29/08/2025
मैय्यत और दफ़न के सुन्नत तरीक़े। 20250710 175746 0000

मैय्यत और दफ़न के सुन्नत तरीक़े। Maiyat aur dafan ke sunnat tarike.

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Maiyat aur dafan ke sunnat tarike.
Maiyat aur dafan ke sunnat tarike.

जब किसी ऐसे आदमी के पास जाएँ जो मरने के क़रीब हो तो जरा ऊँची आवाज से कलिमा ‘ला इला-ह इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह’ पढ़ते रहें । रोगी से पढ़ने के लिए न कहें। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इरशाद है-“जब मरने वालों के पास बैठो तो कलिमा का जिक्र करते रहो।” (मुस्लिम)

किसी की साँस उखड़ते वक़्त सूरा यासीन की तिलावत कीजिए । नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि मरनेवालों के पास सूरा यासीन पढ़ा करो। (आलमगीरी, पृ० 100 भाग-1)

हाँ, दम निकलने के बाद जब तक मुर्दे को गुस्ल न दे दिया जाए, उसके पास बैठकर कुरआन शरीफ़ न पढ़िए और वह आदमी जिसको नहाने की जरूरत हो और हैज़ व निफास वाली औरतें भी मुर्दे के पास न जाएँ ।

मौत की खबर सुनकर ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन’ पढ़िए । नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि जो आदमी किसी मुसीबत के मौके पर ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन’ पढ़ता है, उसके लिए तीन बदले होते हैं- पहला यह कि उसपर अल्लाह की ओर से रहमत और सलामती उतरती है।
दूसरा यह कि उसको हक़ की तलाश व जुस्तजू का बदला मिलता है।
तीसरा यह कि उसके नुक़सान को पूरा किया जाता है और उसको फ़ौत होनेवाली चीज़ का उससे अच्छा बदला दिया जाता है ।(तबरानी)

मैय्यत के ग़म में चीखने-चिल्लाने और बैन करने से बचिए, अलबत्ता ग़म में आँसू निकल पड़ें तो यह फ़ितरी बात है। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बेटे हज़रत इबराहीम रजियल्लाहु तआला अन्हु का इंतिकाल हुआ तो आपकी आँखो से आँसू बह पड़े। इसी तरह आपके नवासे इब्ने जैनब रजियल्लाहु तआला अन्हा का इंतिकाल हुआ तो आपकी आँखो से आँसू जारी हो गए। पूछा गया, “ऐ अल्लाह के रसूल ! यह क्या ?” फ़रमाया- “यह रहमत है, जो ख़ुदा ने अपने बन्दों के दिल में रख दी है और ख़ुदा अपने बन्दों में से उन्हीं बन्दों पर रहम फ़रमाता है जो रहम करनेवाले हैं।”

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया कि जो मुँह पर तमाँचे मारे, गिरीबान फाड़े, जाहिलियत की तरह बैन करे, उसका हमसे कोई ताल्लुक नहीं । जान निकलने के बाद मैय्यत के हाथ-पैर सीधे कर दीजिए, आँखे बन्द कर दीजिए और एक चौड़ी-सी पट्टी ठोढ़ी के नीचे से निकालकर सिर के ऊपर बाँध दीजिए और पाँव के दोनों अंगूठे मिलाकर धज्जी से बाँध दीजिए और चादर से ढक दीजिए और यह पढ़ते रहिए- बिसमिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह (खुदा के नाम से और रसूलुल्लाह की मिल्लत पर)। लोगों को वफ़ात की सूचना दे दीजिए और क़ब्र में उतारते वक़्त भी यही दुआ पढ़िए ।

मैय्यत की खूबियाँ बयान कीजिए और बुराइयों का जिक्र न कीजिए । नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इरशाद है- “अपने मुर्दों की खूबियाँ बयान करो और उनकी बुराइयों से ज़बान को बन्द करो ।” (अबू दाऊद)

