14/08/2026
1786533432758

हज़रत हाजराؓ और हज़रत इस्माईलؑ का वाक़िआ: वीरान मक्का में कैसे निकला ज़मज़म का चश्मा?Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia: Veeran Makkah Mein Kaise Nikla Zamzam Ka Chashma? Amazing story

Share now
Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia
Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

हज़रत हाजरा रज़ियल्लाहु अन्हा और उनके साहबज़ादे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम का वाक़िआ ईमान, सब्र, तवक्कुल और अल्लाह तआला पर पूरा भरोसा रखने की एक ऐसी मिसाल है, जिसे पढ़कर दिल को बहुत असर होता है। सोचिए, एक ऐसी वीरान और बेआब वादी जहाँ न कोई आबादी थी, न खाने-पीने का सामान और न ही दूर-दूर तक पानी का कोई निशान।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला के हुक्म से हज़रत हाजरा रज़ियल्लाहु अन्हा और नन्हे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को उसी वीरान वादी में छोड़कर वापस चले गए। हज़रत हाजरा रज़ियल्लाहु अन्हा ने जब हालात देखे तो अल्लाह तआला पर भरोसा किया और अपने रब के फैसले पर राज़ी हो गईं।

फिर जब पानी खत्म हो गया और नन्हे इस्माईल अलैहिस्सलाम को शिद्दत की प्यास लगी, तो हज़रत हाजरा रज़ियल्लाहु अन्हा पानी की तलाश में सफ़ा और मरवा के दरमियान सात मर्तबा दौड़ीं। इसी वाक़िए से आज हज और उमरा में सफ़ा-मरवा की सई की याद जुड़ी हुई है।

फिर अल्लाह तआला ने अपनी कुदरत का ऐसा मुज़ाहिरा फरमाया कि उसी वीरान ज़मीन से ज़मज़म का चश्मा जारी हो गया, जो सदियों से मुसलमानों के लिए बरकत और यादगार बना हुआ है।

आइए, इस ईमान अफ़रोज़ वाक़िए को आसान अंदाज़ में जानते हैं और समझते हैं कि हज़रत हाजरा रज़ियल्लाहु अन्हा के सब्र और तवक्कुल से हमें क्या सबक मिलता है।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दो बीवियाँ थीं। पहली बीबी का नाम सारा और दूसरी बीबी का नाम हाजरा था। सरज़मीने शाम में हज़रत हाजरा के बतन (पेट) पाक से हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम पैदा हुए।

हज़रत सारा के कोई औलाद न थी इस वजह से उन्हें रश्क पैदा हुआ और उन्होंने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से कहा कि आप हाजरा और उनके बेटे को मेरे पास से जुदा कर दीजिए।

हिकमते इलाही ने यह एक वजह पैदा किया था चुनाँचे वही आई कि हज़रत सारा के कहने के मुताबिक आप हाजरा और उनके बेटे इस्माईल को उस सरज़मीन में ले जाएं जहाँ अब मक्का मुकर्रमा आबाद है।

वही के मुताबिक हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हाजरा और उनके बेटे को बुराक पर सवार करके शाम से सर ज़मीने हराम में ले आए और काबा मुकद्दसा के नज़दीक उतारा।

यहाँ उस वक़्त न कोई आबादी थी। न कोई चश्मा (जहां से पानी निकलता हो) न कोई पानी । काबा मुकद्दसा भी तूफाने नूह के वक़्त आसमान पर उठा लिया गया था। गोया उस वक्त वह जगह बिल्कुल वीरान खुश्क (सूखी ) और गैर आबाद थी।

खाने पीने का पानी दूर दूर तक निशान न था। ऐसे भयानक मुकाम पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हाजरा व इस्माईल को एक तोशा दान में कुछ खुजूरें और एक बर्तन पानी उनको देकर उतारा और आप वहाँ से वापस हुए और मुड़ कर उनकी तरफ न देखा।

हज़रत हाजरा ने यह सूरते हाल देखकर अर्ज़ किया कि आप हमें इस वीरान वादी में तन्हा छोड़ कर कहाँ जाते हैं। आपने कुछ जवाब न दिया। हज़रत हाजरा ने फिर पूछा कि क्या अल्लाह ने आपको इसका हुक्म दिया है? आपने फरमाया हाँ। उस वक्त आपको इत्मीनान हुआ हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम चले गए।

हज़रत हाजरा अपने फरज़न्द (बेटा) इस्माईल को दूध पिलाने लगी। जब वह पानी खत्म हो गया और प्यास की शिद्दत गालिब हुई और साहबजादे शरीफ का हलक भी खुश्क हो गया तो आप पानी की तलाश में सफा मरवा की पहाड़ियों के दरम्यान सात मरतवा इधर उधर दौड़ीं।

यहाँ तक कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के कदमे मुबारक मारने से इस खुश्क ज़मीन से पानी निकल आया जो आज तक ज़मज़म के नाम से मशहूर है। इत्तेफाकन वहाँ से एक कवीला जुरहुम का गुज़र हुआ। उन्हों ने दूर से एक से परिन्दा देखा। वह हैरान हुए कि इस खुश्क वादी में परिन्दा कैसा?

