मस्जिदे अक्सा क्या है?
मस्जिदे अक्सा दुनिया की सबसे मुकद्दस मस्जिदों में से एक है। इस्लाम में इसका बहुत ऊँचा मकाम है। इसे बैतुल मुक़द्दस के नाम से भी जाना जाता है। कुरआन करीम और हदीस शरीफ़ में इसका बार-बार ज़िक्र मिलता है। यह वही मुकद्दस जगह है जहाँ से हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ को मेराज के सफ़र पर ले जाया गया था।
मस्जिदे अक्सा केवल एक इमारत नहीं, बल्कि इस्लामी इतिहास, अंबिया-ए-किराम और मुसलमानों की विरासत का एक अहम हिस्सा है। हर मुसलमान के दिल में इस मुकद्दस मस्जिद के लिए खास मोहब्बत और एहतराम होना चाहिए।
मस्जिदे अक्सा के दूसरे नाम
इस मुकद्दस मस्जिद को कई नामों से जाना जाता है, लेकिन सबसे मशहूर नाम ये हैं:
- मस्जिदे अक्सा
- बैतुल मुक़द्दस
- अल-मस्जिद अल-अक्सा
कुरआन और हदीस में भी इन्हीं नामों का ज़िक्र मिलता है।
किन तीन मस्जिदों की ज़ियारत के लिए सफ़र करना जायज़ है?
इस्लाम में पूरी दुनिया की मस्जिदों में नमाज़ पढ़ना नेक काम है, लेकिन खास तौर पर सिर्फ़ तीन मस्जिदें ऐसी हैं जिनकी ज़ियारत और वहाँ इबादत की नियत से सफ़र करने की इजाज़त दी गई है।
- मस्जिदुल हराम (मक्का मुकर्रमा)
- मस्जिदे नबवी (मदीना मुनव्वरा)
- मस्जिदे अक्सा (बैतुल मुकद्दस)
हज़रत अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि इन तीन मस्जिदों के अलावा किसी दूसरी मस्जिद की ज़ियारत की नियत से सफ़र न किया जाए।Masjid Al-Aqsa Ki Fazilat ,Tareekh aur islam me Ahmiyat.
इस हदीस से साफ़ मालूम होता है कि मस्जिदे अक्सा का इस्लाम में कितना बड़ा मकाम है।
दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी मस्जिद
हज़रत अबू ज़र गिफ़ारी (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा: “या रसूलल्लाह! ज़मीन पर सबसे पहले कौन-सी मस्जिद बनाई गई?”
आप ﷺ ने फ़रमाया: “मस्जिदुल हराम।” फिर पूछा गया: “उसके बाद कौन-सी?” आप ﷺ ने फ़रमाया: “मस्जिदे अक्सा।”
जब दोनों की तामीर के बीच का फ़ासला पूछा गया तो आपने फ़रमाया: “चालीस साल।”
इससे मालूम होता है कि मस्जिदे अक्सा दुनिया की सबसे प्राचीन और मुकद्दस मस्जिदों में से एक है।
मुसलमानों का पहला क़िबला
इस्लाम की शुरुआत में मुसलमान नमाज़ पढ़ते समय काबा शरीफ़ की तरफ़ नहीं बल्कि मस्जिदे अक्सा की तरफ़ रुख़ किया करते थे।
हिजरत के बाद भी लगभग 16 या 17 महीने तक मुसलमान बैतुल मुकद्दस की तरफ़ मुँह करके नमाज़ अदा करते रहे। बाद में अल्लाह तआला के हुक्म से क़िबला बदलकर काबा शरीफ़ कर दिया गया।
हालाँकि क़िबला बदल गया, लेकिन मस्जिदे अक्सा की अहमियत और फ़ज़ीलत हमेशा कायम रही और रहेगी।
कुरआन करीम में मस्जिदे अक्सा का ज़िक्र
मस्जिदे अक्सा का ज़िक्र अल्लाह तआला ने खुद कुरआन मजीद में फरमाया है। सूरह अल-इसरा (बनी इस्राईल) की पहली आयत में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है कि वह ज़ात पाक है जिसने अपने बन्दे (हज़रत मुहम्मद ﷺ) को रातों-रात मस्जिदुल हराम से मस्जिदे अक्सा तक सफ़र कराया, जिसके आस-पास की ज़मीन को अल्लाह ने बरकतों से भर दिया है, ताकि उन्हें अपनी निशानियाँ दिखाए।
इस आयत से मालूम होता है कि मस्जिदे अक्सा और उसके आसपास का इलाक़ा अल्लाह तआला की खास बरकतों वाला मुकद्दस इलाक़ा है।
