Qaum-e-Aad Ka Khaufnaak Anjaam
क़ौम-ए-आद का ज़िक्र कुरआन मजीद में कई जगह मिलता है। यह एक ऐसी ताक़तवर क़ौम थी जिसे अपनी शारीरिक ताक़त, दौलत और शानो-शौकत पर बहुत घमंड था। अल्लाह तआला ने उनकी हिदायत के लिए हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को भेजा, जिन्होंने उन्हें सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करने और घमंड व सरकशी छोड़ने की नसीहत दी।
लेकिन जब क़ौम-ए-आद ने बार-बार हक़ को ठुकराया और अपनी सरकशी पर कायम रही, तो उनका अंजाम बेहद इबरतनाक हुआ। इस लेख में हम जानेंगे कि क़ौम-ए-आद कौन थी, हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने उन्हें क्या समझाया और आखिर उनके घमंड और नाफ़रमानी का क्या अंजाम हुआ। यह वाकिया आज हमारे लिए भी बहुत बड़ी नसीहत रखता है।
आद का ज़माना
आद का ज़माना लगभग दो हज़ार साल कब्ल मसीह माना जाता है और कुरआन मजीद में आद को ‘मिम बादि नूह’ कहकर नूह क़ौम के खलीफ़ों में गिना गया है, साथ ही उनको आदे ऊला कहा है और आद के साथ इरम का लफ़्ज़ लगा हुआ है।
आद के रहने की जगह
आदे का मर्कज़ी मक़ाम अरजे अहक़ांफ है। यह हज़र मौत के उत्तर में इस तरह वाक़े है कि इसके पूरब में ओमान और उत्तर में राबेअ अल-ख़ाली। मगर आज यहां रेत के टीलों के सिवा कुछ नहीं है।
आद का मज़हब
आद बुत-परस्त थे और अपने पेशे और नूह की क़ौम की तरह सनमपरस्ती और बुततराशी में माहिर थे। हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से एक असर मंकूल है। इसमें है कि इनके एक सनम का नाम समूद और एक का नाम हतार था।
हज़रत हूद अलैहिस्सलाम
आद अपनी ममलक्त की सतवत व जबरूत, जिस्मानी सूरत व गुरूर में ऐसे चमके कि उन्होंने एक अल्लाह को बिल्कुल भुला दिया और अपने हाथों के बनाए हुए बुतों को अपना माबूद मानकर हर क़िस्म के शैतानी आमाल ब-ख़ौफ़ व ख़तर करने लगे, तब अल्लाह तआला ने उन्हीं में से एक पैग़म्बर हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को भेजा। हज़रत हूद अलैहिस्सलाम आद की सबसे ज़्यादा इज़्ज़तदार शाखा ‘खुलूद’ के एक फ़र्द थे। सुर्ख व सफ़ेद रंग और बहुत खुबसूरत थे। उनकी दाढ़ी बड़ी थी।
इस्लाम की तब्लीग
उन्होंने अपनी क़ौम को अल्लाह की तौहीद और उसकी इबादत की तरफ़ दावत दी और लोगों पर जुल्म व जौर करने से मना फ़रमाया। मगर आद ने एक न मानी। उनको सख़्ती के साथ झुठलाया और गुरूर और घमंड के साथ कहने लगे, ‘मन अशद्दु मिन्ना कुव्वः’ (हम में से ज़्यादा कौन है कुव्वत में आगे)(हामीम सज्दा 41)
आज दुनिया में हम से ज़्यादा शौकत व जबरूत का कौन मालिक है? मगर हज़रत हूद अलैहिस्सलाम लगातार इस्लाम की तब्लीग़ में लगे रहे। वह अपनी क़ौम को अल्लाह के अज़ाब से डराते और गुरूर व सरकशी के नतीजों को बताकर नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम के वाक़िए याद दिलाते और कभी इर्शाद फ़रमाते –
