लिखते हैं:
(1) शिर्क और शिर्क के अलावा वे अकीदे और आमाल जिन से कुफ्र लाज़िम आता है। कुफ्र व शिर्क की कभी मग़फिरत न होगी। इसको अल्लाह तआला ने कुरआन करीम के अन्दर बिल्कुल साफ तौर पर बयान फरमाया है।
(2) किसी बेगुनाह जान को जान-बूझकर कत्ल करना।
(3) जादू करना।
(4) फर्ज़ नमाज़ को छोड़ना या वक़्त से पहले पढ़ना।
(5) ज़कात न देना।
(6) बिना शरई छूट के रमज़ान शरीफ का कोई रोज़ा छोड़ना या रमज़ान का रोज़ा रखकर बिना किसी उज़ और मजबूरी के तोड़ देना।
(7) फर्ज़ होते हुए हज किये बगैर मर जाना।
(8) माँ-बाप को तकलीफ़ देना और उन बातों में उनकी नाफरमानी करना जिनमें उनका हुक्म मानना वाजिब है।
(9) रिश्तेदारों से रिश्ता और संबन्ध ख़त्म करना।
(10) ज़िना करना।
(11) गैर-फितरी यानी कुदरत के बनाये नियम के खिलाफ तरीके पर औरत से सोहबत (संभोग) करना या किसी मर्द या लड़के से बदफैली करना।
(12) सूद का लेन-देन करना, या सूद का लिखने वाला या गवाह बनना।
(13) ज़ालिमाना तरीके पर किसी यतीम का माल खाना।
(14) अल्लाह पर या उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर झूठ बोलना।
(15) मैदाने जिहाद से भागना।
(16) जो ‘इक्तिदारे-आला’ (किसी बड़े ओहदे पर हो, उसका रईयत और अपने मातहतों को धोखा देना और खियानत करना।
(17) तकब्बुर करना।
(18) झूठी गवाही देना या किसी का हक़ मारा जा रहा हो तो जानते हुए गवाही न देना।
(19) शराब पीना या कोई नशे वाली चीज़ खाना पीना।
(20) जुआ खेलना।
(21) किसी पाकदामन औरत पर तोहमत लगाना।
(22) माले-ग़नीमत में खियानत करना।
(23) चोरी करना।
(24) डाका मारना।
(25) झूठी कसम खाना।
(26) किसी भी तरह से जुल्म करना (मार पीटकर हो या ज़ालिमाना तरीके पर माल लेने से हो या गाली-गलौज करने से हो)।
(27) टैक्स वसूल करना
(28) हराम माल खाना पीना या पहनना, या ख़र्च करना।
(29) खुदकुशी (आत्महत्या) करना या अपना कोई जिस्मानी अंग काट देना।
(30) झूठ बोलना।
(31) शरीअत के कानून के ख़िलाफ़ फैसले करना।
(32) रिश्वत लेना।
(33) औरतों का मर्दों की या मर्दों का औरतों की मुशाबहत (शक्ल व सूरत और तौर-तरीका) इख़्तियार करना (जिसमें दाढ़ी मूँडना भी शामिल है)।
(34) अपने अहल व अयाल (बाल-बच्चों और घर वालों) में गन्दे और अश्लील काम या बेहयाई होते हुए दूर करने की फिक्र न करना।
(35) तीन तलाक दी हुई औरत के पुराने शौहर का हलाला करवाना और उसके लिए हलाला करके देना।
(36) बदन या कपड़ों में पेशाब लगने से एहतियात न करना।
(37) दिखावे के लिए आमाल करना।
(38) दुनिया कमाने के लिए दीन का इल्म हासिल करना और दीन की बात को छुपाना।
(39) खियानत करना।.
(40) किसी के साथ अच्छा सुलूक या कोई भलाई करके एहसान जताना।
(41) तक़दीर को झुठलाना।
(42) लोगों के खुफिया हालात की टोह लगाना, जासूसी करना और कन्सूई लेना।
(43) चुगली खाना।
(44) लानत बकना ।
(45) धोखा देना और जो अहद किया हो उसको पूरा न करना।
(46) काहिन और मुनज्जिम (गैब की ख़बरें बताने वाले) की तस्दीक (यानी उसकी बात का यकीन और पुष्टी) करना।
(47) शौहर की नाफरमानी करना।
(48) तस्वीर बनाना या घर में लटकाना।
(49) किसी की मौत पर नौहा करना, मुँह पीटना, कपड़े फाड़ना, सिर मुंडाना, हलाकत की दुआ करना।
(50) सरकशी करना, अल्लाह का बाग़ी होना, मुसलमानों को तकलीफ़ देना।
(51) मख्लूक पर हाथ उठाना।
(52) पड़ोसी को तकलीफ़ देना।
(53) मुसलमानों को तकलीफ देना और उनको बुरा कहना।
(54) ख़ास कर अल्लाह के नेक बन्दों को तकलीफ देना।
(55) टख़ने पर या इससे नीचे कोई कपड़ा पहना हुआ लटकाना।
(56) मर्द को रेशम और सोना पहनना।
(57) गुलाम का आका से भाग जाना।
(58) अल्लाह के अलावा किसी और के लिए जिबह करना।
(59) जानते बूझते हुए अपने बाप को छोड़कर किसी दूसरे को बाप बना लेना। यानी यह दावा करना कि फलाँ मेरा बाप है हालाँकि वह उसका बाप नहीं।
(60) फसाद के तौर पर लड़ाई झगड़ा करना।
(61) (ज़रूरत के वक़्त) बचा हुआ पानी दूसरों को न देना।
(62) नाप-तौल में कमी करना।
(63) अल्लाह की पकड़ से बेख़ौफ़ हो जाना।
(64) औलिया-अल्लाह (अल्लाह के नेक बन्दों) को तकलीफ़ देना।
(65) नमाज़ बा-जमाअत की पाबन्दी न करना।
(66) बगैर शरई उज़ के जुमे की नमाज़ छोड़ देना।
(67) ऐसी वसीयत करना जिससे किसी वारिस को नुक्सान पहुँचाना मकसूद हो।
(68) मक्र करना और धोखा देना।
(69) मुसलमानों के पोशीदा हालात की टोह लगाना और उनकी पोशीदा चीज़ों को ज़ाहिर करना।
(70) किसी सहाबी या नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथी को गाली देना।
खूबसूरत बयान:ग़ीबत: एक गुनाह जो जन्नत से दूर कर सकता है | Geebat ek Gunah Jo Jannat Se dur kar sakta hai
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