शायद कहीं पानी का चश्मा नमूदार हुआ है चुनांचे वह इस तरफ आए तो देखा एक पानी का चश्मा जारी है और एक नूरानी शक्ल की औरत अपनी गोद में बच्चा लिए तन्हा बैठी है। यह मंजर देखकर वह हैरान रह गए ।

यह देख सुनकर कबीला वालों ने हज़रत हाजरा से वहाँ बसने की इजाज़त चाही। आपने इजाज़त दे दी। वह लोग वहाँ बसे और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम जवान हुए तो उन लोगों ने आपके सलाह व तक्वा को देखकर अपने खानदान में उनकी शादी कर दी। यही वह जगह है जहाँ अब काबा शरीफ और मक्का मुकर्रमा का शहर है और अतराफे आलम से लोग खचे खचे वहाँ हाज़िर होते हैं।

खुदा तआला के हर काम में हिकमत छुपी होती है। हज़रत हाजरा के यहाँ फरज़न्द (बेटा) पैदा फरमा कर हज़रत सारा के ज़रिआ मां-बेटे को एक ऐसी जगह पहुँचाया जहाँ खाने पीने का कोई सामान न था और फिर उनकी बरकत से उस वीरान जगह को मरकज़े आलम बना दिया,

मालूम हुआ कि अल्लाह के मकबूल बन्दे किसी वीरान जगह भी तशरीफ़ फरमा हो जाएं तो वह जगह आबाद हो जाती है और लोग हज़ारों तकलीफ भी बर्दाश्त करके वहाँ पहुँचने लग जाते हैं।

चुनांचे मक्का मुकर्रमा का मुकद्दस शहर हज़रत हाजरा और उनके साहबजादे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के कदमाने मुबारक की बरकत से आबाद हुआ ,और यह भी मालूम हुआ कि हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम के कदम बचपन के आलम में भी ऐसे बाबरकत थे कि उन की बदौलत जो चश्मा जारी हुआ। आज तक वह खुश्क नहीं हुआ और करोड़ों अरबों खरबों लोगों की प्यास बुझा चुका है।

बुझा रहा है और बुझाता रहेगा। हमारे खुदे हुए कुएँ दिन रात मुसलसल इस्तेमाल होने पर खुश्क हो जाते हैं मगर एक नबी के कदमे मुबारक की बरकत देखिए कि यह चश्मा हज़ारों साल से बदस्तूर जारी है। अब भी हर साल लाखों की तादाद में हुज्जाज वहाँ पहुँचते हैं। उसी ज़मज़म के कुएं से नहाते भी हैं। वज़ू भी करते हैं। कफन भी भिगो कर लाते हैं और फिर डरमों में भर भर कर उसका पानी अपने वतन में भी लाते हैं।

ये भी पढ़ें: हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम कौन थे? कुरआन में ज़िक्र, उनकी ज़िंदगी और अनमोल नसीहतें

यह कुआं चौबीस घन्टे दिन रात चलता रहता है ट्यूब वेल से और डोलों से हर वक्त उससे पानी निकाला जाता रहता है। लेकिन अल्लाह रे बरकते कदमे नबी कि आज तक इस कुएं से पानी ख़त्म नहीं हुआ और न होगा और क्यामत तक ऐसा ही रहेगा यह कदमे नबी ही का सदका है कि दुनिया भर की ज़मीन के सारे पानियों से ज़मज़म का पानी अफजल है।

सिर्फ एक पानी ज़मज़म के पानी से भी अफ़्ज़ल है और वह पानी है जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उंगलियों से जारी हुआ था।

यह भी मालूम हुआ है कि आज भी जो हाजी सफा मरवा की पहाड़ियों के दरम्यान सात चक्कर लगाते हैं। यह हज़रत हाजरा की सुन्नत पर अमल और उनकी नकल करना है।

इसी तरह हज के दौरान में काबा शरीफ़ का तवाफ और हजरे असवद को चूमना हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अदा-ए-मुबारक की नकल है। मिना में शैतानों को पत्थर मारने हज़रत इब्राहीम व इस्माईल अलैहिस्सलाम की नकल है।

गोया सारा हज ही अल्लाह के मक्बूलों की अदाओं की नकल करना है। मालूम हुआ कि अल्लाह के मक्बूलों की नकल करना ही अल्लाह की इबादत है। बाज़ लोग जो गैरुल्लाह! गैरुल्लाह की रट लगाए फिरते हैं वह बताएं कि यह क्या बात हैं?

