12/08/2026
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हज़रत इब्राहीम, हाजरा और इस्माईल अलैहिस्सलाम | ज़मज़म, सफ़ा-मरवा और काबा की हैरतअंगेज़ कहानी| Hazrat Ibrahim, Hajara & Ismail (A.S.) | Zamzam, Safa Marwa Aur Kaaba Ki Hairatangez Kahani amazing story

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Hazrat Ibrahim, Hajara & Ismail (A.S.)
Hazrat Ibrahim, Hajara & Ismail (A.S.)

Hazrat Ibrahim, Hajara & Ismail (A.S.)

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का मुबारक वाक़िया ईमान, सब्र, कुर्बानी और अल्लाह पर मुकम्मल भरोसे से भरा हुआ है। उनकी ज़िंदगी में ऐसे कई इम्तिहान आए, जिनसे हमें अल्लाह के हुक्म के सामने सर झुकाने और हर हाल में उस पर भरोसा रखने की बड़ी सीख मिलती है।

हज़रत हाजरा और नन्हे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को मक्का की एक वीरान और बंजर वादी में छोड़ने का वाक़िया भी बहुत दिल को छू लेने वाला है। जहां न पानी था, न आबादी और न कोई सहारा। लेकिन हज़रत हाजरा ने अल्लाह पर भरोसा रखा और फिर अल्लाह तआला ने ज़मज़म के चश्मे के ज़रिए उनकी मदद फ़रमाई।

इसी वाक़िए से सफ़ा और मरवा की सई और मक्का की आबादी के एक अहम दौर की शुरुआत हुई। आगे चलकर हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल अलैहिमस्सलाम ने मिलकर बैतुल्लाह की तामीर की और यह मुक़द्दस घर तौहीद और इबादत का एक बड़ा मरकज़ बना।

आइए, इस दिलचस्प और इबरत से भरे वाक़िए को आसान अंदाज़ में जानते हैं और देखते हैं कि हज़रत इब्राहीम, हज़रत हाजरा और हज़रत इस्माईल अलैहिमस्सलाम की ज़िंदगी हमें सब्र, कुर्बानी और अल्लाह पर भरोसे का क्या पैग़ाम देती है।

पैदाइश

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मिस्र से वापसी पर फ़लस्तीन में रिहाइश अख्तियार की। इस इलाके को कनआन भी कहा जाता है।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उस वक़्त तक औलाद से महरूम थे। तौरात के मुताबिक़ हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में बेटे के लिए दुआ की और अल्लाह ने उनकी दुआ को कुबूल फ़रमा लिया और उनको तसल्ली दी। यह दुआ इस तरह कुबूल हुई कि हज़रत की छोटी बीवी मोहतरमा हज़रत हाजरा हामिला हुईं।

जब हज़रत सारा को यह पता चला तो उन्हें बशर के तक़ाज़े के तौर पर रश्क पैदा हो गया। इस सूरतेहाल से मजबूर होकर हज़रत हाजरा उनके पास से चली गईं। तौरात के मुताबिक़ उनका गुज़र एक ऐसी जगह पर हुआ, जहां एक कुंवां था। उस जगह वह फ़रिश्ते से हमकलाम हुईं और कुंवें का नाम ‘जिंदा नज़र आने वाले का कुंवां’ रखा। थोड़े दिनों बाद हज़रत हाजरा के बेटा पैदा हुआ और फ़रिश्ते की बशारत के मुताबिक़ उसका नाम इस्माईल रखा गया।

बंजर घाटी और हाजरा व इस्माईल

हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की पैदाइश के बाद के हालात बुख़ारी शरीफ़ में हज़रत अब्दुल्लाह विन अब्बास से नक़ल की गई रिवायत में इस तरह वयान हुए हैं-

