Sahaba Kiram Ki Pakdamni
आज के दौर में जब हर तरफ़ नज़र को बहकाने वाली चीज़ें मौजूद हैं, सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की पाकदामनी और हया हमारे लिए एक बेहतरीन मिसाल है। उन्होंने नबी-ए-करीम ﷺ की तर्बियत से यह सीखा कि असली ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से कहने का नाम नहीं, बल्कि अपनी निगाह, दिल और अमल की हिफ़ाज़त करने का भी नाम है।
इस्लामी तारीख़ में ऐसे कई ईमान-अफ़रोज़ वाक़िआत मिलते हैं जहाँ गुनाह का मौक़ा सामने मौजूद था, लेकिन सहाबा किराम ने अल्लाह के ख़ौफ़ और रसूलुल्लाह ﷺ की तालीम की वजह से अपनी निगाहें झुका लीं और गुनाह से बचना पसंद किया। हज़रत मर्सद बिन अबी मर्सद ग़नवी रज़ियल्लाहु अन्हु का वाक़िया भी इसी पाकदामनी की एक शानदार मिसाल है।
इन वाक़िआत से हमें यह सबक मिलता है कि अगर दिल में अल्लाह तआला का ख़ौफ़, आख़िरत की फ़िक्र और ईमान की मिठास हो तो इंसान मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपने आपको गुनाह से बचा सकता है। आइए, सहाबा किराम की इस पाकीज़ा ज़िन्दगी से कुछ ज़रूरी सबक हासिल करें और अपनी निगाहों और अपने दिल की हिफ़ाज़त करने की कोशिश करें।
सहाबा किराम का पाकदामनी का जज़्बा
इस्लाम से पहले अरब में शराब पीना और बेहयाई आम थी और वे अपनी महफ़िलों में और अपनी बातचीत में इसका इज़्हार बड़े फख्र से किया करते थे।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पाकीज़ा तालीमात और आपके फ़ैज़े सोहबत ने सहाबा किराम पर ऐसा असर किया कि उनकी ज़िन्दगियाँ बिलकुल बदल कर रह गयीं। वही सहाबा किराम जो जाहिलियत के ज़माना में हर किस्म की अख़लाक़ी गुमराही का शिकार थे।
हुज़ूर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम की तर्बियत की बरकत से उनकी ज़ातें ऐसी पाक साफ़ हुई की उन्हें अख्लाकी बुराईयों से पूरी नफ़रत हो गई।
एक सहाबी मरसद बिन अबि मरसद गनवी रज़ियल्लाहु अन्हु को हिजरत के मौके पर यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि जो कमज़ोर और ज़ईफ़ लोग मक्का मुक्रर्रमा में रह गए हैं वह उनकी मक्का मुकर्रमा से मदीना मुनव्वरा की तरफ हिजरत में मदद व नुसरत करें और हिफ़ाज़त के साथ मदीना मुनव्वरा तक पहुँचाएँ।
एक दफ़ा वह इसी सिलसिले में मक्का तशरीफ़ ले गए। इत्तिफ़ाक़क से उनको अनाक़ नामी एक औरत के घर के पास से गुज़रना पड़ा। यह एक फ़ाहिशा औरत थी जिससे उनके इस्लाम से पहले कुछ ताल्लुक़ात रहे थे। उस औरत ने हज़रत मरसद को देखकर पहचान लिया और आगे बढ़कर उनका बड़ी गर्मजोशी से इस्तिक़बाल किया और रात को घर ठहरने पर इसरार करने लगी।
हज़रत मरसद रज़ियल्लाहु अन्हु चूँकि इस्लाम की रोशनी हासिल कर चुके थे इस तरह की बुराईयों से नफ़रत करने लगे थे लिहाज़ा साफ़ जवाब देते हुए फ़रमाया, “अब पहला ज़माना बाक़ी नहीं रहा, इस्लाम ने ज़िना को हराम क़रार दे दिया है लिहाज़ा मुझे माफ़ करो।” उसने कहा, अगर मेरी ख़ाहिश पूरी नहीं करोगे तो मैं शोर व गुल करूँगी और तुम्हें गिरफ्तार करवा दूँगी।
लेकिन इस धमकी के बावजूद हज़रत मरसद रज़ियल्लाहु अन्हु ने गंदगी में सनना पसन्द न किया और वहाँ से भाग खड़े हुए और छिपते-छिपाते काफ़िरों के चंगुल से निकल गए।
एक और सहाबी हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि मुझे पसंद है कि मेरी नाक मुर्दार की बू से भर जाए मगर यह पसन्द नहीं कि इसमें किसी गैर औरत की बू आए।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि नबी-ए-करीम अलैहि वसल्लम के ज़माने में एक हसीन औरत मस्जिद में आया करती थी और नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पीछे नमाज़ पढ़ा करती थी। बाज़ सहाबा किराम ने अपना यह मामूल बना लिया था कि वे उनसे बहुत पहले आकर अगली सफ़ में बैठ जाते कि उन पर निगाह न पड़ जाए।
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एक दफ़ा सहाबा किराम ने दुश्मन का कोई इलाक़ा फ़तेह किया। और उस इलाक़े में उनका लश्कर अमीर के साथ चला जा रहा था। ईसाईयों ने उनके ईमान पर डाका डालने के लिए वहाँ रास्ते में बेपर्दा औरतों को बना संवारकर खड़ा कर दिया। अमीरे लश्कर ने सिर्फ़ इतनी आयत पढ़ी : तर्जुमा : मोमिनीन से कह दो कि अपनी निगाहों को झुका लें।
तो सहाबा किराम ने निगाहें नीची कर लीं, उस शहर से गुज़र गए और शहर के दर व दीवर को न देखा। जब वापस आए तो मदीना मुनव्वरा के लोगों ने पूछा कि शहर के मकानों की बनावट कैसी थी, कितने ऊँचे थे?
