इंसान दो किस्म के होते हैं। कुछ शहद की मक्खी की तरह होते हैं और कुछ गंदी मक्खी की तरह होते हैं। शहद की मक्खी तो शहद बनाती है मगर गंदी मक्खी गंदगी पर बैठी होती है। उन
दोनों के अंदर एक बुनियादी फर्क है।
गंदी मक्खी के दिमाग में गंदगी की बू होती है। यह गंदी चीज़ों की तलाश में होती है। जहाँ गंदगी देखेगी वहीं बैठेगी। जिस्म पर भी बैठी तो जहाँ पर ज़ख़्म होगा, पीप होगी, यह वहाँ बैठेगी। लिहाज़ा गंदी मक्खी की सोच गंदी, उसकी तलाश गंदी, उसकी पसंद गंदी। वह हर गंदी चीज़ के आसपास ही घूमती फिरती है।
वहीं उसका डेरा और बसेरा होता है जबकि शहद की मक्खी के दिमाग में खुशबू रची होती है। यह ढूंढती है तो फूल को, वह बैठती है तो फलों पर, वह अगर चूसती है तो फलों के जूस को, शहद की मक्खी चमन को ढूंढेगी, गुलिस्तान को ढूंढेगी, फल और फूलों को ढूंढेगी। उसकी सोच अच्छी होती है और यह हर वक़्त अच्छी और खुशबूदार चीज़ों की तलाश में रहती है।
इस मिसाल को सामने रखकर सोचें तो इंसानों की भी दो किस्में होती हैं। कुछ लोग शहद की मक्खी की तरह होते हैं। उनके अपने अंदर भी खैर होती है और वे दूसरे के अंदर भी खैर को तलाश करते हैं, वे दूसरों को खैर की तरफ बुलाते हैं, वे दूसरों पर नज़र डालते हैं तो उन्हें दूसरों में खैर नज़र आती है। उनकी नज़र में दुनिया के सब लोग अच्छे होते हैं।
इसलिए कि उनके अपने अंदर अच्छाई होती है। और कुछ ऐसे लोग होते हैं कि जिनकी अपनी सोच गंदी होती है। उनके अपने अंदर ख़बासत भरी होती है। वे वहाँ बैठते हैं जहाँ उन्हें गंदे लोगों की महफिल नज़र आए। वे ऐसे लोगों से दोस्ती करते हैं जो बुरे होते हैं, वे ऐसे लोगों के पास अपना आना जाना रखते हैं जिनमें बुराई ग़ालिब होती है। वे अगर किसी बंदे पर नज़र डालेंगे तो उनकी निगाह बुराईयों को ढूंढेगीं।
उनको बंदे की अच्छाई नज़र नहीं आतीं। उनको बंदे की बुराइयाँ नज़र आती हैं, इसीलिए वह कहेंगे कि आज तो कोई भी अच्छा नहीं है न वे उलमा से राज़ी होंगे न वे पीरों से राज़ी होंगे, न वे हाकिमों से राज़ी होंगे, न माँ-बाप से राज़ी होंगे, दुनिया में वे किसी से राज़ी ही नहीं होते बल्कि कई तो ऐसे मनहूस होते हैं जो अपने परवरदिगार पर भी ऐतिराज़ करते फिरते हैं।
कहते हैं कि अल्लाह तआला ने हमारी दुआएं नहीं सुनीं और हमारी दुआएं कुबूल नहीं कीं। ऐसा बंदा गंदी मक्खी की तरह होता है। यह जहाँ बैठेगा बुरी बातें करेगा, जब भी सुनेगा बुरी बातें सुनेगा, जहाँ उसकी निगाह पड़ेगी यह बुराई की तरफ ध्यान करेगा। लिहाजा उसके दिमाग में हर वक़्त बुराई फैली रहेगी। अल्लाह तआला से दुआ करनी चाहिए कि वह हमें शहद की मक्खी की तरह अच्छा इंसान बना दे ताकि हम अच्छाई की तलाश में रहें।
खूबसूरत वाक़िआ:हज़रत उमर फ़ारूक़ के दौर की हया। Hazrat Umar Farooq ke Daur ki Hya.
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