‘इब्राहीम अलैहिस्सलाम हजारा और दूध पीते बच्चे इस्माईल को लेकर चले और जहां आज काबा है, उस जगह एक बड़े पेड़ के नीचे ज़मज़म की मौजूदा जगह से ऊपरी हिस्से पर उनको छोड़ गए, वह जगह वीरान और गैर-आबाद थी और पानी का नाम व निशान न था, इसलिए इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने एक मशक पानी और एक थैली खजूर भी उनके पास छोड़ दी और फिर मुंह फेर कर रखाना हो गए।

हाजरा उनके पीछे-पीछे यह कहते हुए चलीं, ऐ इब्राहीम ! तुम हमको ऐसी घाटी में कहां छोड़कर चल दिए, जहां न आदमी है और न आदमी का बच्चा और न कोई मूनिस व ग़मख़्वारः। हाजरा बराबर यह कहती जाती थीं, मगर इब्राहीम अलैहिस्सलाम खामोश चले जा रहे थे। आखिर हाजरा ने मालूम किया क्या तेरे अल्लाह ने तुझको यह हुक्म दिया है? तब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः हां! अल्लाह के हुक्म से है।

हाजरा ने जब यह सुना तो कहने लगीं, अगर यह अल्लाह का हुक्म है तो बेशक वह हम को ज़ाया और बर्बाद नहीं करेगा और फिर वापस लौट आईं। इब्राहीम अलैहिस्सलाम चलते-चलते जब एक टीले पर ऐसी जगह पहुंचे कि उनके घर वाले निगाह से ओझल हो गए, तो उस ओर जहां काबा है, रुख़ किया और हाथ उठाकर यह दुआ मांगी-

तर्जुमा-‘ऐ हम सबके परवरदिगार! (तू देख रहा है कि) एक ऐसे मैदान में जहां खेती का नाम व निशान नहीं, मैंने अपनी कुछ औलाद तेरे मोहतरम घर के पास लाकर बसाई है कि नमाज़ क़ायम रखें (ताकि यह मोहतरम घर एक ख़ुदा की इबादत करने वालों से ख़ाली न रहे) पस तू (अपने फ़ज़्ल व करम से) ऐसा कर कि लोगों के दिल उनकी तरफ़ मायल हो जाएं और उनके लिए ज़मीन की पैदावार से रिज़्क़ का सामान मुहैया कर दे, ताकि तेरे शुक्रगुज़ार हों। (इब्राहीम 14:37)

‘हाजरा कुछ दिनों तक मशक से पानी और खुरजी से खजूरें खातीं और इस्माईल अलैहिस्सलाम को दूध पिलाती रहीं, लेकिन वह वक़्त भी आ गया कि न पानी रहा न खजूरें, तब वह सख़्त परेशान हुईं। चूंकि वह भूखी-प्यासी थीं, इसलिए दूध भी न उतरता था और बच्चा भी भूखा-प्यासा रहने लगा, जब हालत बिगड़ने लगी और बच्चा बेताब होने लगा, तो हाजरा इस्माईल अलैहिस्सलाम को छोड़कर दूर जा बैठीं, ताकि इस हालते ज़ार में उसको अपनी आंख से न देखें।

कुछ सोचकर क़रीब की पहाड़ी सफ़ा परं चढ़ीं कि शायद कोई अल्लाह का बन्दा नज़र आ जाए या पानी नज़र आ जाए, मगर कुछ नज़र न आया। फिर बच्चे की मुहब्बत में दौड़कर घाटी मे आ गईं, इसके बाद दूसरी ओर की पहाड़ी मर्वा पर चढ़ गई और वहां भी जब कुछ नज़र न आया, तो फिर तेज़ी से लौट कर घाटी में बच्चे के पास आ गईं और इस तरह सात बार किया।