‘ऐ क़ौम ! अपनी जिस्मानी ताक़त और हुकूमत के ज़बरदस्त होने पर घमण्ड न कर, बल्कि अल्लाह का शुक्र अदा कर कि उसने तुझको यह दौलत बख़्शी। नूह क़ौम की तबाही के बाद ज़मीन का तुझको मालिक बनाया, खुशऐशी, फ़ारिगुलब, ली और ख़ुशहाली अता की, इसलिए उसकी नेमतों को न भूल और खुद के गढ़े हुए बुतों की परस्तिश से बाज़ आ, जो न नफ़ा पहुंचा सकते हैं और न दुख दे सकते हैं।
मौत व जिंदगी, नफ़ा-नुक़्सान सब एक अल्लाह ही के हाथ में है। ऐ क़ौम के लोगो! माना कि तुम सरकशी और उसकी नाफ़रमानी में मुब्तला रहे हो, मगर आज भी अंगर तौबा कर लो और बाज़ आ जाओ तो उसकी रहमत फैली हुई है और तौबा का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ है। उससे मग्फ़िरत चाहो, वह बख़्श देगा। उसकी तरफ़ रुजू हो जाओ, वह माफ़ कर देगा और माल व इज़्ज़त में सरफ़राज़ी बख़्शेगा।
आद को हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की ये नसीहतें बहुत गरां गुज़रती थीं और वे यह नहीं सह सकते थे कि उनके ख्यालों, उनके अक़ीदों और उनके कामों, ग़रज़ यह कि उनके इरादों में कोई आदमी रुकावट पैदा करे, उनके लिए मेहरबान नसीहत करने वाला बने, इसलिए अब उन्होंने यह रवैया अपनाया कि हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का मज़ाक उड़ाया, उनको बेवकूफ़ समझा और उनकी मासूमियत भरी हक़ वाली सच्चाइयों की तमाम यक़ीनी दलीलों और मिसालों को झुठलाना शुरू कर दिया और कहने लगे-
तर्जुमा – ‘ऐ हूद! तू हमारे पास एक दलील भी न लाया और तेरे कहने से हम अपने खुदाओं को छोड़ने वाले नहीं और न हम तुझ पर ईमान लाने वाले है।'(हूद 11 : 35)
‘और हम इस ढोंग में आने वाले नहीं कि तुझको ख़ुदा का रसूल मान लें और अपने ख़ुदाओं की इबादत छोड़कर यह यक़ीन कर लें कि वे ‘बड़े खुदा’ के सामने हमारे सिफ़ारिशी नहीं होंगे।’
हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि न मैं बेवकूफ़ हूं और न पागल, बिला शुब्हा अल्लाह का रसूल और पैग़म्बर हूं। अल्लाह अपने बन्दों की हिदायत के लिए बेवकूफ़ को मुंतख़ब नहीं किया करता कि उसका नुक़्सान उसके नफ़ा से बढ़ जाए और हिदायत की जगह गुमराही आ जाए। वह इस ज़ोरदार ख़िदमत के लिए अपने बन्दों में से ऐसे आदमी को चुनता है जो हर तरह से उसका अल हो और हक़ की असल ख़िदमत को ख़ुशी के साथ अंजाम दे सके।
तर्जुमा – ‘और अल्लाह खूब जानने वाला है कि रिसालत के अपने मंसब को किस जगह रखे।’ (अल-अनआम 6 : 124)
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मगर क़ौम की सरकशी और मुखालफ़त बढ़ती रही और उनपर सूरज से ज़्यादा रोशन दलीलों और नसीहतों का जरा भी असर न पड़ा और हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को जलील करने और झुठलाने पर और ज़्यादा उतर आए और (अल-अयाज़बिल्लाह) मजनून और ख़ब्ती कहकर और ज़्यादा मज़ाक़ उड़ाने लगे और कहने लगे, ऐ हूद !
जबसे तूने हमारे बुतों को बुरा कहना और हमको उनकी इबादत न करने पर उभारना शुरू किया है, हम देखते हैं कि उस वक़्त से तेरा हाल ख़राब हो गया है और हमारे ख़ुदाओं की बद-दुआ से तू पागल और मजनून हो गया है, तो अब हम इसके अलावा तुझको और क्या समझें?
