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हुदैबिया की सुलह: हार या फ़त्ह? | वो वाक़िया जिसने 1400 से 10,000 मुसलमानों तक का रास्ता खोल दिया| Hudaibiya Ki Sulah: Haar Ya Fatah? | Wo Waqia Jisne 1400 Se 10,000 Musalmanon Tak Ka Rasta Khol Diya amazing story

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Hudaibiya Ki Sulah: Haar Ya Fatah?
Hudaibiya Ki Sulah: Haar Ya Fatah?

Hudaibiya Ki Sulah: Haar Ya Fatah?

हुदैबिया का वाक़िआ इस्लामी तारीख़ का एक ऐसा अज़ीम वाक़िआ है, जिसे पढ़कर इंसान को अल्लाह की हिकमत और रसूलुल्लाह ﷺ की दूरअंदेशी का अंदाज़ा होता है। देखने में तो यह एक ऐसा मुआहदा था जिसमें मुसलमानों को कुछ ऐसी शर्तें मंज़ूर करनी पड़ीं जो उस वक़्त कई सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को सख़्त नागवार गुज़रीं। लेकिन आगे चलकर यही मुआहदा “फ़त्हे मुबीन” यानी खुली फ़त्ह का सबब बना।

6 हिजरी में रसूलुल्लाह ﷺ अपने करीब 1400 सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के साथ उमरा की नीयत से मक्का मुकर्रमा की तरफ़ रवाना हुए। सहाबा इहराम में थे, दिलों में बैतुल्लाह की ज़ियारत की तमन्ना थी, मगर कुरैश ने उन्हें मक्का में दाख़िल होने से रोक दिया। हालात बेहद नाज़ुक थे और किसी भी वक़्त टकराव का अंदेशा पैदा हो सकता था।

इसी दौरान हुदैबिया में एक ऐसा मुआहदा हुआ, जिसकी कुछ शर्तें ज़ाहिरी तौर पर मुसलमानों के लिए मुश्किल और एकतरफ़ा महसूस होती थीं। लेकिन अल्लाह तआला को मालूम था कि इस मुआहदे के पीछे कितनी बड़ी मस्लहत छिपी हुई है।

और फिर उसी मुक़ाम पर बैअते रिज़वान का वह अज़ीम मंज़र पेश आया, जब सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने रसूलुल्लाह ﷺ के हाथ पर अपनी जान तक क़ुर्बान करने का अहद किया।

तो आख़िर हुदैबिया में ऐसा क्या हुआ था कि एक ज़ाहिरी तौर पर मुश्किल मुआहदा “फ़त्हे मुबीन” बन गया? आइए, इस अज़ीम वाक़िए को तफ़्सील से समझते हैं और जानते हैं कि हुदैबिया हमें सब्र, इताअत, भरोसे और अल्लाह की हिकमत के बारे में क्या बड़ा सबक़ देता है।

हुदैबिया का वाक़िया

हुदैबिया मक्का मुकर्रमा से जिद्दा की तरफ़ एक मंज़िल पर वाके एक कुएं का नाम है। यही वह जगह है जिसके साथ ‘फ़त्हे मुबीन’ यानी खुली जीत और बैअते रिज़वान की मुक़द्दस तारीख़ जुड़ी हुई है।

6 हिजरी मुताबिक़ फ़रवरी 628 ई० माह ज़ीक़ादा, दिन सोमवार, वह मुबारक वक़्त था कि सरवरे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम चौदह सौ सहाबा के साथ उमरा की अदाएगी के इरादे से मक्का मुअज़्ज़मा रवाना हुए और जब जुल-हुलैफ़ा पहुंचे, तो कुरबानी के जानवरों के क़ालादा डाला और एहराम बांधा और बनी खुगायाके एक आदमी को जासूस बनाकर भेजा कि वह कुरैश के हालात का अन्दाज़ा लगाकर ख़बर दे।

हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब ग़दीर अशतात पंहुचे तो जासूस ने आकर ख़बर दी कि कुरैश को आपकी आमद की इत्तिला हो चुकी है और वे क़बीलों को जमा करके मुकाबले की तैयारियों में लगे हैं, उनका इरादा है कि आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मक्का मुकर्रमा में दाखिल न होने दें।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबा रजि० से मश्विरा फ़रमाया तो सिद्दीक़े अकबर रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज किया-‘खुदा के रसूल ! हम तो बैतुल्लाह के इरादे से निकले हैं, लड़ाई या क़त्ल व किताल हमारा मक़सद नहीं है, इसलिए हम बैतुल्लाह की ज़ियारत को अपना मक्सद समझते हुए ज़रूर आगे बढ़ते रहेंगे और जो जमाअत ख़ामखाही रास्ते की रुकावट बनेगी, उससे मजबूरी में लड़ना पड़ेगा। मश्विरे के बाद ज़ाते अकदस ने इरशाद फ़रमाया ‘अब ख़ुदा का माम ले कर बढ़े चलो।’ (बुखारी)

बैतुल्लाह की ज़ियारत करने वाले ख़ुदा के इश्क़ में चूर और बैतुल्लाह की ज़ियारत में मसरूर मक्का की तरफ़ क़दम बढ़ाए चल रहे थे कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, खालिद बिन वलीद फ़ौज का दस्ता लिए अतीम में घात लगाए तुम्हारा इन्तिज़ार कर रहा है, इसलिए मुनासिब यह है कि इस ओर से कावा काट कर दाहिनी तरफ़ चलें और अचानक बेखबरी में उनके सामने पहुंच जाएं।

जब मुसलमान अचानक ख़ालिद बिन वलीद की फ़ौजी टुकड़ी के सामने आ गए तो अपनी घात को नाकाम देखकर ख़ालिद घबरा गए। दस्ते को लेकर तेज़ी के साथ मक्का के मुश्रिकों के पास जा पहुंचे और उनको मुसलमानों के आने की ख़बर दी।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब उस टीले पर पहुंचे कि उसके बाद घाटी में उतर कर मक्का पहुंच जाना था तो अचानक आपकी ऊंटनी क़सवा बैठ गई। सहाबा ने यह देखकर उसको चौके दिए, भड़काया और कोशिश की किसी तरह उठ खड़ी हो, मगर वह न उठी, लोग जब बार-बार हल-हल (ऊंटनी को बिठाने के लिए बोलते हैं) कहकर थक गए तो कहने लगे, ‘क़सवा नाफ़रमान हो गई।’

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह सुना तो फ़रमाया, क़सवा हरगिज़ नाफ़रमान नहीं हुई और न यह इसकी आदत है, बल्कि इसको उस ख़ुदा ने रोक दिया था जिसने हाथी वालों को रोक दिया था यानी कुरैशे मक्का की बेहूदगी और जंगी ज़ेहनियत की वजह से चूंकि जंग की हालत पैदा हो गई है, इसलिए ख़ुदा की मर्जी यह है कि हम उस वक़्त तक आगे न बढ़ें, जब तक कि काबे की हुर्मत का अहद न कर लें।’

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चुनांचे इस इरशाद के बाद ज़ाते अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, उस ख़ुदा की क़सम जिसके क़ब्जे में मेरी जान है, वे मुझसे जो भी ऐसी बात चाहेंगे कि उसमें अल्लाह की हुर्मतों की अज़्मत उनके पेशेनज़र हो तो ज़रूर उसको पूरा करूंगा।

हुजुरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब यह एलान फ़रमा चुके तो अब जो क़सवा को खड़ी होने के लिए डपटा, वह फ़ौरन खड़ी हो गई और चल पड़ी और हुदैबिया के मैदान में जा पहुंची।