ये भी पढ़ें: हज़रत इब्राहीम, हाजरा और इस्माईल अलैहिस्सलाम | ज़मज़म, सफ़ा-मरवा और काबा की हैरतअंगेज़ कहानी

कि हज में नकल हो अल्लाह के मक्बूलों की और इबादत हो अल्लाह की देखिए यह पाँच नमाजें जो हम पर फर्ज है यह भी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अदाहा-ए-मुबारक की नकल है वरना अगर नमाज की रकात और रुकू व सुजूद ही असल मक्सूद होते तो कोई शख्स फज्र की दो रकात के बजाए चार रकात और मग्रिब की तीन रकात की बजाए छे: रकात पढ़ता तो खुदा को खुश होना चाहिए था।

कि उसने मेरे लिए रकात और रुकू व सुजूद ज्यादा कर दिए मगर नहीं ऐसे शख्स पर खुदा खुश नहीं होगा बल्कि उसकी नमाज़ ही अदा न होगी इसलिए कि उसने अल्लाह के महबूब की सही नकल नहीं उतारी अल्लाह के महबूब नफ्ल की दो रकात पढ़ी हैं

तो खुदा को भी दो ही रकात मंजूर हैं। हुजूर ने मग्रिब की तीन रकात पढ़ी हैं तो ख़ुदा को भी तीन ही रकात महबूब है इसलिए कि अल्लाह रकात को नहीं देखता बल्कि अपने महबूब की अदाओं को देखता है। इसी वासते हुज़ूर ने भी फरमा दिया कि नमाज़ ऐसी पढ़ो जैसे मुझे पढ़ते हुए देखते हो।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

FAQ – हज़रत हाजराؓ, हज़रत इस्माईलؑ और ज़मज़म से जुड़े सवाल-जवाब

सवाल 1: हज़रत हाजराؓ और हज़रत इस्माईलؑ को मक्का में क्यों छोड़ा गया था?
जवाब: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला के हुक्म पर हज़रत हाजराؓ और हज़रत इस्माईलؑ को उस वीरान वादी में ठहराया था जहाँ बाद में मक्का मुकर्रमा आबाद हुआ।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 2: ज़मज़म का पानी कैसे जारी हुआ?
जवाब: जब पानी खत्म हो गया और नन्हे हज़रत इस्माईलؑ को प्यास लगी, तो हज़रत हाजराؓ पानी की तलाश में सफ़ा और मरवा के बीच दौड़ीं। फिर अल्लाह तआला ने अपनी कुदरत से ज़मज़म का पानी जारी फरमाया।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 3: हज़रत हाजराؓ ने सफ़ा और मरवा के बीच कितनी बार दौड़ लगाई?
जवाब: हज़रत हाजराؓ ने पानी की तलाश में सफ़ा और मरवा के बीच सात मर्तबा दौड़ लगाई। इसी की याद में हज और उमरा में सफ़ा-मरवा की सई की जाती है।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 4: ज़मज़म का कुआँ कहाँ है?
जवाब: ज़मज़म का कुआँ मक्का मुकर्रमा में मस्जिदुल हराम के अंदर काबा शरीफ के पास है।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 5: ज़मज़म का पानी मुसलमानों के लिए इतना खास क्यों है?
जवाब: ज़मज़म हज़रत इस्माईलؑ और हज़रत हाजराؓ के वाक़िए से जुड़ा हुआ एक मुबारक पानी है। मुसलमान इसे अदब और बरकत के साथ पीते हैं।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 6: सफ़ा और मरवा की सई किसकी यादगार है?
जवाब: सफ़ा और मरवा की सई हज़रत हाजराؓ की उस कोशिश की यादगार है, जब उन्होंने अपने नन्हे बेटे के लिए पानी की तलाश में इन दोनों पहाड़ियों के बीच दौड़ लगाई थी।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 7: मक्का मुकर्रमा कैसे आबाद हुआ?
जवाब: ज़मज़म के पानी के ज़ाहिर होने के बाद वहाँ से गुजरने वाले लोगों ने पानी देखा और वहाँ ठहरने की इजाज़त चाही। धीरे-धीरे वहाँ आबादी बसती गई और यही जगह आगे चलकर मक्का मुकर्रमा बनी।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 8: इस वाक़िए से हमें क्या सबक मिलता है?
जवाब: इस वाक़िए से हमें सब्र, तवक्कुल, कोशिश और अल्लाह तआला पर भरोसा रखने का सबक मिलता है। मुश्किल हालात में इंसान को मायूस नहीं होना चाहिए बल्कि अल्लाह पर भरोसा रखते हुए अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 9: क्या हज में सफ़ा-मरवा की सई करना ज़रूरी है?
जवाब: जी हाँ, हज और उमरा के अरकान में सई का अहम मकाम है। इसकी पूरी फिक्ही तफसील अपने मस्लक के भरोसेमंद आलिम से मालूम करना बेहतर है।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

सवाल 10: क्या ज़मज़म का पानी आज भी मिलता है?
जवाब: जी हाँ, ज़मज़म का पानी आज भी मस्जिदुल हराम में मौजूद है और दुनिया भर से आने वाले हाजी और उमराह करने वाले इसे पीते हैं।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Hazrat Hajra (RA) Aur Hazrat Ismail (AS) Ka Waqia
खुदा हाफिज़…..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *