Qurbani Ki Fazilat Aur Zaroori Masail
ईदुल अज़हा सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की बे-मिसाल फ़रमाँबरदारी की याद है। कुर्बानी हमें यह सिखाती है कि अल्लाह तआला की रज़ा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी क़ुर्बान करने का जज़्बा पैदा करें।
बहुत से लोग हर साल कुर्बानी करते हैं, लेकिन उसके अहकाम, फ़ज़ीलत और ज़रूरी मसाइल से पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं होते। किस पर कुर्बानी वाजिब है, कौन सा जानवर सही है, सही वक़्त क्या है और गोश्त व खाल का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए—इन बातों को जानना भी दीन का हिस्सा है।
इस पोस्ट में हम कुरआन और हदीस की रोशनी में कुर्बानी की फ़ज़ीलत, उसकी शुरुआत और रोज़मर्रा के अहम मसाइल को आसान ज़बान में समझेंगे। मक़सद यह है कि हमारी कुर्बानी सिर्फ़ जानवर ज़िबह करने तक महदूद न रहे, बल्कि इख़लास, तक़वा और अल्लाह की इताअत का ज़रिया भी बन जाए।
अल्लाह तआला हम सबको सही समझ, ख़ुलूस के साथ कुर्बानी करने और अपनी ज़िन्दगी को उसकी रज़ा के मुताबिक़ ढालने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
कुरबानी की फजीलत
हदीस
हज़रत अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी बेटी हज़रत सय्यिदा फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा से कुरबानी के वक़्त फ़रमाया ऐ फातिमा! खड़ी हो अपनी कुरबानी के पास हाज़िर हो जाओ, क्योंकि उसके खून की पहली बूँद की वजह से तुम्हारे पिछले गुनाह माफ हो जायेंगे।
हज़रत सय्यिदा फातिमा रज़िल्लाहु अन्हा ने सवाल किया या रसूलल्लाह! क्या यह फजीलत सिर्फ हमारे लिये यानी हुजूरे पाक के घर वालों और ख़ानदान वालों के वास्ते मख़्सूस है या सब मुसलमानों के लिये है? आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया यह फ़ज़ीलत हमारे लिये और तमाम मुसलमानों के लिये है। (बज़्ज़ार व अत्तरगीब वत्तरहीब)
हदीस
हज़रत ज़ैद बिन अरकम रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक बार हज़राते सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने सवाल किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! इन कुरबानियों की हक़ीक़त क्या है? आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया यह तरीक़ा तुम्हारे बाप इब्राहीम अलैहिस्सलाम से जारी हुआ है और यह उनका तरीक़ा चला आ रहा है। सहाबा ने अर्ज़ किया हमको इनमें क्या मिलता है? फरमाया हर बाल के बदले एक नेकी। अर्ज़ किया ऊन वाले जानवर यानी भेड़ दुबा के ज़िबह करने पर क्या मिलता है? फरमाया हर बाल के बदले एक नेकी मिलती है।(मिश्कात शरीफ)
हदीस
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा का बयान है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि बकरीद की दस तारीख़ को कोई भी नेक काम अल्लाह के नज़दीक कुरबानी का खून बहाने से ज़्यादा महबूब और पसन्दीदा नहीं है। और कियामत के दिन कुरबानी वाला अपने जानवर के बालों और सींगों और खुरों को लेकर आयेगा और ये चीजें बहुत बड़े सवाब का ज़रिया बनेंगी। और फरमाया कि कुरबानी का खून ज़मीन पर गिरने से पहले अल्लाह तआला के यहाँ कबूल हो जाता है। लिहाज़ा तुम दिल की खुशी के साथ कुरबानी किया करो। (मिश्कात शरीफ)
कुरबानी की शुरूआत
हज़रत इब्राहीम खलीलुल्लाह अलैहिस्सलाम ने ख़्वाब में देखा था कि मैं अपने बेटे को ज़िबह कर रहा हूँ। नबियों का ख़्वाब सच्चा होता था और अल्लाह की तरफ से होता था, ऐसी बात गोया अल्लाह तआला की तरफ से हुक्म का दर्जा रखती थी इसलिये उन्होंने अपने बेटे से कहा कि मैंने ऐसा ख़्वाब देखा है, तुम्हारी क्या राय है? बेटे ने जवाब दियाः
तर्जुमाः ऐ अब्बा जान ! आपको जो हुक्म हुआ है उसपर अमल कर लीजिये, आप मुझे इन्शा-अल्लाह तआला सब्र करने वालों में से पायेंगे। (सूरह साफ़्फ़ात आयत 102)
चुनाँचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे हज़रत इसमाईल अलैहिस्सलाम को मक्का से लेकर चले और मिना में जाकर ज़िबह करने की नीयत से एक छुरी साथ ली, मिना मक्का मुअज़्ज़मा से तीन मील दूर दो पहाड़ों के दरमियान बहुत लम्बा मैदान है। जब मिना में दाखिल होने लगे तो उनके बेटे को शैतान बहकाने लगा।
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को जब पता चला तो अल्लाहु अकबर कहकर सात कंकरियाँ मारीं जिसकी वजह से वह ज़मीन में धंस गया। दोनों बाप बेटे आगे बढ़े तो ज़मीन ने शैतान को छोड़ दिया। कुछ दूर जाकर फिर बहकाने लगा तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फिर उसपर अल्लाहु अकबर कहकर सात कंकरियाँ मारीं, वह फिर ज़मीन में धंस गया। ये दोनों आगे बढ़े तो फिर ज़मीन ने उसको छोड़ दिया।
फिर आकर बहकाने लगा, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फिर उसे अल्लाहु अकबर कहकर सात कंकरियाँ मारीं फिर वह ज़मीन में धंस गया और उसके बाद आगे बढ़कर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे को माथे के बल लिटा दिया। अभी ज़िबह करने न पाये थे कि अल्लाह की तरफ से आवाज़ आईः