जब बैतुल्लाह की ज़ियारत करने वालों का मुक़द्दस क़ाफ़िला हुदैबिया में ठहरा तो मश्विरे मे यह तै पाया कि हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु को मक्का भेजा जाए, ताकि वे मक्का के मुश्रिकों पर यह वाज़ेह करें कि हमारा इरादा, बैतुल्लाह की ज़ियारत के अलावा और कुछ नहीं, इसलिए तुमको रोकना मुनासिब नहीं है।

हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु जब मक्का में दाखिल हुए और अबू सुफ़ियान वगैरह ने मिलकर बातचीत की तो उन्होंने एक न सुनी और कहने लगे कि तुम अगर चाहते हो कि अकेले बैतुल्लाह का तवाफ़ कर लो तो कर लो, वरना हम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उनके दूसरे साथियों को हरगिज़ मक्का में दाखिल नहीं होने देंगे।

हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया, यह तो मैं हरगिज़ नहीं कर सकता कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बगैर तवाफ़ और उमरा को अदा कर लूं। कुरैश ने हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु का यह इसरार देखा तो उनको वापस जाने से रोक लिया।

बैअते रिज़वान

यह ख़बर मुसलमानों तक इस तरह पहुंची कि उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु क़त्ल कर दिए गए। मुसलमानों के लिए यह ख़बर एक बहुत बड़ा सानहा था जिससे हर आदमी बेचैन और बेक़ाबू हुआ जा रहा था। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसी वक़्त एक पेड़ के नीचे बैठकर मुसलमानों से इस बात पर बैअत ली कि मर जाएंगे, मगर हममें से कोई एक भी फ़रार का रास्ता नहीं आख़्तियार करेगा।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब सब मुसलमानों से बैअत ले चुके, तो उनमें हैरत में डालने वाला ज़बरदस्त जोश व ख़रोश पैदा हो गया, जिसकी ख़बर धीरे-धीरे मक्का भी पहुंच गई। मक्का के मुश्रिक बहुत घबराए और ख़ौफ़ खाकर मुसलमानों तक यह ख़बर पहुंचाई कि उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के क़त्ल की ख़बर गलत है और हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु सही व सलामत हुदैबिया वापस तश्रीफ़ ले आए।

चूंकि जिहाद की यह बैअत बहुत ही अहम और नाजुक मौक़े पर ली गई थी और मुसलमानों ने पूरे वलवले और जोश के साथ यह बैअत की थी, इसलिए अल्लाह तआला ने मुसलमानों की इस फ़िदाकारी की क़द्र फ़रमाई और सूरह फ़तह में रिज़ा और ख़ुश्नूदी कर परवाना देकर उनके इस कारनामे को हमेशा के लिए ज़िंदा बना दिया और इसी हक़ीक़त के पेशेनज़र इस्लामी तारीख में उसका नाम ‘बैअते रिज़वान’ क़रार पाया-

तर्जुमा-बेशक अल्लाह राज़ी हुआ ईमान वालों से जबकि वह तेरे हाथ पर उस पेड़ के नीचे बैअत करने लगे और जान लिया अल्लाह ने जो उनके जी में था, पस उतारा उन पर इत्मीनान व सुकून और इनाम में दिया उनको एक क़रीबी फ़त्ह।’ (18:48)

मुसलमानों के फ़िदाकाराना जोश और वालिहाना जज्बे ने मक्का के मुश्रिकों पर ऐसा असर किया कि अब वे खुद सुलह पर तैयार हो गए और आगे बढ़कर सुहैल बिन उमर को सफ़ीर बनाकर भेजा कि वह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुलह की शर्तें तै करें, ताकि यह झगड़ा खत्म हो जाए, मगर यह शर्त हर हाल में रहेगी कि मुसलमान इस साल नहीं बल्कि अगले साल उमरा करेंगे।