उनकी इस गुस्ताख़ी भरी जुर्रात और हिम्मत से यह ख़्याल हो चला था कि अब कोई आदमी हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की तरफ़ ध्यान न देगा और उनकी बातों को तवज्जोह से न सुनेगा।
हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने यह सब कुछ निहायत सब्र व ज़ब्त से सुना, फिर उनसे यूं बोले- ‘मैं अल्लाह को और तुम सबको गवाह बनाकर सबसे पहले यह एलान करता हूं कि मैं इस अक़ीदे से बिल्कुल अलग हूं कि इन बुतों में न यह कुदरत है कि मुझको या किसी को किसी क़िस्म की भी कोई बुराई पहुंचा सकते हैं, इसके बाद तुमको और तुम्हारे इन झूठे माबूदों को चैलेंज करता हूं कि अगर इनमें ऐसी कुदरत है तो वे मुझको नुक्सान पहुंचाने में जल्दी से कोई क़दम उठाएं।
मैं अपने अल्लाह के फ़ज़्ल व करम से अक़्ल रखने वाला और सूझ-बूझ रखने वाला हूं। सोचने-समझने का मालिक हूं और हिक्मत और दानाई का हामिल, मैं तो सिर्फ़ अपने अल्लाह पर ही भरोसा करता हूं, और उसी पर पूरा यक़ीन रखता हूं जिसके कब्ज़े व कुदरत में कायनात के तमाम जानदारों की पेशानियां हैं, जो ज़िंदगी और मौत का मालिक है। वह ज़रूर मेरी मदद करेगा और हर नुक़्सान पहुंचाने वाले के नुक़सान से बचाए रखेगा।
आख़िर हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने उसकी लगातार बग़ावत और सरकशी के ख़िलाफ़ यह ऐलान कर दिया कि अगर आद का यही रवैया रहा और हक़ से पलटने और मुंह फेरने की रविश में उन्होंने कोई तब्दीली न की और मेरी नसीहतों को पूरे दिल से न सुना, तो मैं अगरचे अपनी डाली ज़िम्मेदारियों के लिए हर वक़्त चुस्त और हिम्मत रखने वाला हूं, मगर उनके लिए हलाकत यक़ीनी है।
अल्लाह बहुत जल्द उनको हलाक कर देगा और दूसरी क़ौम को ज़मीन का मालिक बनाकर उनकी जगह क़ायम कर देगा और बिला शुब्हा वे अल्लाह तआला को ज़र्रा बराबर भी नुक़सान नहीं पहुंचा सकते वह तो हर चीज़ पर कुदरत रखने वाला और हर चीज़ की हिफ़ाज़त करने वाला और निगहबान है। और पूरी कायनात उसकी कुदरत की मुट्ठी में है।
की ऐ क़ौम ! अब भी समझ और अक़्ल व होश से काम ले नूह क़ौम के हालात से इबरत हासिल कर और अल्लाह के पैग़ाम के सामने सरे नियाज़ झुका दे वरना क़ज़ा व क़द्र का हाथ ज़ाहिर हो चुका है और बहुत क़रीब है वह ज़माना कि तेरा यह सारा गुरूर व घमंड खाक में मिल जाएगा और उस वक़्त शर्मिंदगी से भी कोई फ़ायदा न होगा।
हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने बार-बार उनको भी यह बावर कराया कि मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं, दोस्त हूं। तुमसे सोना-चांदी और तख़्त व ताज की तलब नहीं करता हूं, बल्कि तुम्हारी फ़लाह व नजात चाहता हूं। मैं अल्लाह तआला के पैग़ाम के बारे में खियानत करने वाला नहीं बल्कि अमीन हूं। वही करता हूं जो मुझसे कहा जाता है। जो कुछ कहता हूँ क़ौम की सआदत और हाल व माल की भलाई के लिए कहता हूं, बल्कि दायमी व सरमदी नजात के लिए कहता हूं।
तुमको अपनी ही क़ौम के एक इंसान पर अल्लाह के पैग़ाम नाज़िल होने से अचम्भा नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह पुराने जमाने से अल्लाह की जारी व सारी सुन्नत है कि इंसानों की हिदायत व सआदत के लिए उन्हीं में से एक आदमी को चुन लेता और अपना रसूल बना कर उसको ख़िताब करता है और अपनी मर्जी और नामर्जी से उसकी मारफ़त अपने बन्दों को मुत्तला करता रहता है और फ़ितरत का तक़ाजा भी तो यही है कि किसी क़ौम की रुश्द व हिदायत के लिए ऐसे आदमी ही को चुना जाए, जो बोल-चाल में उन्हीं की तरह हो, उनके अख़लाक़ और आदतों का जानकार हो, उनकी खुसूसी बातों से आश्ना और उन्हीं के साथ जिंदगी गुज़ारता रहा हो कि उसी से क़ौम मानूस हो सकती है और वही उसका सही हादी व मुश्फ़िक़ बन सकता है।
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आद ने जब यह सुना तो वे अजीब हैरत में पड़ गए। उनकी समझ में न आया कि एक अल्लाह की इबादत का मतलब क्या है? वे ग़म व गुस्सा में आ गए कि किस तरह हम बाप-दादा की ‘अस्नाम परस्ती’ (मूर्तिपूजा) को छोड़ दें? यह तो हमारी और हमारे बाप दाद की सख़्त तौहीन है। उनका ग़ैज़ व ग़जब भड़क उठा कि उनको काफ़िर और मुश्शिक क्यों कहा जाता है?