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया-“जब कोई आदमी मरता है तो उसके चार पड़ोसी उसके भला होने की गवाही देते हैं तो खुदा फ़रमाता है, मैने तुम्हारी गवाही मान ली और जिन बातों का तुम्हें इल्म न था, वे मैंने माफ़ कर दीं ।(इब्ने हिब्बान)

एक बार नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के हुजूर में सहाबा रजियल्लाहु तआला अन्हुमा ने एक जनाज़े की तारीफ़ की। आपने फ़रमाया-“इसके लिए जन्नत वाजिब हो गई। लोगो ! तुम जमीन पर ख़ुदा के गवाह हो, तुम जिसको अच्छा कहते हो ख़ुदा उसको जन्नत में दाखिल कर देता है और तुम जिसको बुरा कहते हो ख़ुदा उसको दोजख में भेज देता है।”(बुखारी, मुस्लिम)

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया- “जब किसी रोगी का हाल पूछने जाओ या किसी के जनाजे में शिरकत करो तो हमेशा जबान से भलाई के बोल बोलो, क्योंकि फ़रिश्ते तुम्हारी बातों पर आमीन कहते जाते हैं।”(मुस्लिम)

हमेशा मौत पर सब्र और जमाव जाहिर कीजिए। कभी ज़बान से कोई नाशुक्री का कलिमा न निकालिए। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इरशाद है-“जब कोई आदमी अपने बच्चे के मरने पर सब्र करता है तो ख़ुदा अपने फ़रिश्ते से फ़रमाता है, ‘क्या तुमने मेरे बन्दे के बच्चे की रूह क़ब्ज़ कर ली ? फ़रिश्ते जवाब देते हैं: पालनहार ! हमने तेरा हुक्म पूरा किया । फिर खुदा पूछता है: तुमने मेरे बन्दे के जिगर के टुकड़े की जान क़ब्ज़ कर ली ? वे कहते हैं: ‘जी हाँ !’ फिर वह पूछता है: तो मेरे बन्दे ने क्या कहा ? वे कहते हैं: पालनहार ! उसने तेरी हम्द की और ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन’ पढ़ा। तो ख़ुदा फ़रिश्तों से कहता है कि मेरे बन्दे के लिए जन्नत में एक घर बनाओ और उसका नाम बैतुल हम्द यानी शुक्र का घर रखो।”(तिरमिजी)

मुर्दे को नहलाने धुलाने में देर न कीजिए। गुस्ल के लिए पानी में बेरी के पत्ते डालकर हल्का गर्म कर लीजिए तो अच्छा है। मुर्दे को पाक-साफ़ तख़्ते पर लिटाइए, कपड़े उतारकर तहबन्द डाल दीजिए। हाथ पर कपड़ा लपेटकर पहले छोटा-बड़ा इस्तिंजा कराइए और खयाल रखिए कि तहबन्द ढका रहे, फिर वुजू कराइए। वुजू में कुल्ली करने और नाक में पानी डालने की जरूरत नहीं। गुस्ल कराते वक़्त कान और नाक में रूई रख दीजिए ताकि पानी अन्दर न जाए। फिर सिर को साबुन या किसी और चीज़ से अच्छी तरह धोकर साफ कर दीजिए, फिर बाएँ करवट लिटाकर दाईं तरफ़ सिर से पाँव तक पानी डालिए, फिर इसी तरह बाईं तरफ़ यानी सिर से पाँव तक डालिए। अब भीगा हुआ तहबन्द हटा दीजिए और सूखा तहबन्द डाल दीजिए और फिर उठाकर चारपाई पर कफ़न में लिटा दीजिए।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया-“जिसने किसी मैय्यत को गुस्ल दिया और उसके ऐब को छिपाया, ख़ुदा ऐसे बन्दे के चालीस बड़े गुनाह बख़्श देता है और जिसने किसी मैय्यत को क़ब्र में उतारा, तो गोया उसने मैय्यत को क़ियामत तक के लिए रहने का मकान जुटाया।”(तबरानी)