समझौता

सुहैल बिन उम्र जब मुसलमानों के कैम्प में पहुंचा तो हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सुलह के ख़्याल से पसंदीदगी की नज़र से देखा और लम्बी बात-चीत के बाद नीचे की धाराओं पर दोनों तरफ़ से समझौते कि तस्दीक़ व तौसीक़ अमल में आई।

1. इस साल मुसलमान मक्का में दाखिल हुए बगैर ही वापस चले जाएं।

2. अगले साल मक्का में उमरे की गरज़ से इस तरह दाखिल होंगे कि मामूली हिफ़ाज़ती हथियारों के अलावा कोई जंगी हथियार नहीं होगा और तलवारें नियाम के अन्दर ही रहेंगी और सिर्फ़ तीन दिन क़ियाम करेंगे और जब तक वे रहेंगे हम मक्का छोड़कर पहाड़ों पर चले जाएंगे।

3. समझौते की मुद्दत के अन्दर दोनों तरफ़ अम्न व आफ़ियत के साथ आने-जाने का सिलसिला जारी रहेगा।

4. अगर कोई आदमी मक्का से अपने वली की इजाज़त के बगैर मुसलमान होकर भी मदीना चला जाएगा तो उसको वापस करना होगा और अगर मदीना से कोई मक्का भाग आएगा तो हम उसे वापस नहीं करेंगे।

5. तमाम क़बीले आज़ाद हैं कि दो फ़रीक़ में से जो जिसका दोस्त बनना पसन्द करे, उसका दोस्त (हलीफ़) बन जाए।

6. यह समझौता दस साल तक क़ायम रहेगा और कोई फ़रीक़ इस मुद्दत के अन्दर इसकी ख़िलाफ़वर्जी नहीं करेगा।

समझौता लिखते वक्त मुबारक नाम के साथ ‘रसूलुल्लाह’ लिखने पर सुहैल ने एतराज़ किया था।

आपने फ़रमाया कि ‘है तो यह वाक़िया और ऐसी हक़ीक़त जिससे इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन हमको चूंकि सुलह चाहिए है, इसलिए तुम अगर यह पसन्द नहीं करते, तो मुझको इसरार नहीं और यह फ़रमा कर आपने समझौता लिखने वाले हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को हुक्म दिया कि वह इस जुम्ले को मिटा दें।

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हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से यह कब मुम्किन था कि वह अपने हाथ से इस जुम्ले को मिटाएं, जिससे के ताल्लुक़ ने सारी कायनात में इंक़िलाब पैदा करके अंधेरे को रोशनी से, शिर्क को ईमान से और जहल को इल्म से बदल डाला। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब यह महसूस किया तो लिखे की जगह को मालूम करके अपने मुबारक हाथों से जुम्ले को महत्व कर दिया। (मिटा दिया)

समझौता जब मुकम्मल हो गया तो मुसलमानों ने यह महसूस किया कि इसमें हमारा पहलू कमज़ोर रहा और सूरतेहाल यह हो गई कि गोया हमने दब कर सुलह की है, यहां तक कि हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से ज़ब्त न हो सका और अल्लाह के कलिमे को बुलन्द करने और इस्लाम की सरबुलन्दी के जज़्बे ने मजबूर किया कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमते अकदस मे अर्ज़ करें, ‘ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! क्या यह हुदैबिया का वाकिया ‘फ़त्ह’ है?