जबकि वे बुतों को अल्लाह के समान अपनी शफ़ाअत करने वाला मानते हैं? उनके नज़दीक हूद अलैहिस्सलाम की बात मान लेने में उनके माबूदों और बुजुर्गों की तौहीन थी और उन्हें हक़ीर समझा जा रहा था, जिनको वह बड़े ख़ुदा के दरबार में अपना वसीला और शफ़ी मानते थे और इसी को इन तस्वीरों और मूर्तियों के लिए पूजते थे कि वे खुश होकर हमारी सिफ़ारिश करेंगे और अल्लाह के अज़ाब से नजात दिलाएंगे।
आख़िर वे शोले की तरह भड़क उठे और हज़रत हूद अलैहिस्सलाम से बिगड़ कर कहने लगे, तूने हमको अपने ख़ुदा के अज़ाब की धमकी दी और हमको उससे यह कहकर डराया कि-
तर्जुमा – ‘मै तुम्हारे ऊपर बड़े दिन के अजाब के आने से डरता हूं कि कहीं तुम उसके हक़दार न ठहर जाओ।’
(अश-शोअरा 26: 135)
तो ऐ हूद ! अब हमसे तेरी रोज-रोज की नसीहतें सुनी नहीं जातीं। हम ऐसी नसीहत करने वाले मेहरबान से बाज आए, अगर तू वाक़ई अपने क़ौल में सच्चा है तो वह अज़ाब जल्द ले आ कि हमारा-तेरा क़िस्सा साफ हो।
तर्जुमा – ‘पस ला तू हमारे पास उस चीज़ को, जिसका तू हमसे वायदा करता है, अगर तू वाक़ई सच्चों में से है।’
(अल-आराफ़ 7 : 70)
हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया कि अगर मेरे ख़ुलूस और मेरी सच्चाई वाली नसीहतों का यही जवाब है तो ‘बिस्मिल्लाह’ और तुमको अज़ाब का अगर इतना की शौक़ है, तो वह भी कुछ दूर नहीं।
तर्जुमा-‘बिला शुबहा तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम पर अज़ाब व ग़ज़ब आ पहुंचा।(अल-आराफ़ 7 : 71)
तुमको शर्म नहीं आती कि तुम खुद अपने गढ़े हुए बुतों को उनके नाम गढ़ कर पुकारते हो और तुम्हारे बाप-दादा उनको अल्लाह की दी हुई दलील के बगैर मनगढ़त तरीक़े पर उनको अपना शफ़ीअ और सिफ़ारिशी मानते हैं और तुम मेरी रोशन दलीलों से मुंह फेर कर और सरकशी करके अज़ाब के तलबगार होते हो, अगर ऐसा शौक़ है तो अब तुम भी इन्तिज़ार करो और मैं भी इंतिज़ार करता हूं कि वक़्त क़रीब आ पहुंचा।
तर्जुमा- ‘क्या तुम मुझसे उन मनगढ़त नामों (बुतों) के बारे में झगड़ते हो, जिनको तुमने और तुम्हारे बाप-दादों ने गढ़ लिया है कि जिसके बारे में तुम्हारे पास ख़ुदा की कोई हुज्जत नहीं। पस अब तुम अल्लाह के अज़ाब का इन्तिज़ार करो। मैं भी तुम्हारे साथ इन्तिज़ार करता हूं। (अल-आराफ़ 7 : 71)
हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम पर अज़ाब
हासिल यह कि हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम (आद) इंतिहाई शरारत व बग़ावत और अपने पैग़म्बर की तालीम से बेपनाह बुग्ज़ और दुश्मनी की वजह से अमल के बदले और जज़ा के क़ानून का वक़्त आ पहुंचा और ग़ैरते हक़ हरकत में आई और अल्लाह के अज़ाब ने सबसे ख़ुश्कसाली की शक्ल अख्तियार की। आद सख़्त घबराए हुए परेशान हुए और तंग दिखाई पड़ने लगे, तो हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को हमदर्दी के जोश ने उकसाया और मायूसी के बाद फिर उनको एक बार समझाया कि हक़ का रास्ता आख़्तियार कर लो, मेरी नसीहतों पर ईमान ले आओ, यही निजात की राह है दुनिया में भी और आख़िरत में भी, वरना पछताओगे।