तर्जुमाः ऐ इब्राहीम ! तुमने अपना ख़्वाब सच कर दिखाया।(सूरह साफ़्फ़ात आयत 105)
फिर अल्लाह पाक ने मेंढा भेज़ा जिसे अपने बेटे की तरफ से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ज़िबह कर दिया।
जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है “और हमने एक बड़ा ज़बीहा (कुरबानी का जानवर) उसके बदले में दे दिया।”
ज़िबह तो किया मेंढा और सवाब मिल गया बेटे की कुरबानी का क्योंकि दोनों बाप बेटे अपने दिल व जान से उस काम के अन्जाम देने को तय कर चुके थे जिसका अल्लाह की तरफ से हुक्म हुआ था। बाप ने बेटे को माथे के बल लिटा दिया और बेटा जिबह होने के लिये खुशी से लेट गया। अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोडी। अल्लाह तआला के यहाँ नीयत देखी जाती है, अपनी नीयत में ये दोनों सच्चे थे।
जैसा कि अल्लाह पाक ने फरमाया है: तर्जुमाः जब दोनों ने खुदा के हुक्म को मान लिया और बाप ने बेटे को ज़िबह करने के लिए करवट के बल लिटाया। (सूरह साफ़्फ़ात आयत 103-104)
यह वाकिआ कुरबानी की शुरूआत है और हज के मौके पर मिना में जो कंकरियाँ मारी जाती हैं उनकी शुरूआत भी इसी वाकिए से हुई है। उन्हीं तीन जगहों में कंकरियाँ मारते हैं जहाँ शैतान ज़मीन में धंस गया था। जगह की निशानदेही के लिये पत्थर के मीनार बना दिये गये हैं।
उसके बाद से अल्लाह ताआला की रिज़ा के लिये जानवरों की कुरबानी करना इबादत में शुमार हो गया चुनाँचे उम्मते मुहम्मदिया के लिये भी कुरबानी वाजिब हो गयी। हैसियत वाले पर कुरबानी वाजिब है और अगर किसी की इतनी हैसियत न हो और कुरबानी कर दे तब भी बहुत बड़े सवाब का हक़दार होगा।
कुरबानी की अहमियत
चूँकि असल मकसद खून बहाना है, यानी जान को ज़ान के पैदा करने वाले के सुपुर्द करना है इसलिये कुरबानी के दिनों में अगर कोई शख़्स कुरबानी की कीमत सदका कर दे या उसकी जगह गल्ला या कपड़ा मोहताजों. को दे दे तो उससे हुक्म की तामील न होगी और कुरबानी को छोड़ने का गुनाह होगा और हर बाल के बदले नेकी मिलने की जो सआदत थी उससे महरूमी होगी।
एक हदीस में इरशाद है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फ़रमायाः जो शख़्स गुन्जाइश होते हुए कुरबानी न करे वह हमारी ईदगाह में न आये। (हाकिम, अत्तरगीब वत्तरहीब)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मदीना में दस साल क्याम फ़रमाया यानी ठहरे और हर साल कुरबानी फरमाई। (मिश्कात)
इन हदीसों से कुरबानी की बहुत ज़्यादा ताकीद मालूम हुई। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पाबन्दी से कुरबानी करने और उसके लिये ताकीद फ़रमाने की वजह से हज़रत इमाम अबू हनीफा रहमतुल्लाहि अलैहि ने गुन्जाइश और हिम्मत रखने वालों पर कुरबानी को वाजिब कहा है और फ़रमाया है कि साहिबे निसाब पर कुरबानी वाजिब है। वाजिब का दरजा फर्ज़ के करीब है बल्कि अमल में फर्ज़ के बराबर है।
कुरबानी किस पर वाजिब है
जिस शख़्स पर ज़कात फ़र्ज़ हो या जिसके पास साढ़े बावन तौले चाँदी या उसकी कीमत का तिजारत का माल हो या फाज़िल सामान पड़ा हो उसपर कुरबानी और सदका-ए-फित्र वाजिब हो जाते हैं। बहुत-से लोग समझते हैं कि जिसपर ज़कात वाजिब नहीं उसपर कुरबानी भी वाजिब नहीं, यह बात सही नहीं है।
यूँ कहना तो दुरुस्त है कि जिसपर ज़कात फर्ज़ है उसपर कुरबानी भी वाजिब है लेकिन यह कहना सही नहीं कि जिसपर ज़कात फ़र्ज़ नहीं उसपर कुरबानी भी फर्ज़ नहीं। इसलिये कि उनके पास सोना चाँदी, या तिजारत का माल या नकदी निसाब के बकद्र नहीं होती लेकिन बहुत-सा फाज़िल ज़रूरत से ज़ायद सामान पड़ा होता है जैसे इस्तेमाल किया हुआ ज़रूरत से ज़्यादा फर्नीचर वगैरह। अगर यह फाज़िल सामान साढ़े बावन तौले चाँदी की कीमत को पहुँच जाये तो कुरबानी वाजिब हो जाती है लेकिन ज़कात फ़र्ज़ नहीं होती।
एक फर्क और भी है, वह यह कि ज़कात का अदा करना उस वक़्त फ़र्ज़ होता है जब निसाब पर चाँद के एतिबार से बारह महीने गुज़र जायें और कुरबानी के वाजिब होने के लिये कुरबानी की तारीख़ आने से पहले चौबीस घण्टे गुज़रना भी ज़रूरी नहीं है। अगर किसी के पास एक-आध दिन पहले ही ऐसा माल आया जिसके होने से कुरबानी वाजिब हो जाती है तो उसपर कल को कुरबानी वाजिब हो जायेगी।
यह भी मालूम हुआ कि जो ‘साहिबे निसाब’ हो उसपर कुरबानी वाजिब होती है। ज़कात के फ़र्ज़ होने और कुरबानी के वाजिब होने और सदका-ए- फित्र के वाजिब होने के बारे में हर एक की मिल्कियत अलग-अलग देखी जायेगी।
अगर किसी घर में बाप, बेटे और बेटों की माँ हर एक की मिल्कियत में इतना माल हो जिस पर कुरबानी वाजिब होती है तो हर एक पर अलग-अलग कुरबानी वाजिब होगी। अलबत्ता नाबालिग की तरफ से किसी हाल में कुरबानी करना लाज़िम नहीं। औरतों के पास उमूमन इतना जेवर होता है जिसपर कुरबानी वाजिब हो जाती है अगरचे वो बेवा ही क्यों न हों।
मसअला : शरई मुसाफिर यानी जो शख्स अपने शहर या बस्ती से अड़तालीस (48) मील के सफर के इरादे से कुरबानी के दिनों से पहले निकला हो उसपर कुरबानी वाजिब नहीं। हाँ अगर कुरबानी के दिनों में से किसी दिन घर पहुँच जाये या किसी जगह पन्द्रह दिन ठहरने की नीयत कर ले तो उसपर कुरबानी वाजिब हो जायेगी।