हुजूरे अकददस सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, हां, ख़ुदा की क़सम ! बेशक यह ‘फ़त्ह’ है।(फ़हुलबारी)

यह वाकिया जो समझौते की धाराओं के एतबार से मुसलमानों के हक़ में देखने में हार और ज़िल्लत की वजह नज़र आता था ‘खुली फ़त्ह’ कैसे था, तो इसका जवाब बुजुर्ग हदीस के माहिरों की जुबानी सुनिए। हदीस व सीरत के इमाम जुहरी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं-

‘इस्लाम में जो शानदार फ़त्हें गिनी गई हैं, उनमें सबसे पहली ‘बड़ी फ़त्ह’ हुदैबिया की सुलह है, इसलिए कि इससे पहले बराबर कुफ़्फ़ार और मुश्रिकों से जंग व पैकार का सिलसिला जारी था और जब यह ‘सुलह’ अमल में आ गई, तो इसकी वजह से हर दो फ़रीक़ को अन्म व इत्मीनान के साथ एक दूसरे से मिलने और बातें करने का मौक़ा मयस्सर आया और ख्यालों के तबादले की आज़ादी नसीब हुई।

नतीजा यह निकला कि जो आदमी भी इस्लाम को अपनी सही अक़्ल से जांचता और उसकी हक़ीक़त पर गौर करता, उसके लिए इसके अलावा कोई चारा बाक़ी न रहता था कि वह तुरन्त इस्लाम कुबूल कर ले। चुनांचे इन दो सालों में जब तक समझौते पर अमल रहा और मुश्रिकों ने अपनी तरफ़ से उसकी ख़िलाफ़वर्जी नहीं की लोग इतने ज़्यादा मुसलमान हुए कि इससे पहले की पूरी मुद्दत में उतने ही या उससे कम मुसलमान हुए थे।(फ़हुलबारी)

और हाफ़िज़ इब्ने हजर अस्क़लानी इरशाद फ़रमाते हैं-
‘इस जगह ‘फ़त्हे मुबीन’ से मुराद हुदैबिया का वाक़िया है। हुदैबिया के समझौते ने हक़ीक़त में ‘फ़त्हे मुबीन’ ‘फत्ह मक्का’ के लिए रास्ता खोल दिया,, यह इसलिए कि जब लड़ाई का ख़तरा बीच में जाता रहा और अम्न और इत्मीनान की शक्ल पैदा हुई तो मक्का और मदीना के दर्मियान आने-जाने का सिलसिला बिना किसी ख़ौफ़ और ख़तरे के होने लगा और हज़रत ख़ालिद बिन वलीद और हज़रत अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु जैसे बहादुर और सूझ-बूझ वाले लोगों का इस्लाम कुबूल करना इसी सुलह का कारनामा है और तरक़्क़ी की यही वज्हें धीरे-धीरे ‘मक्का की जीत’ की वजह बनी हैं। (फ़त्हुलबारी)

और इब्ने हिशाम और इमाम जुहरी तौजीह की ताईद करते हुए लिखते ‘जुहरी के क़ौल के मुताबिक ताईद इस हक़ीक़ते हाल से अच्छी तरह हो जाती है कि हुदैबिया के वाक़िए में जब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम निकले हैं तो चौदह सौ मुसलमान साथ थे और दो साल बाद जब मक्का जीतने के लिए निकले हैं, तो दस हज़ार की तायदाद थी। (फ़त्हुलबारी)

❓ Hudaibiya Ki Sulah – FAQ

सवाल 1: हुदैबिया क्या है?
जवाब: हुदैबिया मक्का मुकर्रमा के क़रीब एक मुक़ाम है। 6 हिजरी में नबी-ए-करीम ﷺ अपने सहाबा के साथ उमरा के इरादे से यहां तशरीफ़ लाए थे।

सवाल 2: हुदैबिया के मौक़े पर कितने सहाबा नबी ﷺ के साथ थे?
जवाब: उस वक़्त नबी-ए-करीम ﷺ के साथ तक़रीबन 1400 सहाबा-ए-किराम رضی اللہ عنہم मौजूद थे।

सवाल 3: बैअते रिज़वान क्या है?
जवाब: जब हज़रत उस्मान رضی اللہ عنہ के बारे में यह ख़बर फैली कि उन्हें क़त्ल कर दिया गया है, तो नबी ﷺ ने एक दरख़्त के नीचे सहाबा से बैअत ली। सहाबा ने ज़रूरत पड़ने पर अपनी जान तक क़ुर्बान करने का अहद किया। इसी को बैअते रिज़वान कहा जाता है।

