हुक़ूक़ का बयान
मां-बाप के हुकूक :- इनको तकलीफ़ न पहुंचाओ, भले ही इनकी तरफ से कुछ ज़्यादती हो।
जुबान से बर्ताव से, इनकी इज़्ज़त करो।
जायज़ कामों में इनका कहा मानो।
अगर इनको ज़रूरत हो, माल से इनकी खिदमत करो, भले ही वे काफिर हों।
मां-बाप के मरने के बाद उनके ये हुकूक हैं :-
इनके लिए मगफिरत और रहमत की दुआ करते रहें। नफ़्ल इबादतों और खैरात का सवाब उनको पहुंचाता रहे।
उनके मिलने वालो के साथ एहसान और ख़िदमत से अच्छी तरह पेश आये।
उनके ज़िम्मे जो कर्ज़ हो, या किसी जायज़ काम की वसीयत कर गए हैं, और अल्लाह तआला ने कुदरत दी हो, उसको अदा करे।
उनके मरने के बाद शरअ के खिलाफ रोने-चिल्लाने से बचे, वरना उनकी रूह को तकलीफ़ होगी और दादा-दादी और नाना-नानी का हुक्म शरीअत में मां-बाप जैसा है। उनके हुकूक भी मां-बाप जैसे समझने चाहिए। इसी तरह खाला और मामूं, मां की तरह और चचा-फूफी बाप की तरह है, जैसा कि हदीस के इशारे से मालूम होता है।
हुकूक ये हैं :-
इसके साथ अदब से पेश आना।
अगर उसको माल की ज़रूरत हो और अपनी गुंजाइश हो, तो उसका ख्याल करना।
सौतेली मां-चूंकि बाप का दोस्त है और बाप के दोस्त के साथ एहसान करने का हुक्म आया है, इसलिए सोतेली मां के भी कुछ हुक़ूक़ हैं, जैसा अभी जिक्र किया गया।
बड़ा भाई- हदीस के मुताबिक बाप जैसा है, इसलिए मालूम हुआ कि छोटा भाई औलाद जैसा है, पस उनके आपस में वैसे ही हुकूक होंगे जैसे मां-बाप और औलाद के हैं। इसी तरह बड़ी बहन और छोटी बहन को समझ लेना चाहिए।
रिश्तेदारों को हुक़ूक़:-
अपने सगे अगर मुहताज हों और खाने-कमाने की कुदरत न रखते हों, तो गुंजाइश के मुताबिक उनके जरूरी खर्च की ख़बरगीरी रखो। कभी-कभी उनसे मिलते रहे।
उनसे ताल्लुक ख़त्म न करे, बल्कि अगर कुछ भी उनसे तक्लीफ़ भी पहुंचे तो सब बेहतर है।
ससुराली रिश्ते का ज़िक्र भी अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में फरमाया है। इससे मालूम हुआ कि सास और ससुर और साले और बहनोई और दामाद और बहू और बीवी की पहली औलाद और इसी तरह मियां की पहली औलाद का भी कुछ हक़ होता है, इसलिए इन रिश्तों में भी रियायत एहसान व अख़्लाक को औरों से ज़्यादा रखना चाहिए।
आम मुसलमानों के हुकूक-
मुसलमान मुसलमान की गलती को माफ करे।
उसके रोने पर दया करे।
उसके ऐब को ढंके।
उसके उजुर को कुबूल करे।
उसकी तकलीफ़ को दूर करे।
हमेशा उसका भला चाहे।
उसकी मुहब्बत निबाहे।
उसके अहद का ख्याल रखे।
बीमार हो तो पूछे।
मर जाये तो दुआ करे।
उसकी दावत कुबूल करे।
उसका तोहफा कुबूल करे।
उसके एहसान के बदले एहसान करे।
उसकी नेमत का शुक्र अदा करे।
ज़रूरत के वक़्त उसकी मदद करे।
उसके बाल-बच्चों की हिफाज़त करे।
उसका काम कर दिया करे।
उसकी बात को सुने।
उसकी सिफारिश कुबूल करे।
उसको मुराद से ना उम्मीद न करे।
वह छींककर अल्हम्दु लिल्लाह कहे तो जवाब में यह रमुकल्लाह कहे।
उसकी गुम हुई चीज़ अगर मिल जाए तो उसके पास पहुंचा दे।
उसके सलाम का जवाब दे।
नर्मी और अच्छे अख़्लाक के साथ उससे बात चीत करे।
उसके साथ एहसान करे।
अगर वह उसके भरोसे पर कसम खा बैठे तो उसको पूरा करे।
अगर उस पर कोई जुल्म करता हो तो उसकी मदद करे। अगर वह किसी पर जुल्म करता हो, रोक दे।
उसके साथ मुहब्बत करे, दुश्मनी न करे।
उसको रूसवा न करे।
जो बात अपने लिए पसंद करे, उसके लिए भी पसंद करे।
मुलाकात के वक़्त उसको सलाम करे और मर्द से मर्द और औरत से औरत मुसाफा भी करे, तो और बेहतर है।
खूबसूरत बयान:-सब्र और उसका तरीक़ा | Sabr aur uska tarika.