कफ़न औसत दर्जे के उजले कपड़े का बनाइए, न ज्यादा कीमती बनाइए और न बिलकुल ही घटिया बनाइए। मर्दों के लिए कफ़न में तीन पकड़े रखिए-एक चादर, एक तहबन्द और एक कफ़नी या कुरता। चादर की लम्बाई मैय्यत के क़द से ज्यादा रखिए, ताकि सिर और पाँव दोनों ओर बाँधा जा सके और चौड़ाई इतनी रखिए कि मुर्दे को अच्छी तरह लपेटा जा सके। औरतों के लिए इन कपड़ों के अलावा एक सरबन्द रखिए जो एक गज से कुछ कम चौड़ा और एक गज्ज से ज्यादा लम्बा हो और बगल से लेकर घुटने तक का सीनाबन्द भी रखिए।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इरशाद है-“जिसने किसी मैय्यत को कफ़न पहनाया तो खुदा उसको जन्नत में सुन्दुस और इस्तबरक़ का लिबास पहनाएगा।(हाकिम)

जनाजा कब्रिस्तान की तरफ जरा तेज क़दमों से ले जाइए। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, “जनाजे में जल्दी करो।”

हज़रत इब्ने मसऊद रजियल्लाहु तआला अन्हु ने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से पूछा. “ऐ अल्लाह के रसूल ! जनाजे को किस रफ़्तार से ले जाया करें ?” फ़रमाया -“जल्दी-जल्दी दौड़ने की रफ़्तार से कुछ कम. अगर मुर्दा भला है तो उसको भले अंजाम तक जल्दी पहुँचाओ और अगर बुरा है तो इस बुराई को जल्दी अपने से दूर करो।”

जनाजे के साथ पैदल जाइए। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम एक जनाजे के साथ चले और आपने देखा कि कुछ आदमी सवार हैं। आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनसे कहा-“तुम लोगों को शर्म नहीं आती कि खुदा के फ़रिश्ते पैदल चल रहे हैं और तुम जानवरों की पीठ पर हो।”

अलबत्ता जनाजे से वापसी पर सवारी पर आ सकते हैं। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अकरम अबू वाहिदी के जनाजे में पैदल गए और वापसी में घोड़े पर सवार होकर आए।

जब आप जनाजा आते देखें तो खड़े हो जाइए। फिर अगर उसके साथ चलने का इरादा न हो तो ठहर जाइए कि जनाज़ा कुछ आगे निकल जाए। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-“जब तुम जनाज़े को आते देखो तो खड़े हो जाओ और जो लोग जनाजे के साथ जाएँ. वे उस वक़्त तक न बैठें. जब तक जनाजा न रखा जाए।”

जनाजे की नामज़ पढ़ने का भी एहतिमाम कीजिए और जनाजे के साथ जाने और कंधा देने का भी एहतिमाम कीजिए। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इरशाद है-“मुसलमान का मुसलमान पर यह भी हक़ है कि वह जनाजे के साथ जाए।” और आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया कि “जो आदमी जनाजे में शरीक हुआ और जनाजे की नमाज़ पढ़ी तो उसको एक कीरात के बराबर सवाब मिलता है। नमाज़ के बाद जो दफ़न में भी शरीक हो, उसको दो क़ीरात के बराबर सवाब दिया जाता है। किसी ने पूछा : दो क़ीरात कितने बड़े होंगे ? फ़रमाया : दो पहाड़ों के बराबर।”(बुखारी, मुस्लिम)

मुर्दे की क़ब्र उत्तर-दक्षिण लम्बाई में खुदवाइए और मुर्दे को क़ब्र में उतारते वक़्त क़िबले की तरफ़ रखकर उतारिए। अगर मुर्दा हल्का हो तो दो आदमी उतारने के काफी हैं, वरना जरूत के मुताबिक़ तीन या चार आदमी भी उतारें। उतारते वक़्त मैय्यत का रुख क़िबले की ओर कर दीजिए और कफ़न की गिरहें खोल दीजिए। औरत को क़ब्र में उतारते वक़्त परदे का एहतिमाम कीजिए।

