हज़रत अब्दुल्ला बिन मस्ऊद (र.अ)रिवायत करते हैं कि आंहज़रत (स.व)ने इर्शाद फ़रमाया कि मेरी जिंदगी तुम्हारे लिए बेहतर है और मेरी वफ़ात तुम्हारे लिए बेहतर है, तुम्हारे आमाल मुझपर पेश होंगे।
पस जो भलाई तुम्हारी तरफ़ बेहतर से पेश की जाएगी, जिसे मैं देखूंगा तो उसपर अल्लाह की तारीफ करूंगा और जो कोई बुराई देखूंगा जो तुम्हारी तरफ से पेश की जाएंगी तो तुम्हारे लिए अल्लाह तआला से मग्फ़िरत की दुआ करूंगा। Anhazrat(s.w) par ummat ke Amal pesh kiye jate hai.
रौज़ा-ए-मुत्तहहरा के पास दरूद व सलाम पढ़ा जाए तो आँहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुद सुनते हैं और जो कोई दूर से दरूद व सलाम भेजे, उसको फरिश्ते पहुंचा देते हैं
हज़रत अबू हुरैरा (र.अ)से रिवायत है कि आँहज़रत सैयदे आलम(स.व)ने फ़रमाया कि जो कोई मुझपर मेरी कब्र के पास पढ़ेगा, मैं उसको सुनूंगा और जो कोई मुझ पर दूर से दरूद भेजे, वह दरूद मुझे पहुंचा दिया जाता है।’
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद(र.अ)से रिवायत है कि आंहज़रत (स.व)ने फ़रमाया कि बिला शुब्हा अल्लाह के बहुत से फरिश्ते हैं जो ज़मीन में गश्त लगाते फिरते हैं और मेरी उम्मत का सलाम मेरे पास पहुंचाते हैं।’ Anhazrat(s.w) par ummat ke Amal pesh kiye jate hai.
दुनिया में कायदा है कि मौजूद लोग आपस में एक दूसरे को सलाम करते हैं और जो दूर होते हैं, उनको डाक से या आदमी की ज़रिए सलाम भेजते हैं। अल्लाह तआला ने अपनी कामिल रहमत से यह सिलसिला जारी रखा है कि जो मुसलमान अपने नबी पर दूर से सलाम भेजे, तो उसको फरिश्तों के ज़रिए पहुंचा देते हैं।
इन हदीसों से जहां यह मालूम होता है कि आँहज़रत को बर्ज़ख़ी ज़िंदगी में भी अपनी उम्मत से तअल्लुक बाकी है और यह कि अल्लाह तआला ने इस उम्मत को यह शर्फ (बुजुर्गी, बुलन्दी) बख़्शा है कि फरिश्ते को इस काम के लिए मुर्कार फरमाया है कि उम्मतियों का सलाम फखरे कायनात मुहम्मद(स.व)को पहुंचा दें।
वहां यह भी मालूम हुआ कि गोया हज़रात अंबिया-ए-किराम ज़िंदा हैं, लेकिन खुदा की पनाह! हर जगह न हाज़िर हैं, न सब कुछ देख रहे हैं. और न दूर की बात को सुनते हैं। जब नबियों (अलैहिमुस्सलाम) के बारे में यह साबित है कि हर जगह न हाज़िर हैं, Anhazrat(s.w) par ummat ke Amal pesh kiye jate hai.
न देख सकते हैं और न हर आवाज़ सुनने वाले हैं तो उन औलिया-अल्लाह के बारे में ऐसा ख़्याल करना तो बिल्कुल ही ग़लत होगा, जो अल्लाह के चुने हुए बुजुर्ग- पैग़म्बरों के सहाबियों (साथियों) से भी कम दर्जे के हैं।
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क्या पता अल्लाह तआला को हमारी ये अदा पसंद आ जाए और जन्नत में जाने वालों में शुमार कर दे। अल्लाह तआला हमें इल्म सीखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की तौफीक अता फरमाए ।आमीन।
खुदा हाफिज…
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