ये भी पढ़ें: घी या तेल नापाक हो जाए तो कैसे पाक करें? | सही हदीस और शरीअत का आसान तरीक़ा
कुरबानी के जानवर
कुरबानी के जानवर शरअन मुकर्रर हैं। गाय, बैल, भैंस, भैंसा, ऊँट, ऊँटनी, बकरा, बकरी, भेड़, दुम्बा, दुम्बी की कुरबानी हो सकती है, इनके अलावा और किसी जानवर की कुरबानी दुरुस्त नहीं, अगरचे कितना ही कीमती हो और खाने में कितना ही पसन्दीदा भी हो, लिहाज़ा हिरन की कुरबानी नहीं हो सकती। इसी तरह दूसरे हलाल जानवर कुरबानी में ज़िबह नहीं किये जा सकते।
मसअलाः गाय, बैल, भैंस, भैंसा, ऊँट, ऊँटनी में सात हिस्से हो सकते हैं, उनमें से एक जानवर में सात कुरबानियाँ हो सकती हैं, चाहे एक ही आदमी’ एक गाय लेकर अपने घर के आदमियों के वकील बनाने से उनका वकील बनकर सात हिस्से तजवीज़ करके ज़िबह कर दे ‘या मुख़्तलिफ घरों के आदमी एक-एक या दो-दो हिस्से लेकर सात हिस्से पूरे कर लें, दोनों सूरतों में कुरबानी दुरुस्त हो जायेगी।
मसअलाः चूँकि अकीका भी सवाब का काम है इसलिये कुरबानी की गाय या ऊँट में अगर कुछ हिस्से कुरबानी के और कुछ अकीके के हों तो यह भी जायज़ है।
मसअलाः अगर छह आदमियों ने कुरबानी का हिस्सा लिया और एक शख़्स ने एक हिस्सा गोश्त खाने या तिजारत करने की नीयत से ले लिया, मकसद कुरबानी का सवाब लेना न था, तो किसी की भी कुरबानी न होगी।
अगर कुरबानी की गाय में किसी दीन से फिर जाने वाले, कादयानी या बद्-दीन को शरीक कर लिया तब भी किसी की कुरबानी दुरुस्त न होगी।
मसअलाः अगर किसी का हिस्सा सातवें हिस्से से कम हो तब भी किसी की कुरबानी दुरुस्त न होगी। न उसकी जिसका सातवाँ हिस्सा या उससे ज़्यादा था न उसकी जिसका हिस्सा सातवें हिस्से से कम था।
मसआलाः और अगर गाय, ऊँट, भैंस में सात हिस्सों से कम कर लिया जैसे छह हिस्से करके छह आदमियों ने एक-एक हिस्सा ले लिया तो कुरबानी दुरुस्त हो जायेगी। बशर्ते कि किसी का हिस्सा सातवें हिस्से से कम न हो। और अगर आठ हिस्से बना लिये और आठ कुरबानी वाले शरीक हो गये तो किसी की भी कुरबानी दुरुस्त न होगी।
मसअलाः छोटे जानवर, यानी बकरा-बकरी वगैरह में शिरकत नहीं हो सकती। एक शख़्स की तरफ से एक ही जानवर हो सकता है।
मसअलाः गाय, बैल, भैंस, भैंसा की उम्र कम-से-कम दो साल और ऊँट और ऊँटनी की उम्र कम-से-कम पाँच साल और बाकी जानवरों की उम्र कम-से-कम एक साल होना ज़रूरी है। हाँ अगर भेड़ या दुम्बा साल भर से कम का हो लेकिन मोटा-ताज़ा हो कि साल भर वाले जानवरों में छोड़ दिया जाये तो फ़र्क महसूस न हो तो उसकी भी कुरबानी हो सकती है बशर्ते कि छह महीने से कम का न हो। अगर इतना मोटा-ताज़ा न हो जिसका अभी ज़िक्र हुआ तो किसी मुफ़्ती को दिखा लें, फिर उनके कौल के मुताबिक अमल करें।
कैसे जानवर की कुरबानी दुरुस्त है
चूँकि कुरबानी का जानवर खुदा तआला की बारगाह में पेश किया जाता है इसलिये जानवर खूब उम्दा, मोटा-ताज़ा, सही-सालिम, ऐबों से पाक होना ज़रूरी है।
हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का इरशाद है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें हुक्म दिया कि कुरबानी के जानवर के आँख-कान अच्छी तरह देख लें और ऐसे जानवर की कुरबानी न करें जिसका कान चिरा हुआ हो या जिसके कान में सूराख हो। (तिर्मिज़ी शरीफ)
हज़रत बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि कुरबानी में किन-किन जानवरों से परहेज़ किया जाये। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इशारा करते हुए इरशाद फरमाया कि खुसूसियत के साथ चार तरह के जानवरों से परहेज करें।
1. वह लंगड़ा जानवर जिसका लंगड़ापन ज़ाहिर हो।
2. वह काना जानवर जिसका कानापन ज़ाहिर हो।
3. ऐसा बीमार जानवर जिसकी बीमारी ज़ाहिर हो।
4. ऐसा दुबला जानवर जिसकी हड्डियों में मेंग यानी गूदा न हो। (तिर्मिज़ी शरीफ, अबू दाऊद वगैरह)
हज़रात फुकहा-ए-किराम ने इन हदीसों की तफसीर व तशरीह करते हुए लिखा है कि जो जानवर बिलकुल अन्धा हो या एक आँख की तिहाई रोशनी या उससे ज़्यादा रोशनी जाती रही हो, या कान का तिहाई हिस्सा या उससे ज़्यादा कट गया हो, या दुम कट गयी हो, या दुम का एक तिहाई हिस्सा या उससे ज़्यादा कट गया हो या इतना ज़्यादा दुबला जानवर हो कि उसकी हड्डियों में बिलकुल गूदा न रहा हो उसकी कुरबानी जायज़ नहीं।
अगर जानवर दुबला हो मगर इतना ज़्यादा दुबला न हो तो उसकी कुरबानी हो जायेगी लेकिन वह सवाब कहाँ मिलेगा जो मोटे-ताज़े जानवर की कुरबानी में मिलता है। हिम्मत और गुन्जाइश होते हुए अल्लाह की बारगाह में पेश करने के लिये गिरी-पड़ी हैसियत का जानवर इख़्तियार करना ना-समझी है और नाशुक्री भी।
मसअलाः जो जानवर तीन पाँव से चलता है और चौथा पाँव रखता ही नहीं या चौथा पाँव रखता है मगर उससे चल नहीं सकता यानी चलने में उससे सहारा नहीं लेता तो उसकी कुरबानी दुरुस्त नहीं। अगर चारों पाँव से चलता है और एक पाँव में कुछ लंग है तो उसकी कुरबानी दुरुस्त है।