सवाल 4: बैअते रिज़वान का ज़िक्र क़ुरआन में है?
जवाब: जी हाँ, क़ुरआन-ए-करीम की सूरह अल-फ़त्ह में इस बैअत का ज़िक्र आया है और अल्लाह तआला ने उन मोमिनों से अपनी रज़ामंदी का ऐलान फ़रमाया।

सवाल 5: हुदैबिया की सुलह क्यों हुई थी?
जवाब: नबी-ए-करीम ﷺ और सहाबा उमरा के लिए मक्का आए थे, लेकिन कुरैश ने उन्हें मक्का में दाख़िल होने से रोक दिया। इसके बाद लड़ाई के बजाय अमन और सुलह का रास्ता अपनाया गया।

सवाल 6: हुदैबिया की सुलह को फ़त्हे मुबीन क्यों कहा गया?
जवाब: देखने में सुलह की कुछ शर्तें मुसलमानों के लिए मुश्किल लग रही थीं, लेकिन इसके बाद अमन का माहौल बना और लोगों को इस्लाम को समझने और मुसलमानों के क़रीब आने का मौक़ा मिला। इसी वजह से इस सुलह ने आगे चलकर बड़ी फ़त्ह का रास्ता खोल दिया।

सवाल 7: हज़रत उस्मान رضی اللہ عنہ को मक्का क्यों भेजा गया था?
जवाब: उन्हें कुरैश के पास यह समझाने के लिए भेजा गया था कि मुसलमान लड़ाई करने नहीं आए हैं, बल्कि सिर्फ़ बैतुल्लाह की ज़ियारत और उमरा करने आए हैं।

सवाल 8: हज़रत उस्मान رضی اللہ عنہ के बारे में कौन-सी ख़बर फैली थी?
जवाब: मुसलमानों में यह ख़बर फैल गई थी कि कुरैश ने हज़रत उस्मान رضی اللہ عنہ को क़त्ल कर दिया है। इसी ख़बर के बाद बैअते रिज़वान का अहम वाक़िया पेश आया। बाद में मालूम हुआ कि हज़रत उस्मान رضی اللہ عنہ सही-सलामत हैं।

सवाल 9: हुदैबिया की सुलह कितने साल के लिए हुई थी?
जवाब: सुलह की मुद्दत 10 साल तय हुई थी और दोनों तरफ़ से अमन बनाए रखने की बात तय हुई थी।

सवाल 10: हुदैबिया की सुलह का सबसे बड़ा फ़ायदा क्या हुआ?
जवाब: इस सुलह के बाद मुसलमानों और मक्का वालों के बीच अमन का माहौल पैदा हुआ। लोगों को एक-दूसरे से मिलने और इस्लाम के बारे में जानने का मौक़ा मिला, जिससे इस्लाम तेज़ी से फैलने लगा।

सवाल 11: हुदैबिया के वक़्त मुसलमान कितने थे और फ़त्हे मक्का के वक़्त कितने हुए?
जवाब: हुदैबिया के मौक़े पर तक़रीबन 1400 सहाबा थे, जबकि फ़त्हे मक्का के मौक़े पर मुसलमानों की तादाद तक़रीबन 10,000 हो चुकी थी।

सवाल 12: हुदैबिया के वाक़िए से हमें क्या सबक मिलता है?
जवाब: इस वाक़िए से हमें सब्र, अल्लाह पर भरोसा, नबी ﷺ की इताअत और समझदारी से फैसला करने का सबक मिलता है। कभी-कभी कोई चीज़ हमें ऊपर से मुश्किल या नुकसान वाली नज़र आती है, लेकिन अल्लाह तआला उसी में बड़ी ख़ैर और फ़त्ह रख देता है।

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
खुदा हाफिज़ ….

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