26/08/2026
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हुनैन की जंग : 12,000 का लश्कर, अचानक हमला और फिर पलट गई पूरी जंग | हुनैन का वाक़िआ |Hunain Ki Jung: 12,000 Ka Lashkar, Achanak Hamla Aur Phir Palat Gayi Poori Jung | Hunain Ka Waqia amazing story

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Hunain Ki Jung: 12,000 Ka Lashkar.
Hunain Ki Jung: 12,000 Ka Lashkar

Hunain Ki Jung: 12,000 Ka Lashkar

हुनैन की जंग इस्लामी तारीख़ का एक ऐसा हैरतअंगेज़ वाक़िआ है, जिसमें मुसलमानों की तादाद बहुत ज़्यादा थी, लेकिन जंग के शुरू होते ही अचानक हालात बिल्कुल बदल गए। 12 हज़ार का लश्कर अपनी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरा था, मगर दुश्मन ने पहाड़ों की घाटियों में छुपकर ऐसा अचानक हमला किया कि मुसलमानों की सफ़ें कुछ देर के लिए बिखर गईं।

लेकिन यह हार आख़िरकार जीत में बदल गई। नबी-ए-करीम ﷺ ने इस मुश्किल घड़ी में भी सब्र और बहादुरी का मुज़ाहरा फ़रमाया और सहाबा-ए-किराम को दोबारा जमा किया। हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की बुलंद आवाज़ ने मुसलमानों में नया जोश पैदा कर दिया और फिर जंग का पूरा नक्शा ही बदल गया।

तो आखिर हुनैन की जंग में ऐसा क्या हुआ था कि 12 हज़ार का लश्कर अचानक परेशान हो गया? दुश्मन ने किस तरह घात लगाकर हमला किया? और किस तरह अल्लाह तआला ने मुसलमानों की हालत को हार से जीत में बदल दिया? आइए, इस दिलचस्प और ईमान अफ़रोज़ वाक़िआ को तफसील से जानते हैं।

हुनैन की लड़ाई

‘फ़त्हे अज़ीम’ यानी भारी जीत के बाद अरब के मुशरिकों की शौकत और दबदबा का लगभग खात्मा हो गया और अब अरब क़बीले गिरोह-दर-गिरोह इस्लाम में दाखिल होने लगे, यह देखकर दो क़बीलों की जाहिलियत-हमीयत भड़क उठी और वो इस्लाम की तरक्क़्क़ी को बरदाश्त न कर सके।

हवाज़िन और सक़ीफ़ इन दोनों क़बीलों के सरदारों की मीटिंग हुई और उन्होंने आपस में मशविरा किया कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी क़ौम (कुरैश) को मग्लूब करके मुतमइन हो गए हैं, इसलिए अब हमारी बारी है। पस क्यों न हमीं पेशक़दमी करके मुसलमानों पर हमलावार हो जाएं और उनकी जड़ें उखाड़ दें।

दोनों ने यह मंसूबा बांधा और मालिक बिन औफ़ नज़री को अपना बादशाह मान कर के हसद की आग को मुसलमानों के खून से बुझानें की कोशिश की। मालिक ने बहुत से क़बीलों को अपने सांथ मिला कर जंग की तैयारी शुरू कर दी।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जब यह मालूम हुआ तो सहाबा को जमा फ़रमाया और मश्वरों के बाद, बचाव के लिए तैयार होकर हुनैन को रवाना हो गए, उस वक़्त इस्लामी फ़ौज में बारह हज़ार जॉनिसार मौजूद थे।

उनमें से दस हज़ार मुहाजिर व अंसार और मदनी जॉनिसार थे और दो हज़ार वे थे जो फ़त्हे मक्का के वक़्त मुसलमान हुए थे और अस्सी वे मुशरिक (तुलक़ा) थे, जो इस्लाम न कुबूल करने के बावजूद रहमतुल-लिल-आलमीन के मुजाहरे देखकर खुद अपनी ख़्वाहिश से मुसलमानों के जंग के साथी बन गए थे।

10 शव्वाल, 8 हिजरी मुताबिक़ फ़रवरी 630 ई० के जाते अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ इस्लामी मुजाहिदों की क़ौम हुनैन जा पहुंची, आपने दुश्मन के मुक़ाबले में जब इस्लामी फ़ौज को सफ़ बनाने का हुक्म दिया तो मुहाजिरीन का झंडा हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को दिया और अंसार में से बनी ख़ज़रज का झंडा जनाब बिन मुज़िर को बख़्शा और औस का उसैद बिन हुजैर को इनायत फ़रमाया और इसी तरह अलग-अलग क़बीलों के सरदारों को उनकी फ़ौज का झंडा थमा दिया।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद भी हथियार सजे, दो जिरह (कब्ल) पहने, ख़ुद सर पर रखे अपने मशहूर ख़च्चर पर सवार इस्लामी फ़ौज की कमान कर रहे थे।