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस जगह पहुंच कर फ़रमाया कि यही वह ‘सफ़ा और मर्वा के बीच की सई’ है जो हज में लोग करते हैं। आख़िर में वह मरवः पर थीं तो कानों में एक आवाज़ आई, चौंकीं और दिल में कहने लगीं कि कोई पुकारता है, कान लगाया, तो फिर आवाज़ आई। हाजरा कहने लगीं, अगर तुम मदद कर सकते हो, तो सामने आओ, तुम्हारी आवाज़ सुनी गई, देखा तो अल्लाह का फ़रिश्ता (जिब्रील) है।

फ़रिश्ते ने अपना पैर (या एड़) उस जगह मारा, जहां ज़मज़म है, उस जंगह पानी उबलने लगा। हाजरा ने यह देखा तो पानी के चारों ओर बाड़ बनाने लगीं, मगर पानी बराबर उबलता रहा। उस जंगह पहुंच कर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, अल्लाह तआला उम्मे इस्माईल अलैहिस्सलाम पर रहम करे, अगर वह ज़मज़म को इस तरह न रोकतीं और उसके चारों तरफ़ बाड़ न लगातीं, तो आज वह ज़बरदस्त चश्मा होता।

हाजरा ने पानी पिया और फिर इस्माईल अलैहिस्सलाम को दूध पिलाया। फ़रिश्ते ने हाजरा से कहा, ख़ौफ़ और ग़म न कर, अल्लाह तआला तुझको और इस बच्चे को ज़ाया न करेगा। यह मुक़ाम ‘बैतुल्लाह’ है, जिसकी तामीर इस बच्चे (इस्माईल) और इसके बाप इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़िस्मत में मुक़द्दर हो चुकी है। इसलिए अल्लाह तआला इस ख़ानदान को हलाक नहीं करेगा।

बैतुल्लाह की यह जगह क़रीब की ज़मीन से नुमायां की, मगर पानी का सैलाब दाहिने-बाएं उस हिस्से को बराबर करता जा रहा था।

इसी दौरान बनी जुरहम का एक क़बीला इस घाटी के क़रीब आ ठहरा, देखा तो थोड़े से फ़ासले पर परिंदे उड़ रहे हैं। जुरहम ने कहा, यह पानी की निशानी है, जहां ज़रूर पानी मौजूद है। जुरहम ने भी क़ियाम की इजाज़त मांगी। हाजरा ने फ़रमाया, क़ियाम कर सकते हो, लेकिन पानी में मिल्कियत के हिस्सेदार नहीं हो सकते। जुरहम ने यह बात खुशी से मंजूर कर ली। और वहीं मुक़ीम हो गए।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि हाजरा भी आपसी उन्स व मुहब्बत और साथ के लिए यह चाहती थीं कि कोई आकर यहां ठहरे, इसलिए उन्होंने खुशी के साथ बनी जुरहम को क़ियाम की इजाजत दे दी। जुरहम ने आदमी भेजकर अपने बाक़ी ख़ानदान वालों को भी बुला लिया और यहां मकान बनाकर रहने-सहने लगे। इन्हीं में इस्माईल अलैहिस्सलाम भी रहते और खेलते और उनसे उनकी जुबान सीखते। जब इस्माईल अलैहिस्सलाम बड़े हो गए तो उनका तरीक़ा और अन्दाज और उनकी खूबसूरती बनी जुरहम को बहुत भाई और उन्होंने अपने ख़ानदान की लड़की से उनकी शादी कर दी। इसके कुछ दिनों बाद हाजरा का इंतिक़ाल हो गया।’

यह लम्बी रिवायत बुख़ारी ‘किताबुर्रोया और किताबुल अंबिया’ में दो जगह नक़ल की गई है और दोनों से यही साबित होता है कि इस्माईल बंगर घाटी और बिन खेती की धरती मक्का में दूध पीते बच्चे की हालत में पहुंचे थे, लेकिन इब्राहीम अलैहिस्सलाम अगरचे हाजरा और इस्माईल अलैहिस्सलाम को मक्का के बयाबान और सेहरा में छोड़ आए थे, लेकिन बाप थे, नबी और पैग़म्बर थे, बीवी और बेटे को कैसे भूल सकते थे और उनकी देख-भाल से कैसे बे-परवा हो सकते थे, वे बराबर इस बिना पानी के और हरियाली के मैदानी इलाक़े में आते रहते और अपने ख़ानदान की निगरानी करते कहते थे, जैसा कि इसी हदीस के आख़िरी हिस्से से ज़ाहिर होता है, जिसका ज़िक्र आगे आता है-