मसअलाः जिस जानवर के बिलकुल दाँत न हों उसकी कुरबानी दुरुस्त नहीं, और अगर कुछ दाँत गिर गये लेकिन जो बाकी हैं वे तायदाद में गिर जाने वाले दाँतों से ज़्यादा हैं तो उसकी कुरबानी दुरुस्त है।
मसअलाः अगर किसी जानवर के पैदाइश ही से कान नहीं तो उसकी कुरबानी दुरुस्त नहीं और अगर दोनों कान हैं और सही-सालिम हैं लेकिन ज़रा छोटे-छोटे हैं तो उसकी कुरबानी हो सकती है।
मसअलाः जिस जानवर के पैदाइश ही से सींग नहीं लेकिन उम्र इतनी हो चुकी है जितनी कुरबानी के जानवर की होनी लाज़िम है तो उसकी कुरबानी दुरुस्त है। और अगर सींग निकल आये और उनमें से एक या दोनों कुछ टूट गये तो ऐसे जानवर की कुरबानी हो सकती है, हाँ अगर बिलकुल जड़ से टूट गये और अन्दर की मेंग भी ख़त्म हो गयी तो उसकी कुरबानी दुरुस्त नहीं।
मसअलाः ख़स्सी जानवर की कुरबानी न सिर्फ यह कि दुरुस्त है बल्कि अफज़ल है, क्योंकि उसका गोश्त अच्छा होता है, हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद ऐसे जानवरों की कुरबानी की है। जैसा कि अबू दाऊद शरीफ की रिवायत में इसकी वज़ाहत है।
मसअलाः अगर मादा जानवर की कुरबानी और उसके पेट में से बच्चा निकल आया तब भी कुरबानी हो गयी। अगर बच्चा ज़िन्दा निकले तो उसको भी ज़िबह कर दे।
मसअलाः अगर कुरबानी का जानवर ख़रीद लिया फिर उसमें कोई ऐसा ऐब पैदा हो गया जिसकी वजह से कुरबानी दुरुस्त नहीं होती तो उसके बदले दूसरा जानवर ख़रीद कर कुरबानी करे, हाँ अगर गरीब आदमी हो जिसपर कुरबानी वाजिब नहीं थी और उसने सवाब के शौक में जानवर ख़रीद लिया था तो उसी की कुरबानी कर दे।
कुरबानी का वक़्त
बकरईद की दसवीं तारीख से लेकर बारहवीं तारीख़ की शाम तक कुरबानी करने का वक़्त है, चाहे जिस दिन कुरबानी करे, लेकिन कुरबानी करने का सबसे अफज़ल दिन बकरईद का दिन है, फिर गायरहवीं तारीख़ फिर बारहवीं तारीख ।
मसअलाः बकरईद की नमाज़ होने से पहले कुरबानी करना दुरुस्त नहीं है। ईद की नमाज़ पढ़ चुकें तब कुरबानी करें। अलबत्ता अगर कोई देहात में या गाँव में, या जहाँ ईद की नमाज़ नहीं होती ऐसी जगह हो तो वहाँ दसवीं तारीख़ को फज्र की नमाज़ के बाद कुरबानी कर देना दुरुस्त है।
मसअलाः बारहवीं तारीख़ का सूरज डूबने से पहले-पहले कुरबानी कर लेना दुरुस्त है, जब सूरज डूब गया तो अब कुरबानी करना दुरुस्त नहीं।
मसअलाः दसवीं से बारहवीं तक जब जी चाहे कुरबानी करे चाहे दिन में चाहे रात में, लेकिन रात को ज़िबेह करना बेहतर नहीं कि शायद कोई रग न कटे और कुरबानी न हो, अगर खूब ज़्यादा रोशनी हो जैसी शहरों में बिजली या ट्यूब लाइट की रोशनी होती है तो रात को कुरबानी कर लेने में कोई हर्ज नहीं।
कुरबानी की मन्नत और वसीयत
मसअलाः जिसने कुरबानी करने की मन्नत मानी फिर वह काम पूरा हो गया जिसके वास्ते मन्नत मानी थी तो अब कुरबानी करना वाजिब है चाहे मालदार हो या न हो, और मन्नत की कुरबानी का सब गोश्त फकीरों को खैरात कर दे, न आप खाये न अमीरों को दे। उसमें से जितना आप खाया हो या अमीरों को दिया हो उतना फिर खैरात करना पड़ेगा।
मसअलाः अगर कोई वसीयत करके मर गया कि मेरे ‘तरके’ यानी छोड़े हुए माल में से मेरी तरफ से कुरबानी की जाये और उसकी वसीयत के मुताबिक उसी के माल से कुरबानी की गयी तो उस कुरबानी का तमाम गोश्त वगैरह खैरात कर देना वाजिब है। जानना चाहिए कि वसीयत मय्यित के ‘तरके’ के तिहाई 1/3 के अन्दर-अन्दर नाफ़िज़ हो सकती है।
ग़ायब की तरफ से कुरबानी
कोई शख़्स यहाँ मौजूद नहीं है और दूसरे शख़्स ने उसकी तरफ से बगैर उसके कहने या ख़त लिखने के कुरबानी कर दी तो यह कुरबानी दुरुस्त नहीं हुई। और अगर किसी जानवर में किसी गायब का हिस्सा उसकी इजाज़त के बगैर तजवीज़ कर लिया तो और हिस्सेदारों की कुरबानी भी सही न होगी।
अलबत्ता अगर गायब आदमी ख़त लिखकर वकील बना दे तो उसकी तरफ से कुरबानी कर सकते हैं। जिनके लड़के ऐशिया के किसी दूर के शहर में हैं या यूरोप व अमेरिका में मुलाज़िम हैं अगर वे लिख दें कि हमारी तरफ से कुरबानी कर दी जाये तो उनकी तरफ से कुरबानी करने से अदा हो जायेगी।
कुरबानी के गोश्त और खाल को ख़र्च करने की जगह
हदीस
हज़रत अम्रह बिन्ते अबदुर्रहमान बयान फरमाती हैं जो हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की शार्गिद हैं कि मैंने हज़रत आयशा रज़िल्लाहु तआला अन्हा से सुना कि एक बार देहात के रहने वाले कुछ लोग हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में बकरईद के मौके पर मदीना मुनव्वरा में चले आये, हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कुरबानी करने वालों को हुक्म फरमाया कि अपनी कुरबानियों का गोश्त सिर्फ तीन दिन तक बतौर ज़ख़ीरा रख सकते हो और जो बचे उसको सदका कर दो,
