जिमाअ से वह रद्दी फुज़्ला जो जिस्म में बेकार जमा हो जाता है वह ख़ारिज हुआ करता है जिससे जिस्म हल्का, तबीअत चाको चोबंद, मिज़ाज शगुफ्ता, दिलो दिमाग़ मुफर्रह हो जाता है और जिस्मे जदीद ग़िज़ा का तालिब और खून की इस्लाह पर आमादा हो जाता है।
कुव्वते ग़ज़बिया ज़ाइल हो जाती है और तफ्क्कुरात, फासिद ख्यालात दूर हो जाते हैं।फुज़्ल ए मनी का निकल जाना हज़ारों मर्जो को दफा कर देता है और अर्से तक बावुजूद तबई ख़्वाहिश के जिमाअ न करे तो मनी अपनी जगह कसरत से जमा होकर फासिद हो जाती है और अस्ली हरारते गरेज़ी यानी बदन की कुद्रती गर्मी पर ग़ालिब आकर मुखतलिफ किस्म के अम्राज़े रद्दिया पैदा कर देती है।
इसलिये ज़्यादा दिनों तक मनी को निकलने से रोकना सेहत के लिये नुक्सान दह और मुज़िर है। बसा औकात ख़्वाह मख्वाह जिमाअ से रूके रहने से दिमाग में ज़हरीले आबखरात मुनजमिद हो जाते हैं, जिससे रगों में खुश्की और तरह-तरह की बीमारियाँ लाहिक हो जाती हैं। किसी को देखने और छूने का बयान।
जैसे वसवसा, जुनून, मिर्गी, सरआ, वगैरह। जिन लोगों में कुव्वते बाह ज़्यादा हो उनके लिये तर्के जिमाअ सख़्त नुक्सान दह है। जिमाअ सेहतो तंदरूस्ती का मुहाफिज़ है। खास तौर से सौदावी मरीज़ के लिये तो बेहद मुफीद है। जिमाअ से सर चकराना, जोड़ों का दर्द, जोड़ों की सूजन, दिल पर जलन वगैरह बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।(इशरतुल उश्शाक पेज 38/42)
जिमाअ के मुतअल्लिक याद रखना चाहिये ग़ालिब न हो और मनी मुस्तअिद न हो, जिमाअ कि जब तक शहवत करना मुनासिब नहीं लेकिन जब वह हालत पाई जाए तो फौरन मनी खारिज करनी चाहिये। जिस तरह रद्दी फुज़्ला पेशाबो पाखाना से खारिज किया जाता है क्योंकि उस वक़्त मनी के रोकने मे बड़े नुक्सान का अन्देशा है।(मुजर्रबाते सुयूती पेज 40)
उम्दा जिमाअ वह कहलाता है जिसका नतीजा दिल की ताज़गी और तबीअत को फरहतो सुरूर हो। बुरा जिमाअ वह है जिसका नतीजा लर्जी व तंगीए नफ़्सो दिल की कम्ज़ोरी और तबीअत का मत्लाना और महबूबा का पसंद न आना हो। (मुजर्रबाते सुयूती पेज 41)
जिमाअ सिर्फ मज़ा लेने या शहवत की आग बुझाने की नियत से न हो बल्कि यह नियत हो कि ज़िना से बचूंगा और औलाद सालेह व नेक सीरत पैदा होगी। अगर इस नियत से जिमाअ करेगा तो सवाब भी पायेगा। (कीमिया ए सआदत पेज 255)
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे, हमे एक और नेक बनाए, सिरते मुस्तक़ीम पर चलाये, हम तमाम को नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और इताअत की तौफीक आता फरमाए, खात्मा हमारा ईमान पर हो। जब तक हमे ज़िन्दा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे, आमीन ।
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क्या पता अल्लाह ताला को हमारी ये अदा पसंद आ जाए और जन्नत में जाने वालों में शुमार कर दे। अल्लाह तआला हमें इल्म सीखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की तौफीक अता फरमाए । आमीन ।
खुदा हाफिज…
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