बहरहाल अगरचे कुरआन की किसी आयत से यह साबित नहीं होता कि इस्माईल अलैहिस्सलाम (मक्का की) धरती पर किस सन में पहुंचाए गए, मगर ऊपर की रिवायतें कहती हैं कि यह ज़माना हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के दूध पीने का ज़माना था और यही सही है।

नेक बीवी का किरदार

ऊपर ज़िक्र की गई हदीस में हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की बीवियों के बारे में इस तरह बयान हुआ है-

‘इब्राहीम बराबर अपने बाल-बच्चों को देखने आते रहते थे। एक बार तशरीफ़ लाए, तो इस्माईल अलैहिस्सलाम घर पर न थे, उनकी बीवी से मालूम किया तो उन्होंने जवाब दिया कि रोज़ी की खोज में बाहर गए हैं। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मालूम किया, गुज़रान की क्या हालत है? वह कहने लगी, सख़्त मुसीबत और परेशानी में हैं और बड़े दुख और तक्लीफ़ में। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने यह सुनकर फ़रमाया, इस्माईल अलैहिस्सलाम से मेरा सलाम कह देना और कहना कि अपने दरवाज़े की चौखट तब्दील कर दो।

इस्माईल अलैहिस्सलाम वापस आए तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम के नूरे नुबूवत के असरात पाए, पूछा: कोई आदमी यहां आया था? बीवी ने सारा क़िस्सा सुनाया और पैग़ाम भी। इस्माईल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि वह मेरे बाप इब्राहीम अलैहिस्सलाम थे और उनका मश्विरा है कि तुझको तलाक़ दे दूं, इसलिए मैं तुझको जुदा करता हूं।

इस्माईल अलैहिस्सलाम ने फिर दूसरी शादी कर ली। एक बार इब्राहीम अलैहिस्सलाम फिर इस्माईल अलैहिस्सलाम की गैर-मौजूदगी में आए और उसी तरह उनकी बीवी से सवाल किए। बीवी ने कहा, अल्लाह का शुक्र व एहसान है, अच्छी तरह गुज़र रही है। मालूम हुआ, खाने को क्या मिलता है? इस्माईल अलैहिस्सलाम की बीवी ने जवाब दिया, गोश्त । इब्राहीम ने पूछा और पीने को ? उसने जवाब दिया, पानी। तब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने दुआ मांगी, अल्लाह! इनके गोश्त और पानी में बरकत अता फ़रमा। और चलते हुए यह पैग़ाम दे गए कि अपने दरवाज़े की चौखट को मजबूत रखना।

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हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम आए तो उनकी बीवी ने तमाम वाकिया दोहराया और पैग़ाम भी सुनाया, इस्माईल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि यह मेरे बाप इब्राहीम अलैहिस्सलाम थे और उनका पैग़ाम यह है कि तू मेरी जिंदगी भर जीवन-साथी रहे।’

ख़त्ना

तौरात के बयान के मुताबिक़ जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम की उम्र निन्नान्वे साल हुई और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की तेरह साल, तो अल्लाह तआला का हुक्म आया कि ख़त्ना करो। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हुक्म की तामील में पहले अपनी की और इसके बाद इस्माईल अलैहिस्सलाम कि और तमाम ख़ानाज़ादों (घरवालों) और गुलामों की ख़त्ना कराई। यही ख़त्ने की रस्म आज भी इब्राहीमी मिल्लत का शिआर है और सुन्नते इब्राहीमी के नाम से मशहूर है।