तो फ़रमाने लगे जब हमें हुक्म मिला हमने निगाहें नीची कर लीं, ऊँची की ही नहीं यहाँ तक की इस शहर से वापस आ गए। हमें उस शहर के मकानों की ऊँचाई का पता ही नहीं चला, सुब्हानअल्लाह। Donate Now
FAQ – सहाबा किराम की पाकदामनी और निगाहों की हिफाज़त
सवाल 1: सहाबा किराम की पाकदामनी से हमें क्या सबक मिलता है?
जवाब: सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की ज़िन्दगी हमें सिखाती है कि सच्चा ईमान इंसान को गुनाह से बचने और अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करने की कोशिश करने पर आमादा करता है।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 2: इस्लाम में निगाह नीची रखना क्यों ज़रूरी है?
जवाब: इस्लाम इंसान को अपनी निगाहों की हिफाज़त करने की तालीम देता है, ताकि दिल को गुनाह और बेहयाई से बचाया जा सके। कुरआन में भी मोमिनों को अपनी निगाहें नीची रखने का हुक्म दिया गया है।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 3: हज़रत मर्सद बिन अबी मर्सद रज़ियल्लाहु अन्हु ने गुनाह से कैसे बचाव किया?
जवाब: जब एक ऐसी औरत ने उन्हें गुनाह की तरफ़ बुलाया जिससे पहले उनका ताल्लुक़ था, तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया और वहाँ से निकल गए। उन्होंने अल्लाह के हुक्म को अपनी ख़्वाहिश पर तरजीह दी।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 4: क्या गुनाह का मौक़ा होने के बावजूद उससे बचना बड़ी नेकी है?
जवाब: जी हाँ। जब इंसान अल्लाह के ख़ौफ़ की वजह से गुनाह छोड़ देता है, जबकि उसके पास गुनाह करने का मौक़ा मौजूद हो, तो यह उसके तक़वा और ईमान की अच्छी निशानी है।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 5: अपनी निगाहों की हिफाज़त कैसे करें?
जवाब: गैर-महरम को जान-बूझकर देखने से बचें, बेहयाई वाली तस्वीरों और वीडियो से दूरी रखें और जब अचानक निगाह पड़ जाए तो फ़ौरन निगाह हटा लें।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 6: सहाबा किराम की ज़िन्दगी हमारे लिए क्यों अहम है?
जवाब: क्योंकि उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ की सोहबत और तर्बियत से दीन सीखा और अपने अमल से उसकी मिसाल कायम की। उनकी ज़िन्दगी से हमें ईमान, हया, सब्र और पाकदामनी की तालीम मिलती है।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 7: क्या हया सिर्फ़ औरतों के लिए है?
जवाब: नहीं। इस्लाम में हया मर्द और औरत दोनों के लिए है। दोनों को अपनी निगाह, ज़बान, लिबास और अख़लाक़ की हिफाज़त करने की तालीम दी गई है।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 8: अगर अचानक किसी गैर-महरम पर निगाह पड़ जाए तो क्या करें?
जवाब: अगर अचानक निगाह पड़ जाए तो फ़ौरन निगाह हटा लेनी चाहिए और जान-बूझकर दोबारा देखने से बचना चाहिए।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 9: आज के दौर में सहाबा किराम की पाकदामनी से क्या सीख सकते हैं?
जवाब: आज के दौर में मोबाइल और इंटरनेट पर बेहयाई आसानी से सामने आ जाती है। इसलिए हमें सहाबा किराम की तरह अल्लाह के ख़ौफ़ को दिल में रखते हुए अपनी निगाह और अपने दिल की हिफाज़त करनी चाहिए।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
सवाल 10: इस वाक़िए का सबसे बड़ा सबक क्या है?
जवाब: सबसे बड़ा सबक यही है कि अल्लाह तआला की रज़ा के लिए गुनाह छोड़ना ही असली कामयाबी है। इंसान जब अपने नफ़्स पर काबू पाता है और अल्लाह के हुक्म को तरजीह देता है, तो यही तक़वा और पाकदामनी है।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Sahaba Kiram Ki Pakdamni
खुदा हाफिज़…..