लेकिन बदबख़्त व बदनसीब क़ौम पर कोई असर न हुआ बल्कि दुश्मनी कई गुना ज़्यादा बढ़ गई, तब हौलानाक अज़ाब ने उन को आ घेरा। आठ दिन और सात रातें बराबर तेज़ व तुंद हवा के तूफ़ान उठे और उनको और उनकी आबादी को तह व बाला करके रख दिया। तनोमंद और हैकल इंसान जो अपनी जिस्मानी ताक़तों के घमंड में सरमस्त और सरकश बने हुए थे, इस तरह बेहिस व हरकत पड़े नज़र आते थे, जिस तरह आंधी से भारी-भरकम पेड़ बेजान होकर गिरता है।
ग़रज़ उनकी हस्ती को नेस्त व नाबूद कर दिया गया, ताकि आने वाली नस्लों के लिए इबरत बनें और दुनिया और आख़िरत की लानत और अज़ाब उन पर मुसल्लत कर दिया गया कि वे उसी के हक़दार थे। हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और उनके मुख़्लिस इस्लाम को मानने वाले साथी अल्लाह की रहमत और नेमत में अल्लाह के अज़ाब से महफूज़ रहे और सरकश क़ौम की सरकशी और बग़ावत से बचे रहे।
यह है आदे ऊला की वह दास्तान जो अपने अन्दर इबरत के सामान रखती है। इसमें अनगिनत नसीहतें पाई जाती हैं और अल्लाह तआला के हुक्मों की तामील और तक़्वा व तहारत की ज़िदंगी की तरफ़ दावत देती है। शरारत, सरकशी और अल्लाह के हुक्मों से बग़ावत के बुरे अंजाम से आगाह करती और वक़्ती ख़ुशऐशी पर घमंड करके नतीजे की बदबख़्ती पर मज़ाक़ उड़ाने से डराती और बाज़ रखती है।
हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की वफ़ात
हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से एक असर नक़ल किया जाता हैं कि उनकी क़ब्र हज़र मौत में कसीफ़े अहमर (लाल टीला) पर है और उसके सरहाने झाऊ का पेड़ खड़ा है। दूसरी रिवायतों के मुक़ाबले में यही रिवायत सही और माकूल मालूम होती है कि आद की बस्तियां हज़र मौत के क़रीब थीं और उनकी (आद की) तबाही के बाद क़रीब ही की बस्तियों में हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने क़ियाम फ़रमाया होगा और वहीं वफ़ात हो गई होगी।
कुछ इबरतें
अल्लाह के नेक बन्दे जब किसी का भला चाहते और टेढ़ों की टेढ़ को सीधा करने के लिए नसीहत फ़रमाते, तो बुरों और ज़लीलों की कमीनगी, मज़ाक़ उड़ाने, फब्ती कसने, छोटा बनाए रखने की परवाह नहीं करते। दुखी और रंजीदा होकर या नाराज़ होकर भला चाहने और नसीहत करने को नहीं छोड़ते और इन तमाम ख़ुसूसियतों में नुमायां बात यह होती है कि वे अपनी इसी नसीहत और भला चाहने के लिए क़ौम से किसीं नफ़ा की उम्मीद या ख्वाहिश जरा-सी नहीं रखते। उनकी ज़िंदगी बदला और एवज़ से पूरी तरह बुलन्द और बरतर होती है।
अपने इस्लाह चाहने वालों और नबियों और सच्चों के ख़िलाफ़ क़ौमों की वैर और दुश्मनी इसी एक अक़ीदे पर टिक रही है कि हमारे बाप-दादा की रीति व रस्म और उनकी ख़ुद की गढ़ी हुई मूर्तियों के ख़िलाफ़ क्यों कुछ कहा जाता है? ये बातें क़ौमों की ज़िंदगी के लिए हमेशा तबाही मचाने वाली और उनकी फ़लाह व अबदी सआदत के लिए हलाक करने वाली हैं।