ज़िब्हे अज़ीम

अल्लाह के मुक़र्रब बन्दों को इम्तिहान व आज़माइश की सख़्त-से-सख़्त मंज़िलों से गुज़रना पड़ता है। पहली मंज़िल वह थी जब उनको आग में डाला गया, तो उस वक़्त उन्होंने जिस सब्र और अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी होने का सबूत दिया, वह उन्हीं का हिस्सा था। इसके बाद जब इस्माईल को और हाजरा को फ़ारान के बयाबान में छोड़ आने का हुक्म मिला, तो वह भी मामूली इम्तिहान न था। अब एक तीसरे इम्तिहान की तैयारी है जो पहले दोनों से भी ज़्यादा हिला देने वाला और जान लेने वाला इम्तिहान है, यही कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम तीन रात बराबर ख़्वाब देखते हैं कि अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इब्राहीम! तू हमारी राह में अपने इकलौते बेटे की कुरबानी दे।

नबियों का ख़्वाब ‘सच्चा ख़्वाब’ और वह्य इलाही होता है, इसलिए इब्राहीम अलैहिस्सलाम रज़ा व तस्लीम बनकर तैयार हो गए कि अल्लाह के हुक्म की जल्द से जल्द तामील करें, चूंकि यह मामला अकेली अपनी ज़ात से मुताल्लिक़ न था, बल्कि इस आज़माइश का दूसरा हिस्सा वह ‘बेटा’ था, जिसकी कुरबानी का हुक्म दिया गया था, इसलिए बाप ने अपने बेटे को अपना ख़्वाब और अल्लाह का हुक्म सुनाया, बेटा इब्राहीम जैसे नबी और रसूल का बेटा था, तुरन्त हुक्म के आगे सर झुका दिया और कहने लगा, अगर अल्लाह की यही मर्जी है, तो इन्शाअल्लाह आप मुझको सब्र करने वाला पाएंगे।

इस वात-चीत के बाद बाप-बेटे अपनी कुरबानी पेश करने के लिए जंगल रवाना हो गए। बाप ने बेटे की मर्जी पाकर ज़िब्ह किए जाने वाले जानवर की तरह हाथ-पैर बांधे, छुरी को तेज़ किया और बेटे को पेशानी के बल पछाड़ कर ज़िब्ह करने को तैयार हो गए, फ़ौरन अल्लाह की वह्य इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई, ऐ इब्राहीम ! तूने अपना ख़्वाब सच कर दिखाया। बेशक यह बहुत सख़्त और कठिन आज़माइश थी।

अव लड़के को छोड़ और तेरे पास जो यह मेंढा खड़ा है, उसको बेटे के बदले में जिव्ह कर, हम नेकों को इसी तरह नवाज़ा करते हैं। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने पीछे मुड़कर देखा तो झाड़ी के क़रीब एक मेंढा खड़ा है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए उस मेंढे को जिव्ह किया।

यह वह ‘कुरबानी’ है जो अल्लाह की वारगाह में ऐसी मक़बूल हुई कि यादगार के तौर पर हमेशा के लिए मिल्लते इब्राहीमी का शिआर क़रार पाई और आज ज़िलहिज्जा की दसवीं तारीख को तमाम इस्लामी दुनिया में यह ‘शिआर’ उसी तरह मनाया जाता है मगर इस पूरे वाक़िए से यह नहीं साबित हुआ कि इब्राहीम की औलाद में से ‘ज़बीह’ कौन है- इस्माईल या इस्हाक़ ? कुरआन ने अगरचे ‘जबीह’ का नाम लिया, मगर जिस तरह इस वाक़िए का तज्झिरा किया है, उससे बगैर किसी शक व शुबहे के यह ज़ाहिर होता है कि कुरआनी नस्स इस्माईल को जबीह बताती है और यही वाकिया और हक़ीक़त है। सूरः अस-साफ़्फ़ात की आयतें 100 से 113 में इस वाक़िए को बयान किया गया है।