फिर उसके बाद अगले साल बकरईद का मौका आया तो अर्ज किया गया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ! इससे पहले लोग अपनी कुरबानियों से अनेक किस्म के फायदे हासिल करते थे, उनकी चरबी पिघला कर काम में लाने के लिये रख लेते थे और उनकी खालों के मश्कीज़े बना लेते थे।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया वह क्या बात है जो अब पैदा हो गयी ? अर्ज किया या रसूलल्लाह ! आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस बात से मना फरमाया था कि कुरबानियों का गोश्त तीन दिन से ज़्यादा ज़ख़ीरे के तौर पर न रखा जाये। आपने फ़रमाया ! पिछले साल मैंने सिर्फ उस जमाअत की वजह से मना किया था जो बकरईद के मौके पर तुम्हारे पास आ गयी थी, बस अब खाओ और सदका करो और आइन्दा काम आने के लिये भी बतौर ज़ख़ीरा रख लो। (अबू दाऊद शरीफ पेज 388)
तशरीहः अल्लाह तआला की रिज़ा के लिये कुरबानी का जानवर ज़िबह कर देने से कुरबानी अदा हो जाती है। उसका गोश्त और पोस्त अल्लाह के यहा नहीं पहुँचता क्योंकि अल्लाह को किसी चीज़ की हाजत नहीं है उसके यहाँ इख़्लास और नेक-नीयती पर सवाब मिलता है। कुरआन मजीद में इरशाद हैः
तर्जुमाः अल्लाह तआला के पास न उनका गोश्त पहुँचता है और न उनका खून, लेकिन उसके पास तुम्हारा तक्वा (परहेज़गारी) पहुँचता है, इस तरह अल्लाह तआला ने उन जानवरों को तुम्हारे हुक्म के ताबे कर दिया कि तुम इस बात पर अल्लाह की बड़ाई बयान करो कि उसने तुमको इस तरह कुरबानी की तौफीक दी और इख़्लास वालों को खुशखबरी दीजिये।(सूरह हज आयत 37)
जो कोई शख़्स कुरबानी करता है वह कुरबानी के गोश्त और खाल और हड्डी हर चीज़ का मालिक होता है, अगर वह किसी फकीर मिस्कीन को कुछ भी न दे तब भी कुरबानी अदा हो जाती है, क्योंकि असल मकसद अल्लाह की रिज़ा के लिये खून बहाना और जान को उसके पैदा करने वाले हवाले करना है। लेकिन जब कुरबानी कर ली तो फकीरों व मिस्कीनों का भी ख़्याल रखना चाहिये।
अपने बाल-बच्चों को खिलाये खुद खाये जब तक मुनासिब जाने बाद में ख़र्च करने के लिये ज़ख़ीरा कर ले। फ्रीज में रखे, सुखाकर महफूज़ करके साल दो साल अगर कुरबानी का गोश्त रखा रहे तो भी कोई गुनाह नहीं।
हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक साल आरज़ी तौर पर तीन दिन से ज़्यादा बतौर ज़ख़ीरा रखने को मना फरमाया था और उसकी वजह यह थी जो ऊपर हदीस में ज़िक्र हुई कि कुछ लोग देहात में से आ गये थे उनकी खुराक का इन्तिज़ाम फरमाना मकसद था, फिर बाद में आइन्दा के लिये उसके ज़ख़ीरा करने की इजाज़त दे दी और पहले वाले हुक्म को निरस्त फरमा दिया, और फ़रमायाः “खाओ, सदका करो और ज़ख़ीरा करो”
हज़रत नबीशा हज़ली रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया गया है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि मैंने तुमको इस बात से मना किया था कि कुरबानियों का गोश्त तीन दिन से ज़्यादा खाओ, जिसका मकसद यह था कि इस गोश्त में तुम सबके लिये गुन्जाइश हो जायें यानी कुरबानी करने वालों और कुरबानी न करने वालों सबको पहुँच जाये।
अल्लाह तआला ने रिज़्क में गुन्जाइश दे दी लिहाज़ा तुम खाओ और ज़ख़ीरा करके रखो और सदका करके सवाब हासिल करो, और यह भी फरमाया कि ख़बरदार ! ये दिन खाने-पीने और अल्लाह का ज़िक्र करने के हैं। (अबू दाऊद)
कुरबानी के गोश्त से सदका करना ऊपर वाली हदीस से मालूम हुआ और जब गोश्त पकाये तो पड़ोसियों और रिश्तेदारों का ख़्याल रखना भी मुनासिब है, उन लोगों की दावत कर दे या घर भेज दे।
जैसा कि ऊपर अर्ज़ किया गया कि गोश्त और खाल वगैरह सब कुरबानी करने वालों की मिल्कियत होती है इसलिये उसे जिस तरह तमाम गोश्त खुद रख लेने का इख़्तियार है उसी तरह अगर वह कुरबानी के जानवर की खाल खुद ही रख ले और अपने काम में ले आये तो यह भी जायज़ है,
कुरबानी के जानवर की खाल को ‘दबाग़त’ कर ले यानी नमक वगैरह लगाकर सड़ने से महफूज़ कर दे और सुखा ले और फिर जायनमाज़ बना ले या- कोई ऐसी चीज़ बना ले जो घर की ज़रूरत में आती हो तो यह जायज़ है, अलबत्ता कुरबानी की खाल को फरोख्त न करे, और अगर मान लो फरोख्त कर दी तो उसकी कीमत को काम में लाना जायज़ नहीं, उसका सदका कर देना वाजिब है।
ज़कात हो या सदका-ए-फित्र या कुरबानी की खाल की रकम सय्यिद को और उस शख़्स को नहीं दे सकते जिसे ज़कात लेना जायज नहीं।
बहुत-से लोग कुरबानी की खाल मस्जिदों की ज़रूरत के लिये या ईदगाह बनाने के लिये या कब्रिस्तान की चार दीवारी खींचने के लिये दे देते हैं ताकि खालों को बेचकर इन कामों में रकम खर्च कर दी जाये। वाज़ेह रहे कि इन कामों में कुरबानी की खाल की रकम खर्च नहीं हो सकती, यह रकम सिर्फ उन्हीं लोगों को दी जा सकती है जिनको ज़कात लेना जायज़ हो।
बाज़ इलाकों में मशहूर है कि कुरबानी की खाल बेवाओं का हक है तो शरअन इसकी कोई हकीकत नहीं। हाँ अगर कोई बेवा ज़कात लेने की मुस्तहिक हो तो वह भी दूसरे फकीरों और मिस्कीनों की तरह कुरबानी की खाल की रकम ले सकती है, मगर हक जताने की कोई हैसियत नहीं।
और इससे भी ज़्यादा गलत बात यह है जो बहुत-से इलाकों में रिवाज पाये हुए है कि इमामों को कुरबानी की खालें या उनकी कीमत इमामत की उजरत में दे देते हैं, जिसकी सूरत यह होती है कि इमामों की तन्ख़्वाह मामूली होती है, वे ईद-बकरईद की आस लगाये बैठे रहते हैं, मोहल्ले का सदका, फित्रा और कुरबानी की खालें सब उनके सुपुर्द कर दी जाती हैं और उनको अपनी इमामत का बदला समझ कर सालाना ख़िदमत के बदले में सब वसूल कर लेते हैं, यह बिलकुल नाजायज़ है।