अभी लड़ाई ने मरने-मारने की सूरत नहीं देखी थी कि मुसलमानों के दिलों में अपनी फ़ौज की भारी तायदाद और उसकी फ़रावानी इस दर्जा असर कर गई कि कुछ मुसलमानों की जुबान से ‘इन्शाअल्लाह’ कहे बगैर ही अपनी ताक़त के घमंड पर यह निकल गया कि आज हमारी ताक़त को कोई नहीं हरा सकता ।

मुसलमान, एक अल्लाह का मानने वाला , एक ख़ुदा पर भरोसा करने के बजाए अपनी तायदाद की ज़्यादती पर घमंड करे, यह उसकी भूल है इसलिए ख़ुदा को मुसलमानों का यह घमंड पसन्द न आया और इसलिए उन पर यह सबक़ का कोड़ा लगा कि जब लड़ाई शुरू हुई और मुसलमानों की फ़ौज ने पेशक़दमी की तो अचानक दुश्मन की इन टोलियों ने जो गोरिल्ला जंग लड़ने के लिए पहाड़ की अलग-अलग घाटियों में घात लगाए बैठी थीं, हर तरफ़ से इस्लामी फ़ौज पर बारिश की तरह तीर चलाना शुरू कर दिया।

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इस्लामी फ़ौज को इस भारी तीर-वर्षा की उम्मीद न थी, इसलिए उनकी सफें डगमगा गईं और थोड़ी ही देर में मुसलमानों के क़दम उखड़ गए और नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और मशहूर मुहाजिर व अंसार सहाबा के अलावा तमाम बदवी क़बीलों और मदनी फ़ौज की अक्सरीयत ने भागने का रास्ता आख़्तियार किया।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इस हालत में भी यह रजज़ यानी जोश दिलाने वाले जुमले पढ़ते और बहादुरी का मुज़ाहरा करते जाते थे-अनन्नबीयु ला कज़िब अनब्नु अब्दिल मुत्तलिब

तर्जुमा: इसमें तनिक भी झूठ नहीं, मैं नबी हूं। मैं हूं अब्दुल मुत्तलिब का बेटा। Hunain Ki Jung: 12,000 Ka Lashkar

ग़रज़ उसी वक़्त नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इशारे पर हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने ऊंची आवाज़ से भागते मुसलमानों को ललकारा, ‘ऐ अंसार क़बीले के लोगो!’ ‘ऐ बैअते रिज़वान के लोगो !’

हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की हक़ की आवाज़ गूंजी ही थी कि एक-एक मुसलमान अपनी हालत पर अफ़सोस करता हुआ पलट पड़ा और मिनटों में तमाम जांनिसार नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के गिर्द जमा हो गए और बहादुरी से लड़ने लगे, नतीजा यह निकला कि हार जीत में तब्दील हो गई और अल्लाह के फ़ज़्ल व करम ने हार को ‘जीत’ से बदल दिया।Hunain Ki Jung: 12,000 Ka Lashkar

मुश्रीकों की जमाअत में एक मशहूर राय देने वाले दरीद बिन समद नामी शख़्स था। उसने मालिक के इस तरीक़े की ज़बरदस्त मुखालफत की थी कि मैदान में औरतों, बच्चों और माल व दौलत के ख़ज़ानों को साथ ले जाए, मगर मालिक ने उसकी राय पर अमल न किया और सबको साथ लाया था, चुंनाचे यह सब माले ग़नीमत मुसलमानों के हाथ लगा और मुश्रीकों की सही ताक़त का भी खात्मा हो गया।

बहुत से मुश्रिकों और उनके क़बीलों पर अगरचे इस्लाम की सच्चाई रोशन हो चुकी थी, मगर फिर भी वह अपने ख़्याल में माद्दी शौकत को सब कुछ समझते थे, चुनांचे मुसलमानों पर अल्लाह तआला के इस फ़ज़्ल व करम को जब उन्होंने इस तरह देख लिया तो अब वे भी अपनी मर्जी और चाव से इस्लाम की गोद में आ गए।

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FAQ — हुनैन की जंग के सवाल-जवाब

1. हुनैन की जंग कब हुई थी?

जवाब: हुनैन की जंग 8 हिजरी में हुई थी। यह जंग फ़त्हे मक्का के बाद पेश आई थी और इस्लामी तारीख़ के अहम वाक़िआत में इसका बड़ा मक़ाम है।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

2. हुनैन की जंग किनके बीच हुई थी?

जवाब: यह जंग मुसलमानों और हवाज़िन व सक़ीफ़ से जुड़े मुशरिक क़बीलों के बीच हुई थी। इन लोगों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ बड़ी तैयारी की थी।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

3. हुनैन की जंग में मुसलमानों की तादाद कितनी थी?

जवाब: इस जंग के मौक़े पर मुसलमानों का लश्कर लगभग 12,000 अफ़राद पर मुश्तमिल था। यह उस वक़्त के हिसाब से बहुत बड़ी तादाद थी।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

4. मुसलमानों को शुरुआत में परेशानी क्यों हुई?

जवाब: दुश्मन ने हुनैन की घाटियों और पहाड़ी रास्तों में छुपकर घात लगाई हुई थी। जब मुसलमान आगे बढ़े तो अचानक चारों तरफ़ से तीरों की बारिश शुरू हो गई, जिससे कुछ देर के लिए सफ़ों में अफ़रातफ़री फैल गई।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

5. क्या मुसलमानों की ज़्यादा तादाद पर किसी को घमंड हुआ था?

जवाब: रिवायतों में आता है कि मुसलमानों की बड़ी तादाद देखकर कुछ लोगों की ज़बान से ऐसे अल्फ़ाज़ निकले जिनमें अपनी कसरत और ताक़त पर भरोसे का इज़हार था। इस वाक़िए से यह सबक मिलता है कि असल कामयाबी सिर्फ़ तादाद और सामान से नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की मदद से होती है।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

6. जंग के मुश्किल वक़्त में नबी-ए-करीम ﷺ ने क्या किया?

जवाब: जब कुछ लोग पीछे हटने लगे, तब नबी-ए-करीम ﷺ अपनी जगह पर साबित-क़दम रहे और बहादुरी का मुज़ाहरा फ़रमाया। आपने सहाबा को दोबारा जमा होने की तरफ़ बुलाया और हिम्मत दिलाई।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

7. हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु का हुनैन की जंग में क्या किरदार था?

जवाब: हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने बुलंद आवाज़ में मुसलमानों को पुकारा और उन्हें याद दिलाया कि वे कहाँ और किसके साथ खड़े हैं। उनकी आवाज़ सुनकर सहाबा-ए-किराम वापस पलटने लगे और नबी-ए-करीम ﷺ के इर्द-गिर्द जमा हो गए।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

8. क्या हुनैन की जंग में मुसलमान आखिरकार कामयाब हुए?

जवाब: जी हाँ। शुरुआत में मुश्किल हालात पैदा होने के बावजूद मुसलमान दोबारा संगठित हुए और फिर अल्लाह तआला ने उन्हें फ़त्ह अता फ़रमाई। इस तरह शुरुआती परेशानी आख़िरकार कामयाबी में बदल गई।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

9. हुनैन की जंग से हमें क्या सबक मिलता है?

जवाब: इस जंग से सबसे बड़ा सबक यह मिलता है कि अपनी तादाद, ताक़त और सामान पर घमंड नहीं करना चाहिए। मुसलमान को हर हाल में अल्लाह तआला पर भरोसा रखना चाहिए और मुश्किल वक़्त में सब्र व साबित-क़दमी का मुज़ाहरा करना चाहिए।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

10. हुनैन की जंग में दुश्मनों ने कौन-सी रणनीति अपनाई थी?

जवाब: दुश्मन ने पहाड़ी घाटियों और रास्तों में छुपकर अचानक हमला करने की रणनीति अपनाई थी। इससे मुसलमानों को शुरुआत में संभलने का मौक़ा कम मिला और उनकी सफ़ों में परेशानी पैदा हुई।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

11. क्या हुनैन की जंग के बाद बहुत-सा माल-ए-ग़नीमत मिला था?

जवाब: जी हाँ। जंग के बाद मुसलमानों को काफ़ी माल-ए-ग़नीमत हासिल हुआ। इसमें जानवर और दूसरी चीज़ें भी शामिल थीं।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

12. हुनैन की जंग इस्लामी इतिहास में इतनी अहम क्यों है?

जवाब: क्योंकि यह जंग हमें बताती है कि बड़ी तादाद भी अपने आप में कामयाबी की ज़मानत नहीं होती। जब हालात मुश्किल हुए तो सहाबा-ए-किराम ने दोबारा हिम्मत जुटाई और अल्लाह तआला ने उन्हें फ़त्ह अता फ़रमाई। यह वाक़िआ ईमान, सब्र, इताअत और अल्लाह पर भरोसे का अहम सबक देता है।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Hunain Ki Jung 12,000 Ka Lashkar
खुदा हाफिज़…..

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