अगर आपस में, कभी रंजिश हो जाए तो तीन दिन से ज्यादा बातचीत छोड़े नहीं।
उस पर बद-गुमानी न करे।
उससे जले नहीं न बैर-भाव रखे।
उसको अच्छी बात बतलाये, बुरी बात से मना करे।
छोटों पर रहम, बड़ों का अदब करे।
दो मुसलमानों में मन मुटाव हो जाये, उनकी आपस में सुलह करा दें।
उसकी गीबत न करे।
उसको किसी तरह का नुक्सान न पहुंचाये, न माल में, न आबरू उसको उठा कर उसकी जगह न बैठे।
पड़ोसी के हुकूक :-
उसके साथ एहसान और रियायत से पेश आएं।
उसकी बीवी-बच्चों की आबरू की हिफाज़त करे।
कभी-कभी उसके घर तोहफा वगैरह भेजते रहे, खास कर जब कि वह उपवास का मारा हो, तो ज़रूर थोड़ा बहुत खाना उसको दे।
उसको तकलीफ़ न दे। हल्की-हल्की बातों में उससे न उलझे और जैसे शहर में पड़ोसी होता है, इसी तरह सफर में भी होता है, यानी सफर का साथी, जो घर से साथ हुआ हो या रास्ते में संयोग से उस का साथ हो गया हो, उसका हक़ भी पड़ोसी जैसा ही है। उसके हुकूक का खुलासा यह है कि उसके आराम को अपने आराम से बड़ा रखें। कुछ आदमी रेल या बहली में दूसरी सवारियों के साथ बहुत आपा-धापी करते हैं, यह बहुत बुरी बात है।
इसी तरह जो दूसरों का मुहताज हो-जैसे यतीम और बेवा या बेकार और बूढ़ा या मिस्कीन व बीमार और हाथ-पांव से मजबूर या मुसाफिर या भिखारी, उन लोगों के हुकूक ज़्यादा हैं-
इन लोगों की खिदमत माल से करना।
इन लोगों का काम अपने हाथ से कर देना।
इन लोगों का दिल रखना, तसल्ली करना, इनकी ज़रूरत और मांग को रद्द न करना।
कुछ ऐसे हुकूक जो सिर्फ आदमी होने की वजह से हैं चाहे वे मुसलमान न हों। वे इस तरह है :-
बे-ख़ता किसी को जान या माल की तकलीफ़ न दे।
बे-वजह शरी किसी के साथ बद-जुबानी न करे।
और किसी को मुसीबत और उपवास और रोग में फंसा देखे, उसकी मदद करे, खाना-पीना दे दे, दवा-वगैरह कर दे।
जिस सूरत में शरीअत ने सज़ा की इजाजत दी है, उसमें जुल्म व ज़्यादती न करे।
जानवरों के हुकूक :-
जिस जानवर से कोई फायदा मुताल्लिक न हो, उसको कैद न करें, ख़ास तौर से बच्चों को घोंसलों से निकाल लाना और उनके मां-बाप को परेशान करना बड़ा जुल्म है।
जो जानवर खाने के काबिल हैं, उनको भी सिर्फ दिल बहलाने के तौर पर कत्ल न करे।
जो जानवर अपने काम में हैं, उनके खाने-पीने और आराम व खिदमत का पूरे तौर से इन्तिज़ाम करे। उनकी ताकत से ज़्यादा उनसे काम न ले, उनको हद से ज़्यादा न मारे।
जिन जानवरों को ज़िब्ह करना हो या तक्लीफ़ पहुंचाने वाला होने की वजह से कत्ल करना हो, तेज़ औज़ार से जल्दी काम तमाम कर दो उसको तड़पाये नहीं, भूखा-प्यासा रख कर जान न ले।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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