क्योंकि सदका-ए-फित्र और कुरबानी की खाल किसी मुआवज़े में देना दुरुस्त नहीं, इमामत की उजरत भी एक मुआवज़ा है। आजकल सस्ता चन्दा देखकर बहुत-सी अन्जुमनें वैलफेयर ऐसोसिएशन और हमदर्द क्लब और इमदादी कमेटियाँ बकरईद के ज़माने में निकल आती हैं, ये लोग खालों की रकम के ज़रिये चुनाव तक लड़े जाते हैं, उनको खालें देकर ज़ाया न करें और अपनी शरई ज़िम्मेदारी को पहचानें।
ईद के दिन खाने-पीने और अल्लाह का ज़िक्र करने के लिये हैं
ऊपर जो हमने नबीशा की हदीस नकल की है उसमें फरमाया है कि बकईद के दिन खाने-पीने और अल्लाह का ज़िक्र करने के दिन हैं, इसका मतलब यह है कि ये दिन अल्लाह पाक की मेहमानी के हैं, इन दिनों में, खायें पियें अल्लाह का शुक्र अदा करें रोज़ा न रखें। 10,11,12,13 जिलहिज्जा को रोज़ा रखना हराम है और ईदुल-फित्र के दिन भी रोज़ा रखना हराम है, वह दिन भी अल्लाह की मेहमानी का दिन है, बन्दे को हुक्म मानना चाहिये,
खाने पीने का हुक्म हो तो खाये पिये और जब खाने-पीने से रोक दिया जाये तो रुक जाये। रमज़ान के दिनों में खाना-पीना हराम है यानी रोज़ा रखना फ़र्ज़ है और ईद के दिन रोज़ा रखना हराम है। इसी तरह से बकरईद के शुरू के नौ (9) दिन रोज़े रखने की बड़ी फ़ज़ीलत आई है और खुसूसन नवीं तारीख के रोजे की तो बहुत ही ज्यादा फजीलत आई है है। लेकिन नवीं तारीख़ के बाद चार दिन रोज़े रखना हराम करार दिया गया है, बन्दे को हुक्म के ताबे रहना लाज़िम है।
हदीस में यह भी फ़रमाया कि ये दिन अल्लाह का ज़िक्र करने के हैं। आजकल के लोगों ने खाने-पीने को तो याद रखा है लेकिन आख़िरी बात यानी अल्लाह का ज़िक्र जो ईद की रूह है उससे गाफिल रहते हैं। इन दिनों में खूब ज़्यादा अल्लाह का ज़िक्र करना चाहिये।
‘तकबीरे तशरीक’ जो हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद पढ़ी जाती है वह भी अल्लाह का नाम बुलन्द करने के लिये शरीअत ने मुकर्रर की है और ईद की नमाज़ भी पूरा-का-पूरा ज़िक्र है, बल्कि उसमें दूसरी नमाज़ों के मुकाबले में ज़्यादा तकबीर शामिल कर दी गयी हैं, और खुत्बा भी पूरा-का-पूरा ज़िक्र है, उसमें भी तकबीर की कसरत करना मुस्तहब करार दिया गया है।
दीन के आलिमों ने लिखा है कि जब ईदुल-फित्र की नमाज़ के लिये जायें तो ‘तकबीरे तशरीक’ आहिस्ता कहते हुए जायें और जब ईदुल अज़हा की नमाज़ के लिये जायें तो ज़रा आवाज़ से तकबीरे तशरीक पढ़ते हुए जायें। यह सब ज़िक्र की अधिकता के प्रतीक हैं। अल्लाह का ज़िक्र ही मोमिन के लिये असल खुशी की चीज़ है, इसकी रूह अल्लाह के ज़िक्र ही से इत्मीनान हासिल कर सकती है।
ईद को गुनाहों से मुलव्वस न करें
अफ़सोस है कि इस ज़माने के मुसलमान ज़िक्र की तरफ तो क्या मुतवज्जह होते ईद के दिन खूब अच्छी तरह गुनाह करते हैं, उस दिन सिनेमा देखना बहुत-से लोगों ने अपने ज़िम्मे फ़र्ज़ कर रखा है, ईद की खुशी को सिनेमा के नापाक अमल से मिट्टी में मिला देते हैं।
क्योंकि गुनाह में कोई खुशी नहीं, अल्लाह को नाराज़ करने वाली चीज़ कैसे खुशी का सबब बन सकती है, बहुत-से लोग ईद के कपड़े बनाते हैं तो उसमें भी हराम हलाल का ख़्याल नहीं करते, मर्द टख़नों से नीचे कपड़े पहनते हैं, औरतें बारीक कपड़े पहनती हैं, और बहुत-से लोग खूब अच्छी तरह दाढ़ी मुंडाकर अंग्रेज़ी बाल तराशकर ईद की नमाज़ के लिये आते हैं।
जो ईद पूरी-की-पूरी नेकी और फरमाँबरदारी का मुज़ाहरा करने के लिये थी, उसे गुनाहों से मुलव्वस कर दिया तो ईद कहाँ रही? ईद तो इस्लामी चीज़ है, उस दिन हर काम खुसूसियत के साथ अच्छा और नेक होना चाहिये, उस दिन गुनाहों से बचने का ख़ास एहतिमाम किया जाये और तबीयत को आमादा किया जाये कि आइन्दा भी गुनाह न करेंगे। मोमिन की ज़िन्दगी गुनाहों वाली ज़िन्दगी नहीं होती।
ज़िलहिज्जा के पहले दशक में नेक आमाल की फज़ीलत
हदीस
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि बकरईद के दस दिनों में जिस कद्र नेक अमल अल्लाह को महबूब है उससे बढ़कर किसी ज़माने में भी इस कद्र महबूब नहीं। यानी ये दिन फ़ज़ीलत में दूसरे सब दिनों से बढ़े हुए हैं।
सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने अर्ज किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! क्या अल्लाह के रास्ते में जिहाद भी इन दिनों की इबादत से अफज़ल नहीं है? आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया अल्लाह के रास्ते में जिहाद भी इन दिनों से अफज़ल नहीं। हाँ मगर यह कि कोई शख़्स अपनी जान व माल लेकर निकले और उनमें से कुछ भी वापस लेकर न लौटे।(मिश्कात शरीफ, बुख़ारी शरीफ)
हदीस
हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि बकरईद के पहले दस दिनों में रोज़ा रखने से एक रोज़े का सवाब एक साल के रोज़ों के बराबर मिलता है, इन दिनों की रातों में नमाज़ में खड़ा होने से शबे कद्र में नमाज़ में खड़ा होने के बराबर सवाब मिलता है। (मिश्कात शरीफ)