मेराज का सफ़र यहीं से शुरू हुआ
इस्लामी इतिहास का सबसे बड़ा और अजीम मौजिज़ा मेराज है।
जब अल्लाह तआला ने अपने प्यारे हबीब हज़रत मुहम्मद ﷺ को आसमानों की सैर और अपनी खास निशानियाँ दिखाने का इरादा फरमाया, तो पहले हज़रत जिबरील (अलैहिस्सलाम) आपको मस्जिदुल हराम (मक्का) से मस्जिदे अक्सा लेकर आए।Masjid Al-Aqsa Ki Fazilat ,Tareekh aur islam me Ahmiyat.
यहीं से आप ﷺ ने आसमानों की तरफ़ मेराज का सफ़र शुरू किया। यही वजह है कि मस्जिदे अक्सा को मेराज से जुड़ी सबसे अहम जगहों में माना जाता है।
तमाम नबियों की इमामत का शरफ़
मेराज की रात मस्जिदे अक्सा में एक ऐसा वाक़िया पेश आया जिसकी मिसाल पूरी इंसानी तारीख़ में नहीं मिलती।
अल्लाह तआला ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) तक तमाम अंबिया-ए-किराम को मस्जिदे अक्सा में जमा फरमाया।
फिर अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद ﷺ ने उन सभी अंबिया-ए-किराम की इमामत फरमाई।
यह वाक़िया इस बात की दलील है कि आप ﷺ तमाम नबियों के सरदार और आख़िरी नबी हैं।
अंबिया-ए-किराम की सरज़मीन
बैतुल मुकद्दस और उसके आसपास का इलाक़ा कई अंबिया-ए-किराम की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है।
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम), हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम), हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम), हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम), हज़रत ज़करिया (अलैहिस्सलाम), हज़रत यहया (अलैहिस्सलाम) और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) जैसे कई नबियों का इस मुकद्दस सरज़मीन से गहरा ताल्लुक रहा है।
इसी वजह से इसे नबियों की धरती भी कहा जाता है।
मस्जिदे अक्सा में नमाज़ की फ़ज़ीलत
इस्लाम में मस्जिदुल हराम और मस्जिदे नबवी के बाद जिस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की सबसे ज़्यादा फ़ज़ीलत बयान की गई है, वह मस्जिदे अक्सा है।
यहाँ इबादत करना, दुआ करना और नमाज़ अदा करना बहुत बड़ा सवाब का काम है।
इसी कारण दुनिया भर के मुसलमान जब भी मौका मिलता है, मस्जिदे अक्सा की ज़ियारत की तमन्ना रखते हैं।
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हर मुसलमान के दिल में मस्जिदे अक्सा की मोहब्बत
मस्जिदे अक्सा सिर्फ़ फ़िलिस्तीन की एक मस्जिद नहीं, बल्कि पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा की अमानत है।
यह हमारे पहले क़िबले की निशानी है, मेराज की यादगार है और तमाम अंबिया-ए-किराम की इबादतगाह रही है।
इसलिए हर मुसलमान का फ़र्ज़ है कि वह इस मुकद्दस मस्जिद की अहमियत को जाने, उसके लिए दुआ करे और उसकी हिफाज़त की दुआ करता रहे।
मस्जिदे अक्सा की फ़तह की खुशखबरी
मस्जिदे अक्सा का ज़िक्र सिर्फ़ उसके मुकद्दस होने की वजह से ही नहीं, बल्कि इसकी फ़तह की खुशखबरी भी खुद नबी-ए-करीम ﷺ ने अपनी उम्मत को दी थी। यह नुबुव्वत की सच्चाई की बड़ी निशानियों में से एक है कि आपने उन घटनाओं की खबर दी जो बाद में पूरी हुईं।Masjid Al-Aqsa Ki Fazilat ,Tareekh aur islam me Ahmiyat.