काबा की बुनियाद

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अगरचे फ़लस्तीन में ठहरे थे, मगर बराबर मक्का में हाजरा और इस्माईल अलैहिस्सलाम को देखने आते रहते थे। इसी बीच इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अल्लाह का हुक्म हुआ कि ‘अल्लाह के काबे’ की तामीर करो। हजरत ने हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम से जिक्र किया और दोनों बाब-बेटों ने अल्लाह के घर की तामीर शुरू कर दी।

एक रिवायत के मुताबिक़ बैतुल्लाह की सबसे पहली बुनियाद हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के हाथों रखी गई और अल्लाह के फ़रिश्तों ने उनको वह जगह बता दी थी, जहां काबे की तामीर होनी थी, मगर हज़ारों साल के हादसों ने अर्सा हुआ उसको बे-निशान कर दिया था, अलबत्ता अब भी वह एक टीला या उभरी हुई ज़मीन की शक्ल में मौजूद था। यही वह जगह है, जिसको अल्लाह की वह्य ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बताया और उन्होंने इस्माईल अलैहिस्सलाम की मदद से उसको खोदना शुरू किया तो पिछली तामीर की बुनियादें नज़र आने लगीं। इन्हीं बुनियादों पर बैतुल्लाह की तामीर की गई, अलबत्ता कुरआन पाक में पिछली हालत का कोई तज्फ़िरा नहीं है।

दूसरी तरफ़ यह हक़ीक़त है कि इस तामीर से पहले तमाम कायनात और दुनिया के कोने-कोने में बुतों और सितारों की पूजा के लिए हैकल और मन्दिर मौजूद थे, पर इन सबके उलट सिर्फ़ एक ख़ुदा की परस्तिश और उसकी यकताई के इक़रार में सरे नियाज़ झुकाने के लिए दुनिया के बुतकदों में पहला घर जो ख़ुदा का घर कहलाया, वह यही बैतुल्लाह है।

तर्जुमा-बेशक सबसे पहला वह घर जो लोगों के लिए (खुदा की याद के लिए) बनाया गया, अलबत्ता वह है जो मक्का में है, वह है सर से पैर तक कित और दुनिया वालों के लिए हिदायतों (का सर चश्मा)।(आले इमरान 3-97)

इसी तामीर को यह शरफ़ हासिल है कि इब्राहीम-जैसा जलीलुल क़द्र पैग़म्बर उसका मेमार है और इस्माईल जैसा नबी व ज़बीह उसका मज़दूर, बाप-बेटे बराबर उसकी तामीर में लगे हुए हैं और जब उसकी दीवारें ऊपर उठती हैं और बुजुर्ग बाप का हाथ ऊपर तामीर करने से माजूर हो जाता है, तो कुदरत की हिदायत के मुताबिक़ एक पत्थर को बाड़ बनाया जाता है, जिसको इस्माईल अलैहिस्सलाम अपने हाथ से सहारा देते और इब्राहीम अलैहिस्सलाम उस पर तामीर करते जाते हैं।

यही वह यादगार है जो ‘मक़ामे इब्राहीम’ से जाना जाता है। जब तामीर इस हद पर पहुंची, जहां आज हजरे अस्वद नसब है तो जिब्रील अमीन ने उनकी रहनुमाई की और हजरे अस्वद को उनके सामने एक पहाड़ी से महफूज़ निकाल कर दिया, जिसको जन्नत का लाया हुआ पत्थर कहा जाता है, ताकि वह नसब कर दिया जाए।

