Bade Ko Badhai Do
हर मुसलमान के लिए बड़ों का अदब और बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करना इस्लामी तालीमात का एक खूबसूरत हिस्सा है। हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने हमें सिर्फ़ इबादत का तरीका ही नहीं सिखाया, बल्कि लोगों से किस तरह गुफ़्तगू करनी है और किसे आगे रखना है, यह भी सिखाया।
कई बार हम छोटी-छोटी बातों में अदब का लिहाज़ भूल जाते हैं और उम्र में बड़े शख्स के सामने खुद ही बात शुरू कर देते हैं। जबकि इस्लामी अदब हमें सिखाता है कि अगर हमारे साथ कोई बड़ा मौजूद हो तो उसका एहतराम किया जाए और उसे आगे बोलने का मौक़ा दिया जाए।
इस छोटे से लेकिन बेहद प्यारे वाक़िए में हुज़ूर ﷺ ने “बड़े को बड़ाई दो” कहकर हमें एक ऐसा सबक दिया, जो आज के दौर में हमारे घरों, रिश्तों और समाज के लिए बहुत ज़रूरी है।
आइए जानते हैं कि बड़ों का अदब क्यों किया जाना चाहिए और इस्लाम हमें बुज़ुर्गों के साथ कैसा सुलूक करने की तालीम देता है।
बड़े को बड़ाई देना इस्लामी अदब है
हदीस शरीफ में आता है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में ख़ैबर, जो यहूदियों की बस्ती थी, वहां पर एक मुसलमान को यहूदियों ने कत्ल कर दिया, जिन साहिब को कत्ल किया गया था उनके एक भाई थे, जो उस कत्ल होने वाले आदमी के वली थे, वारिस थे।
वह भाई अपने चचा को लेकर हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास यह बताने आये कि हमारा भाई कत्ल कर दिया गया, अब उसके बदला लेने का क्या तरीका होना चाहिए। चूंकि यह भाई थे, यह रिश्ते के एतिबार से कत्ल होने वाले शख़्स के ज़्यादा क़रीबी थे, और दूसरे चचा थे।
ये दोनों हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में पहुंचे और कत्ल होने वाले के भाई ने हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बात करनी शुरू कर दी और चचा खामोश बैठे थे, तो उस वक़्त हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़त्ल होने वाले के भाई से फरमाया किः “बड़े को बड़ाई दो” यानी जब एक बड़ा तुम्हारे साथ मौजूद है तो फिर तुम्हें गुफ़्तगू की शुरूआत न करनी चाहिये,
बल्कि तुम्हें अपने चचा को कहना चाहिये कि गुफ़्तगू की शुरूआत करें, फिर जब ज़रूरत हो तो तुम भी दरमियान में गुफ़्तगू कर लेना, लेकिन बड़े को बड़ाई दो, यह भी इस्लामी आदाब का एक तक़ाज़ा है कि जो उम्र में बड़ा हो उसको आगे किया जाये, अगरचे उसको दूसरी कोई फ़ज़ीलत हासिल नहीं है, सिर्फ बड़ी उम्र होने की फज़ीलत हासिल है, तो उसका भी अदब और लिहाज़ किया जाये और उसको आगे रखा जाये, न कि छोटा आगे बढ़ने की कोशिश करे।
इसी लिये आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन नौजवानों से फरमाया कि जब नमाज़ का वक़्त आ जाये तो तुम में से जो उम्र में बड़ा हो, उसको इमाम बना दो, इसलिये कि इमामत का मन्सब (ओहदा) ऐसे आदमी को देना चाहिये जो सब में इल्म के एतिबार से बढ़ा हुआ हो, या कम से कम उम्र के एतिबार से ज़्यादा हो। अल्लाह तआला हमें इन बातों पर अमल करने की हिम्मत और तौफीक अता फरमाये, आमीन।
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FAQ – बड़े को बड़ाई देना और बड़ों का अदब
सवाल 1: इस्लाम में बड़ों का अदब करना क्यों ज़रूरी है?
जवाब: इस्लाम हमें हर इंसान के साथ अच्छे अख़लाक़ और अदब से पेश आने की तालीम देता है। उम्र में बड़े शख्स का एहतराम करना भी इसी इस्लामी अदब का हिस्सा है।Bade Ko Badhai Do
सवाल 2: “बड़े को बड़ाई दो” का क्या मतलब है?
जवाब: इसका मतलब है कि जब किसी महफ़िल या बातचीत में उम्र में बड़ा शख्स मौजूद हो तो उसका लिहाज़ किया जाए और उसे पहले गुफ़्तगू करने का मौक़ा दिया जाए।Bade Ko Badhai Do
सवाल 3: क्या सिर्फ़ उम्र में बड़ा होने की वजह से भी अदब करना चाहिए?
जवाब: जी हाँ, उम्र में बड़ा होना भी एहतराम का एक सबब है। हालांकि इल्म, तक़वा और दूसरी फ़ज़ीलतों का भी अपना मक़ाम है।Bade Ko Badhai Do
सवाल 4: क्या छोटा व्यक्ति बड़े के सामने अपनी बात नहीं रख सकता?
जवाब: ऐसा नहीं है। छोटा अपनी ज़रूरत या बात ज़रूर रख सकता है, लेकिन अदब और लिहाज़ के साथ। बेहतर यह है कि बड़े को पहले गुफ़्तगू का मौक़ा दिया जाए, फिर ज़रूरत के मुताबिक़ छोटा अपनी बात करे।Bade Ko Badhai Do
सवाल 5: क्या बड़ों का अदब सिर्फ़ घर के बुज़ुर्गों तक सीमित है?
जवाब: नहीं। माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और रिश्तेदारों के साथ-साथ उम्र में बड़े मुसलमानों और बुज़ुर्गों के साथ भी अदब और नरमी से पेश आना चाहिए।Bade Ko Badhai Do
सवाल 6: क्या बच्चों को बचपन से बड़ों का अदब सिखाना चाहिए?
जवाब: बिल्कुल। बच्चों को सलाम करना, बड़े की बात ध्यान से सुनना, बीच में बात न काटना और सम्मान से जवाब देना सिखाना चाहिए। यह उनके अख़लाक़ को बेहतर बनाता है।Bade Ko Badhai Do
सवाल 7: क्या बड़ों का अदब करने का मतलब हर बात में उनकी हामी भरना है?
जवाब: नहीं। अदब का मतलब यह नहीं कि गलत बात को सही माना जाए। अगर किसी बात से इख़्तिलाफ़ हो तो भी नरमी, तहज़ीब और अच्छे अंदाज़ में अपनी बात रखी जा सकती है।Bade Ko Badhai Do
सवाल 8: इस वाक़िए से हमें सबसे बड़ा सबक क्या मिलता है?
जवाब: सबसे बड़ा सबक यह है कि इल्म और इबादत के साथ अच्छा अदब और अच्छे अख़लाक़ भी बहुत ज़रूरी हैं। हमें अपनी ज़िंदगी में बड़ों का एहतराम और छोटों से मुहब्बत का रवैया अपनाना चाहिए।Bade Ko Badhai Do
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Bade Ko Badhai Do
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Bade Ko Badhai Do
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Bade Ko Badhai Do
जज़ाकल्लाह खैर….