इससे मालूम होता है कि मस्जिदे अक्सा का मामला सिर्फ़ एक शहर या एक इमारत का नहीं, बल्कि पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा की इज़्ज़त और दीनी विरासत का मामला है।
सलीबियों का हमला और मस्जिदे अक्सा
इतिहास गवाह है कि एक दौर ऐसा भी आया जब सलीबी फ़ौजों ने बैतुल मुकद्दस पर हमला कर दिया। उन्होंने शहर पर कब्ज़ा करने के बाद बड़ी संख्या में बेगुनाह मुसलमानों को शहीद कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार हजारों लोग इस हमले में शहीद हुए, जिनमें आलिम, इबादतगुज़ार और आम मुसलमान शामिल थे।
उस समय मस्जिदे अक्सा के आसपास रहने वाले बहुत से लोग सिर्फ़ इबादत और इल्म हासिल करने की नीयत से वहाँ रहते थे, लेकिन उन्हें भी नहीं बख्शा गया।
मस्जिद की बेहरमती
जब सलीबियों ने मस्जिदे अक्सा पर कब्ज़ा किया, तो उन्होंने उसकी पवित्रता को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की। मस्जिद की पहचान बदलने का प्रयास किया गया और उसके वातावरण को भी बदल दिया गया।
यह दौर मुसलमानों के लिए बहुत दुख और आज़माइश का था। पूरी उम्मत इस मुकद्दस मस्जिद की आज़ादी की दुआ करती रही।
सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी की बहादुरी
अल्लाह तआला ने फिर उम्मत को एक ऐसा बहादुर और दीनी रहनुमा अता फ़रमाया, जिनका नाम सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी रहमतुल्लाह अलैह है।
उन्होंने लंबे संघर्ष, सब्र और बहादुरी के बाद मस्जिदे अक्सा को दोबारा आज़ाद कराया। फ़तह के बाद उन्होंने बदले की भावना नहीं दिखाई, बल्कि इंसाफ़, रहम और अख़लाक़ का बेहतरीन नमूना पेश किया।Masjid Al-Aqsa Ki Fazilat ,Tareekh aur islam me Ahmiyat.
इसके बाद मस्जिदे अक्सा की सफ़ाई कराई गई, उसकी मरम्मत कराई गई और उसे फिर से एक मुकद्दस मस्जिद के रूप में आबाद किया गया।
मस्जिदे अक्सा हमें क्या सबक देती है?