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त सिरहाने की ओर से शुरू कीजिए और दोनों हाथों में मिट्टी भरकर तीन बार क़ब्र पर डालिए।

पहली बार मिट्टी डालते वक़्त पढ़िए- ‘मिनहा ख-लक्क-नाकुम इसी जमीन से हमने तुमको पैदा किया।

दूसरी बार मिट्टी डालते वक़्त पढ़िए- व फीहा नु ईदुकुम और इसी में हम तुम्हें लौटा रहे हैं।

और तीसरी बार जब मिट्टी डालें तो पढ़िए- व मिन्हा नुखरिजुकुम ता-र-तन उखरा और इसी से हम तुम्हें दोबारा उठाएँगे।

मैय्यत की क़ब्र को न ज़्यादा ऊँचा कीजिए और न चौकोर बनाइए। बस उतनी ही मिट्टी क़ब्र पर डालिए जो उसके अन्दर से निकली है और मिट्टी डालने के बाद थोड़ा-सा पानी छिड़क दीजिए।

खूबसूरत वाक़िआ:-इस्लाम में खुशी मनाने का हक़।

दफ़न करने के बाद कुछ देर क़ब्र के पास ठहरिए। मैय्यत के लिए मग़फिरत की दुआ कीजिए। कुछ कुरआन शरीफ़ पढ़कर उसका सवाब मैय्यत को पहुँचाइए गैर लोगों को भी तवज्जोह दिलाइए कि इसतिग़फ़ार करें। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दफ़न के बाद खुद भी इसतिग़फ़ार फ़रमाते और लोगों से भी फ़रमाते- “यह वक़्त हिसाब का है, अपने भाई के लिए साबित-क़दमी की दुआ माँगो और मग़फ़िरत तलब करो।” (अबू दाऊद)

अज़ीज़ों, रिश्तेदारों या पास-पड़ोस में किसी के यहाँ मैय्यत हो जाए तो उसके यहाँ दो-एक वक़्त का खाना भिजवा दीजिए, इसलिए कि वे ग़म से परेशान होंगे। जामेअ तिरमिज़ी में है कि जब हज़रत जाफर रजियल्लाहु तआला अन्हु के शहीद होने की खबर आई तो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, “जाफ़र के घरवालों के लिए खाना तैयार कर दो, वे आज मशगूल हैं।”

तीन दिन से ज्यादा मैय्यत का शोक न कीजिए। अलबत्ता किसी औरत का शौहर पर जाए तो उसके शोक की मुद्दत चार महीने दस दिन है। जब उम्मुल मुमिनीन हजरत उम्मे हबीबा रजियल्लाहु तआला अन्हा के बाप अबू सुफियान रजियल्लाहु तआला अन्हु का इंतिफाल हुआ तो बीबी जैनब रजियल्लाहु तआला अन्हा उनके पास मातमपुर्सी के लिए गईं।

हज़रत उम्मे हबीबा ने खुश्बू मँगवाई। उसमें जाफरान की जर्दी वगैरह मिली हुई थी। उम्मुल मुमिनीन ने वह खुश्बू अपनी बांदी को मली और फिर कुछ अपने मुँह पर मली और फिर फ़रमाने लगीं- “खुदा गवाह है, मुझे खुश्बू की कोई जरूरत नहीं थी, मगर मैंने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को यह फ़रमाते सुना है कि जो औरत खुदा और आखिरत के दिन पर ईमान रखती है, वह किसी मुर्दे का शोक तीन दिन से ज्यादा न मनाए. अलबत्ता शौहर के शोक की मुद्दत चार महीने और दस दिन है।”(अबू दाऊद)

मैय्यत की तरफ़ से हैसियत के मुताबिक़ सदक़ा और खैरात भी कीजिए। अलबत्ता इस मामले में गैर-इस्लामी रस्मों से सख़्ती के साथ बचने की कोशिश कीजिए।

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….

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