तब्लीग व हक़ के पैग़ाम के रास्ते में बदी का बदला नेकी से दिया जाए और कडुवाहट का जवाब मीठे बोल से पूरा किया जाए। (अलबत्ता तब्लीग करने वाले) अपनी बदकिरदारी और लगातार सरकशी पर अल्लाह तआला के बनाए हुए क़ानून ‘जज़ा-ए-अमल’ या ‘पादाशे अमल’ को ज़रूर याद दिलाएं और आने वाले बुरे अंजाम पर यक़ीनन तंबीह करें और यह सच्चाई बार-बार सामने लाएं कि जब कोई क़ौम इज्तिमाई सरकशी, जुल्म और बग़ावत पर तैयार हो जाती है और उस पर बराबर इसरार करती रहती है, तो फिर अल्लाह तआला का क़ह्न व ग़ज़ब उसको सफ्हा-ए-आलम से मिटा देता है और उसकी जगह दूसरी क़ौम ले लेती है।
हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और आद क़ौम का ज़िक्र कुरआन में सूरः आराफ़, हूद और शुअरा में आया है जबकि आद क़ौम का ज़िक्र आराफ़, हूद, मोमिनून, शुअरा, फुस्स्लित, अहक़ाफ़, अज्ज़ारियात, अल-क़मर और अल-हाक़्क़ा में हुआ है।
FAQ – क़ौम-ए-आद और हज़रत हूद अलैहिस्सलाम
1. क़ौम-ए-आद कौन थी?
क़ौम-ए-आद एक पुरानी क़ौम थी जिसका ज़िक्र क़ुरआन मजीद में कई जगह आया है। यह क़ौम अपनी ताक़त और शानो-शौकत पर बहुत घमंड करती थी।
2. क़ौम-ए-आद के पैग़म्बर कौन थे?
अल्लाह तआला ने उनकी हिदायत के लिए हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर बनाकर भेजा था।
3. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने क़ौम-ए-आद को क्या दावत दी?
उन्होंने अपनी क़ौम को सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करने, बुतपरस्ती छोड़ने और नाफ़रमानी से बचने की दावत दी।
4. क़ौम-ए-आद ने हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की बात क्यों नहीं मानी?
उनके अंदर घमंड और सरकशी बहुत बढ़ गई थी। उन्होंने अपनी ताक़त पर भरोसा किया और हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की नसीहत को ठुकरा दिया।
5. क़ौम-ए-आद पर किस तरह का अज़ाब आया?
क़ुरआन में उनके ऊपर आने वाली तेज़ और लगातार चलने वाली हवा का ज़िक्र मिलता है, जिसने उन्हें तबाह कर दिया।
6. क़ौम-ए-आद का अंजाम क्या हुआ?
उनकी सरकशी और नाफ़रमानी के कारण वे अल्लाह के अज़ाब का शिकार हुए, जबकि हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और ईमान लाने वाले लोग अल्लाह की रहमत से बचा लिए गए।
7. क़ौम-ए-आद के वाकिए से हमें क्या सीख मिलती है?
इस वाकिए से हमें घमंड, नाफ़रमानी और हक़ को ठुकराने से बचने की सीख मिलती है। इंसान को अपनी ताक़त और दौलत पर घमंड करने के बजाय अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए।
8. क़ुरआन में क़ौम-ए-आद का ज़िक्र कहाँ आया है?
क़ौम-ए-आद और हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का ज़िक्र क़ुरआन की कई सूरतों में आया है, जिनमें सूरह हूद, सूरह अल-आराफ़, सूरह अश-शुअरा, सूरह अल-अहक़ाफ़ और सूरह अल-हाक़्क़ा शामिल हैं।
9. क्या क़ौम-ए-आद की कहानी आज भी हमारे लिए नसीहत है?
जी हाँ। यह वाकिया हमें याद दिलाता है कि ताक़त, दौलत और दुनिया की शानो-शौकत हमेशा रहने वाली नहीं है। असली कामयाबी अल्लाह की इताअत और सही रास्ते पर चलने में है।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