अल्लाह का घर तामीर हो गया तो अल्लाह तआला ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बताया कि यह मिल्लते इब्राहीमी के लिए (क़िबला) और हमारे सामने झुकने का निशान है, इसलिए यह तौहीद का मर्कज़ क़रार दिया जाता है। तब इब्राहीम व इस्माईल अलैहिस्सलाम ने दुआ मांगी कि अल्लाह तआला उनको और उनकी जुर्रियत (आल औलाद) को नमाज़ और जक़ात क़ायम करने की हिदायत दे और इस्तिकमत बख़्शे और उनके लिए फलों, मेवों और रिज़्क़ में बरकत दे और दुनिया के कोने-कोने में बसने वाले गिरोह में से हिदायत पाए हुए गिरोह को इस तरफ़ मुतवज्जह करे कि वे दूर-दूर से आएं और हज के मनासिक अदा करें और हिदायत व रुश्द के इस मर्कज़ में जमा होकर अपनी जिंदगी की सआदतों से दामन भरें।

कुरआन अज़ीज़ ने बैतुल्लाह की तामीर, तामीर के वक़्त इब्राहीम व इस्माईल की मुनाजात, नमाज कायम करने और हज की रस्मों को अदा करने के लिए शौक़ व तमन्ना के इज़्हार और बैतुल्लाह के तौहीद का मर्कज़ होने के एलान का जगह-जगह जिक्र किया है और नए-नए उस्लूब और तर्जे अदा से उसकी अज़्मत और जलालत व जबरूत को सूरः आलेइमरान 3:79, अल-बक़रः 2 : 125’129 और अल-हज्ज 22: 26-33, 36: 37 में वाज़ेह फ़रमाया है।

हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद

तौरात के मुताबिक़ हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के बारह बेटे थे जो बारह सरदार कहलाए और अरब के मुस्तक़िल क़बीलों के जद्दे क़बीला बने और एक लड़की थी, जिसका नाम बश्शामा या महल्लात था। उनके बेटे नाबित की नस्ल अस्हाबुल-हिज्र कहलाई। (नाबितीन के आसार पट्टा (जॉर्डन) में मौजूद है) और क़ीदार की नस्ल अस्हाबुर्रस्स के नाम से मशहूर हुई।

कुरआन में हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम का तकिरा

हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम का ज़िक्र कुरआन मजीद में कई बार हुआ है। सूरः मरयम में उनके नाम के साथ उनके औसाफ़े जमीला का भी जिक्र किया गया है।

तर्जुमा-और याद कर किताब में इस्माईल का ज़िक्र था, वह वायदे का सच्चा था और था नबी और हुक्म करता था अपने अल को नमाज़ का और ज़कात का और था अपने परवरदिगार के नज़दीक पसन्दीदा ।(मरयम 19:54)

हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की वफ़ात

हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की उम्र जब एक सौ छत्तीस साल की हुई, तो उनका इंतिक़ाल हो गया, तौरात के मुताबिक़ हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की वफ़ात फ़लस्तीन में हुई और फ़लस्तीन ही में उनकी क़ब्र बनी। अरब तारीख के माहिरों के मुताबिक़ वह और उनकी वालिदा हाजरा बैतुल्लाह के क़रीब हरम के अन्दर दफ़न हैं।

यह वाक़िया क़ससुल अंबिया में बयान की गई मालूमात और कुरआन व हदीस में आए वाक़िआत की बुनियाद पर पेश किया गया है। इसमें कुछ तारीखी मालूमात भी शामिल हैं, इसलिए इसमें बयान की गई हर बात को कुरआन की आयत या सहीह हदीस का सीधा बयान न समझें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और जवाब

सवाल 1: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हज़रत हाजरा और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को मक्का की वीरान वादी में क्यों छोड़कर आए थे?
जवाब: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने यह काम अपनी मर्ज़ी से नहीं बल्कि अल्लाह तआला के हुक्म की पैरवी में किया था। हज़रत हाजरा ने जब पूछा कि क्या यह अल्लाह का हुक्म है, तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि हाँ। यह सुनकर उन्होंने अल्लाह पर पूरा भरोसा किया।