आलिमों ने बताया है कि रमज़ान के आख़िरी दशक की रातें अफज़ल हैं और ज़िलहिज्जा के पहले दशक के दिन अफज़ल हैं क्योंकि उनमें ‘अरफा का दिन’ भी है। रमज़ान का आख़िरी दशक हो या ज़िलहिज्जा का पहला दशक इनमें रात-दिन इबादत में लगना चाहिये क्योंकि इन दोनों दशकों की हर घड़ी बहुत मुबारक है।
नवीं तारीख़ का रोज़ा
हज़रत अबू कतादा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बकरईद की नवीं तारीख़ के रोज़े के बारे में फरमाया कि मैं अल्लाह पाक से पुख्ता उम्मीद रखता हूँ कि इसकी वजह से एक साल पहले और एक साल बाद के गुनाहों का कफ़्फ़ारा फरमा देंगे। और फरमाया कि मुहर्रम की दसवीं तारीख के रोजे के बारे में अल्लाह तआला से पुख़्ता उम्मीद रखता हूँ कि इसकी वजह से एक साल पहले के गुनाहों का कफ़्फ़ारा फरमा देंगे। (मुस्लिम शरीफ)
मुतफर्रिक मसाइल
मसअलाः कुरबानी के जानवर को अपने हाथ से ज़िबह करना बेहतर है और दूसरे से ज़िबह कराना भी जायज़ है। अगर दूसरे से ज़िबह कराये और खुद वहाँ मौजूद हो तो बेहतर है जैसा कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत सैय्यदा फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा को कुरबानी के वक़्त जानवर के करीब हाज़िर होने को फरमाया, मगर औरत को परदे की पाबन्दी करनी लाज़िम है।
मसअलाः मालदार को भी कुरबानी का गोश्त दे सकते हैं और अपने नौकर-चाकर को देना भी दुरुस्त है, लेकिन काम के बदले और मेहनत-मज़दूरी के मुआवज़े में नहीं दे सकते। अगर कोई नौकर गैर-मुस्लिम है उसको भी कुरबानी का गोश्त दे सकते हैं बल्कि नौकर के अलावा भी कोई पास-पड़ोस में काफिर गोश्त तलब करे तो उसको भी देना दुरुस्त है।
मसअलाः कुरबानी के दिनों में जानवर की कुरबानी ही करना लाज़िम है, अगर जानवर को ज़िन्दा सदका कर दिया तो कुरबानी अदा नहीं हुई। हाँ अगर कुरबानी के दिनों में कोई शख़्स ज़िबह न कर सका जैसे जानवर न मिला या कोई और बात पेश आ गयी तो तीन दिन गुज़र जाने के बाद अगर जानवर मौजूद है तो उसको सदका कर दे वरना किसी मोहताज को कीमत दे दे।
मसअलाः कुरबानी सिर्फ अपनी तरफ से वाजिब है, अपनी औलाद या अपनी बीवी की तरफ से या माँ-बाप की तरफ से कुरबानी करना वाजिब नहीं, अलबत्ता अगर मालियत के एतिबार से उन लोगों पर अलग-अलग कुरबानी वाजिब होती हो तो हर एक शख़्स अपनी-अपनी तरफ से कुरबानी कर दे।
मसअलाः अगर किसी के ज़िम्मे मसले की रू-से कुरबानी वाजिब न थी यानी उसके पास इतना माल न था जिस पर कुरबानी वाजिब होती लेकिन उसने जानवर खरीद लिया तो अब उसकी कुरबानी वाजिब हो गई।
मसअलाः कुरबानी के जानवर के थनों में अगर दूध उतर आये और ज़िबह का वक़्त नहीं आया तो थनों पर ठंडा पानी छिड़क दें ताकि दूध उतरना रुक जाये, और अगर दूध निकाल लिया तो उसको सदका कर दें। इसी तरह ज़िबह करने से पहले अगर ऊन काट ली तो उसको भी सदका कर दे, हाँ अगर ज़िबह के बाद दूध निकाल लिया या ऊन काटी तो उसको अपने काम में ला सकते हैं। अगर कुरबानी मन्नत की हो तो अगरचे ज़िबह के बाद दूध निकाल लिया या ऊन काटी हो तब भी दोनों चीज़ों को सदका कर दें।
मसअलाः कुरबानी का जानवर ज़िबह कर दे तो उसकी झोली और रस्सी सदका करे।
मसअलाः मुर्तद, यानी जो दीन इस्लाम से फिर गया हो ज़िन्दीक, (यानी गुमराह) कादयानी, बेदीन का ज़िबह किया हुआ जानवर हराम है। उनसे ज़िबह न करायें, न कुरबानी के मौके पर और न किसी और मौके पर। अगर उनसे ज़िबह करा लिया तो न कुरबानी होगी न गोश्त हलाल होगा।
ये भी पढ़ें: मुर्दार जानवर की खाल पाक कैसे होती है? | सही हदीस और शरीअत का आसान तरीका़
तकबीरे तशरीक
मसअलाः बकरईद के दिनों में ‘तकबीरे तशरीक’ ज़रूरी है यानी हर फर्ज़ नमाज़ के बाद एक बार यह पढ़ेंः
अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबरु ला इला-ह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबरु व लिल्लाहिल्-हम्दु ।
मर्द ज़ोर से पढ़ें, औरतें आहिस्ता से पढ़ें। नवीं तारीख़ की फज्र की नमाज़ से लेकर तेरहवीं तारीख़ की असर की नमाज़ तक यह तकबीर हर फर्ज़ नमाज़ के बाद पढ़ी जाये। सलाम फेरकर फौरन पढ़ें।
ईद की रात की इबादत
जिस रात के बाद सुबह को ईद या बकरईद होने वाली हो उस रात को ज़िन्दा रखने यानी नमाज़ों में गुज़ारने की बड़ी फ़ज़ीलत आई है।
हज़रत अबू उमामा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जिसने दोनों ईदों की रातों को सवाब का यकीन रखते हुए ज़िन्दा रखा उसका दिल उस दिन न मरेगा जिस दिन लोगों के दिल मुर्दा होंगे, यानी क़ियामत के दिन ख़ौफ़ व घबराहट से महफूज़ रहेगा। (अत्तरगीब वत्तरहीब)
बाल व नाखून का मसला
हदीस
उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जो शख़्स ज़िलहिज्जा महीने का चाँद देख ले और उसका कुरबानी करने का इरादा हो तो उसे चाहिये कि अपने बाल और नाखून से कुछ भी न काटे। जब कुरबानी कर ले तब काटे। (मिश्कात शरीफ)
तशरीहः यह हुक्म एक मुस्तहब और पसन्दीदा अमल के तौर पर है, अमल करे तो अफ़ज़ल है, अगर उन दिनों में बाल या नाखून कटवा दिये तो गुनाह न होगा। हदीस पर अमल करने के लिये काटने से बाज़ रहे तो सवाब मिलेगा।
❓ कुर्बानी के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. कुर्बानी किस पर वाजिब होती है?