मस्जिदे अक्सा का इतिहास हमें सिर्फ़ पुरानी घटनाएँ नहीं बताता, बल्कि कई अहम सबक भी देता है।
- अल्लाह के घरों का सम्मान करना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।
- मुश्किल हालात में भी ईमान और सब्र नहीं छोड़ना चाहिए।
- दीन की खातिर कुर्बानी देने वालों को अल्लाह कभी ज़ाया नहीं करता।
- मुसलमानों को आपस में एकता और भाईचारे के साथ रहना चाहिए।
- मुकद्दस जगहों की अहमियत को समझना और उनके लिए दुआ करना हर मोमिन का फ़र्ज़ है।
हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी
आज भी हर मुसलमान को मस्जिदे अक्सा की फ़ज़ीलत और उसकी अहमियत को जानना चाहिए। इसके लिए दुआ करनी चाहिए और अपने बच्चों को भी इसकी तारीख़ और इस्लामी मक़ाम के बारे में बताना चाहिए।
मस्जिदे अक्सा सिर्फ़ फ़िलिस्तीन की नहीं, बल्कि पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा की अमानत है। इसलिए हमें हमेशा इसकी सलामती, अमन और बरकत के लिए अल्लाह तआला से दुआ करते रहना चाहिए।
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मस्जिदे अक्सा की हिफाज़त के लिए दुआ करें
मस्जिदे अक्सा इस्लाम की सबसे मुकद्दस मस्जिदों में से एक है। हर मुसलमान के दिल में इसकी मोहब्बत और एहतराम होना चाहिए। यह सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि हमारे दीन, हमारी तारीख़ और अंबिया-ए-किराम की यादगार है।
हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों और आने वाली नस्लों को भी मस्जिदे अक्सा की अहमियत से वाकिफ़ कराएँ, ताकि उनके दिलों में भी इस मुकद्दस जगह की मोहब्बत पैदा हो।
हमें क्या सीख मिलती है?
मस्जिदे अक्सा का इतिहास हमें कई अहम बातें सिखाता है।
- अल्लाह के घरों का सम्मान करना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है।
- दीन की खातिर सब्र और कुर्बानी देने वालों को अल्लाह कभी ज़ाया नहीं करता।
- उम्मत की एकता ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त है।
- हर मुसलमान को मस्जिदे अक्सा और दूसरे मुकद्दस मकामात के लिए दुआ करते रहना चाहिए।
- अपने दीन की सही जानकारी हासिल करना और दूसरों तक पहुँचाना भी एक बड़ी नेकी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. मस्जिदे अक्सा कहाँ स्थित है?
मस्जिदे अक्सा बैतुल मुकद्दस (यरूशलम) में स्थित है और इस्लाम की सबसे मुकद्दस मस्जिदों में से एक है।Masjid Al-Aqsa Ki Fazilat ,Tareekh aur islam me Ahmiyat.
2. मस्जिदे अक्सा को पहला क़िबला क्यों कहा जाता है?
इसलिए कि मुसलमानों ने शुरुआत में लगभग 16 या 17 महीने तक इसी दिशा में रुख करके नमाज़ अदा की थी। बाद में अल्लाह तआला के हुक्म से क़िबला काबा शरीफ़ कर दिया गया।
3. मेराज का सफ़र कहाँ से शुरू हुआ था?
नबी-ए-करीम ﷺ को मस्जिदुल हराम से मस्जिदे अक्सा लाया गया और यहीं से मेराज का आसमानी सफ़र शुरू हुआ।
4. मस्जिदे अक्सा की ज़ियारत की क्या फ़ज़ीलत है?
यह उन तीन मस्जिदों में शामिल है जिनकी ज़ियारत और वहाँ इबादत की नियत से सफ़र करना शरीअत में जायज़ बताया गया है।
5. मस्जिदे अक्सा मुसलमानों के लिए क्यों अहम है?
क्योंकि यह पहला क़िबला है, मेराज से जुड़ी हुई जगह है और अनेक अंबिया-ए-किराम से इसका गहरा संबंध रहा है।Masjid Al-Aqsa Ki Fazilat ,Tareekh aur islam me Ahmiyat.
सबक
मस्जिदे अक्सा का नाम सुनते ही हर मुसलमान के दिल में इज़्ज़त, मोहब्बत और अकीदत का जज़्बा पैदा होना चाहिए। हमें इसके बारे में सही जानकारी हासिल करनी चाहिए और दूसरों तक भी पहुँचानी चाहिए।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वह मस्जिदे अक्सा की हिफाज़त फ़रमाए, फ़िलिस्तीन के मुसलमानों की मदद फ़रमाए, पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा को आपसी इत्तेहाद और अमन की दौलत अता फ़रमाए और हमें अपने मुकद्दस मकामात की कद्र करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