सवाल 2: हज़रत हाजरा ने मक्का की वादी में क्या किया?
जवाब: जब पानी खत्म हो गया और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम प्यास से परेशान होने लगे, तो हज़रत हाजरा पानी की तलाश में सफ़ा और मरवा के दरमियान सात मर्तबा दौड़ीं। इसी की याद में हज और उमरा में सफ़ा और मरवा की सई की जाती है।

सवाल 3: ज़मज़म का चश्मा कैसे जारी हुआ?
जवाब: सहीह बुख़ारी की रिवायत के मुताबिक़, जब हज़रत हाजरा पानी की तलाश में थीं, तो अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम के ज़रिए ज़मज़म का पानी जारी फ़रमाया। हज़रत हाजरा ने पानी को चारों तरफ़ जमा किया।

सवाल 4: ज़मज़म का पानी क्यों इतना मुबारक माना जाता है?
जवाब: ज़मज़म अल्लाह तआला की एक मुबारक नेमत है और हज़रत हाजरा व हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के वाक़िए से जुड़ा हुआ है। मुसलमान सदियों से इसे बरकत और ख़ैर का ज़रिया मानते आए हैं।

सवाल 5: बनी जुरहम कौन थे?
जवाब: बनी जुरहम एक अरब क़बीला था जो ज़मज़म के जारी होने के बाद उस इलाक़े में आया और हज़रत हाजरा की इजाज़त से वहां क़ियाम किया। बाद में हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने उनसे उनकी ज़बान सीखी।

सवाल 6: हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की शादी किस क़बीले में हुई थी?
जवाब: रिवायत में आता है कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने बनी जुरहम में शादी की थी। उनकी वालिदा हज़रत हाजरा का भी बाद में इंतिक़ाल हो गया।

सवाल 7: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने काबा की तामीर क्यों की?
जवाब: अल्लाह तआला के हुक्म से दोनों ने बैतुल्लाह की तामीर की। कुरआन मजीद में दोनों के इस अमल और उनकी दुआ का ज़िक्र सूरह अल-बक़रह में आया है।

सवाल 8: ज़बीह किसे कहा जाता है—हज़रत इस्माईल या हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम?
जवाब: अहले-सुन्नत के मशहूर और राजेह क़ौल के मुताबिक़ ज़बीह हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम थे। कुरआन मजीद में सूरह अस-साफ़्फ़ात में कुर्बानी का वाक़िया बयान हुआ है।

सवाल 9: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बेटे की कुर्बानी का हुक्म कैसे मालूम हुआ?
जवाब: अंबिया अलैहिमुस्सलाम के ख़्वाब वह्य के दर्जे में होते हैं। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ख़्वाब में अपने बेटे की कुर्बानी का इशारा पाया और अल्लाह के हुक्म के सामने सर-ए-तस्लीम ख़म कर दिया।

सवाल 10: कुर्बानी के वक़्त क्या हुआ?
जवाब: जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह के हुक्म की तामील के लिए तैयार हो गए, तो अल्लाह तआला ने उनकी आज़माइश को कामयाब करार दिया और बेटे के बदले एक अज़ीम कुर्बानी अता फ़रमाई।

सवाल 11: हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की सबसे बड़ी खूबियों में से एक क्या थी?
जवाब: हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम सब्र, वफ़ादारी और अल्लाह के हुक्म के सामने सर झुकाने वाले नबी थे। कुरआन मजीद में उन्हें सच्चे वादे वाला और नबी बताया गया है।

सवाल 12: हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल अलैहिमस्सलाम के वाक़िए से हमें क्या सबक मिलता है?
जवाब: इस वाक़िए से हमें सब्र, तवक्कुल, कुर्बानी और अल्लाह के हुक्म की पैरवी का सबक मिलता है। जब बंदा मुश्किल हालात में भी अल्लाह पर भरोसा रखता है, तो अल्लाह उसके लिए ऐसी राह निकाल देता है जिसका उसे गुमान भी नहीं होता।

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।

जज़ाकल्लाह खैर….

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