जवाब: हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ जिस मुसलमान के पास अपनी ज़रूरतों से ज़्यादा इतना माल या सामान हो जो निसाब की हद तक पहुँचता हो, उस पर कुर्बानी वाजिब होती है। सिर्फ़ ज़कात फ़र्ज़ होने का इंतज़ार करना ज़रूरी नहीं।
2. क्या औरत पर भी कुर्बानी वाजिब हो सकती है?
जवाब: जी हाँ। अगर किसी औरत के पास अपनी मिल्कियत में इतना माल या ज़ेवर हो जिससे कुर्बानी का निसाब पूरा होता हो, तो उस पर भी कुर्बानी वाजिब होगी।
3. कुर्बानी के लिए कौन-कौन से जानवर जायज़ हैं?
जवाब: बकरा, बकरी, भेड़, दुम्बा, गाय, बैल, भैंस और ऊँट वगैरह कुर्बानी के लिए जायज़ हैं। हर जानवर की उम्र और सेहत की शरई शर्तें पूरी होना ज़रूरी है।
4. कुर्बानी के जानवर की कम-से-कम उम्र कितनी होनी चाहिए?
जवाब: आम तौर पर बकरा-बकरी और इसी क़िस्म के जानवर कम-से-कम एक साल के, गाय-भैंस दो साल के और ऊँट पाँच साल के होने चाहिए। भेड़ या दुम्बा छह महीने का हो और साल भर के जानवर जैसा मालूम होता हो तो उसकी भी गुंजाइश बताई गई है।
5. क्या एक गाय में कई लोग कुर्बानी कर सकते हैं?
जवाब: जी हाँ। गाय, भैंस और ऊँट में अधिकतम सात हिस्से हो सकते हैं। हर हिस्सेदार की नीयत कुर्बानी और उसका सवाब हासिल करना होना चाहिए।
6. क्या बकरे में दो या तीन लोग शरीक हो सकते हैं?
जवाब: नहीं। छोटे जानवर जैसे बकरा या बकरी सिर्फ़ एक व्यक्ति की तरफ़ से होते हैं।
7. कुर्बानी का सही वक़्त कब से कब तक है?
जवाब: ईदुल-अज़हा की नमाज़ के बाद से 12 ज़िलहिज्जा के सूरज डूबने तक कुर्बानी का वक़्त रहता है। शहर में ईद की नमाज़ से पहले कुर्बानी करना दुरुस्त नहीं।
8. कुर्बानी का सबसे अफ़ज़ल दिन कौन सा है?
जवाब: कुर्बानी के दिनों में 10 ज़िलहिज्जा, यानी ईदुल-अज़हा का दिन, सबसे अफ़ज़ल है। इसके बाद 11वीं और फिर 12वीं तारीख़ है।
9. क्या कुर्बानी की जगह उसकी कीमत सदका कर सकते हैं?
जवाब: अगर किसी पर कुर्बानी वाजिब है तो सिर्फ़ जानवर की कीमत सदका कर देने से कुर्बानी अदा नहीं होगी। कुर्बानी के लिए मुक़र्रर जानवर को शरई तरीके से ज़िबह करना होता है।
10. कुर्बानी के गोश्त को कितने दिन तक रख सकते हैं?
जवाब: कुर्बानी का गोश्त खाने, सदका करने और बाद के लिए ज़ख़ीरा करने की गुंजाइश है। उसे फ़्रीज़र में रखकर बाद में इस्तेमाल करना भी जायज़ है।
11. क्या कुर्बानी का सारा गोश्त अपने घर में रख सकते हैं?
जवाब: कुर्बानी अदा हो जाती है, लेकिन फ़ुकरा, मिस्कीन, रिश्तेदारों और पड़ोसियों का ख़याल रखना बेहतर और सवाब का काम है।
12. क्या कुर्बानी का गोश्त गैर-मुस्लिम पड़ोसी को दे सकते हैं?
जवाब: ज़रूरत और मुनासबत के मुताबिक़ गैर-मुस्लिम पड़ोसी या पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति को भी गोश्त देने की गुंजाइश है।
13. क्या कुर्बानी की खाल बेच सकते हैं?
जवाब: खाल को अपने इस्तेमाल में लाना जायज़ है। अगर उसे बेच दिया जाए तो उसकी कीमत को अपने निजी इस्तेमाल में लाने के बजाय शरई तौर पर सदका करना चाहिए।
14. कुर्बानी के जानवर में कौन-कौन से ऐब नहीं होने चाहिए?
जवाब: ऐसा जानवर जिससे साफ़ तौर पर कोई बड़ा ऐब ज़ाहिर हो, जैसे बहुत ज़्यादा लंगड़ा, स्पष्ट रूप से काना, बहुत बीमार या बेहद दुबला-पतला जानवर, कुर्बानी के लिए दुरुस्त नहीं होता।
15. क्या कुर्बानी का जानवर खुद ज़िबह करना ज़रूरी है?
जवाब: नहीं। खुद ज़िबह करना बेहतर है, लेकिन किसी दूसरे मुसलमान से ज़िबह करवाना भी जायज़ है। अगर खुद ज़िबह न कर सकें तो किसी माहिर व्यक्ति को ज़िम्मेदारी दी जा सकती है।
16. क्या कुर्बानी के दिनों में बाल और नाखून काट सकते हैं?
जवाब: जिस व्यक्ति ने कुर्बानी का इरादा किया हो, उसके लिए ज़िलहिज्जा का चाँद नज़र आने के बाद कुर्बानी करने तक बाल और नाखून न काटना मुस्तहब अमल बताया गया है। अगर किसी ने काट लिए तो कुर्बानी ख़त्म या बातिल नहीं होती।
17. तकबीरे तशरीक कब पढ़ी जाती है?
जवाब: हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ 9 ज़िलहिज्जा की फ़ज्र से 13 ज़िलहिज्जा की असर तक हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद तकबीरे तशरीक पढ़ी जाती है।
18. क्या कुर्बानी सिर्फ़ मर्दों पर वाजिब होती है?
जवाब: नहीं। अगर किसी औरत के पास अपनी मिल्कियत में कुर्बानी के निसाब के मुताबिक़ माल है तो उस पर भी कुर्बानी वाजिब हो सकती है।
19. कुर्बानी का असल मक़सद क्या है?
जवाब: कुर्बानी का असल मक़सद सिर्फ़ गोश्त हासिल करना नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की रज़ा, तक़वा, इख़लास और फ़रमाँबरदारी का इज़हार करना है।
20. कुर्बानी हमें क्या सबक देती है?
जवाब: कुर्बानी हमें हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की फ़रमाँबरदारी, सब्र और अल्लाह की राह में अपनी पसंदीदा चीज़ क़ुर्बान करने का जज़्बा सिखाती है।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
खुदा हाफिज़…..
