01/03/2026
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सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने दीन कैसे सीखा? Sahaba Raziallahu anhum ne deen kaise seekha?

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Sahaba Raziallahu anhum ne deen kaise seekha?
Sahaba Raziallahu anhum ne deen kaise seekha?

सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने दीन कैसे सीखा?

इसी वजह से अल्लाह तआला ने जब कभी कोई आसमानी किताब दुनिया में भेजी तो उसके साथ एक रसूल ज़रूर भेजा, वरना अगर अल्लाह तआला चाहते तो बराहे रास्त किताब नाज़िल फरमा देते, लेकिन बराहे रास्त किताब नाजिल करने के बजाये हमेशा किसी रसूल और पैग़म्बर के ज़रिये किताब भेजी,ताकि वह रसूल और पैग़म्बर उस किताब पर अमल करने का तरीक़ा लोगों को बताये और उस रसूल की सोहबत और उसकी ज़िन्दगी के तर्जे अमल से लोग यह सीखें कि उस किताब पर किस तरह अमल किया जाता है।

हजराते सहाबा रजि. से पूछिये कि उन्होंने किस यूनीवर्सिटी में तालीम पाई? वे हज़रात कौन से मदरसे से पढ़ कर फारिग हुए थे? उन्होंने कौन सी किताबें पढ़ी थीं? सही बात यह है कि उनके लिये न तो ज़ाहिरी तौर पर कोई मदरसा था, न ही उनके लिये कोर्स मुकर्रर था, न कोई निसाबे तालीम था, न किताबें थीं, लेकिन एक सहाबी के तर्जे अमल पर हज़ार मदरसे और हज़ार किताबें कुरबान हैं,

इसलिये कि उस सहाबी ने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सोहबत उठाई और सोहबत के नतीजे में हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की एक एक अदा को देखा, और फिर उस अदा को अपनी ज़िन्दगी में अपनाने की कोशिश की और इस तरह वह सहाबी बन गये।

अच्छी सोहबत इख़्तियार करो

बहर हाल ! यह सोहबत ऐसी चीज़ है जो इन्सान को कीमिया बना देती है, इसी लिये हमारे तमाम बुजुर्गों का कहना यह है कि अगर दीन सीखना है तो फिर अपनी सोहबत दुरुस्त करो, और ऐसे लोगों के साथ उठो बैठो और ऐसे लोगों के पास जाओ जो दीन के हामिल यानी उठाने वाले और उसको अपनाए हुए हैं।

वह सोहबत धीरे धीरे तुम्हारे अन्दर भी दीन की बड़ाई, मुहब्बत और उसकी फिक्र पैदा करेगी, और ग़लत सोहबत में बैठोगे तो फिर गलत सोहबत के असरात तुम पर ज़ाहिर होंगे, और यह दीन हुज़ूर ए अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वक़्त से इसी तरह चला आ रहा है। हुज़ूर ए अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सोहबत से सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम तैयार हुए और सहाबा-ए-किराम की सोहबत से ताबिईन तैयार हुए, और ताबिईन की सोहबत से तब्ए ताबिईन तैयार हुए, यह सारे दीन का सिलसिला उस वक़्त से लेकर आज तक इसी तरह चला आ रहा है।

दो सिलसिले

हज़रत मौलाना मुफ्ती मुहम्मद शफी साहिब रहमतुल्लाहि अलैहि “मआरिफुल कुरआन” में लिखते हैं कि अल्लाह तबारक व तआला ने इन्सान की हिदायत के लिये दो सिलसिले जारी फरमा दिये हैं, एक अल्लाह की किताब का सिलसिला, और दूसरा रिजालुल्लाह का सिलसिला। एक अल्लाह की किताब और दूसरे अल्लाह के आदमी। यानी अल्लाह तआला ने ऐसे रिजाल पैदा फरमाये हैं जो इस किताब पर अमल का नमूना हैं, इसलिये अगर कोई शख्स दोनों सिलसिलों को लेकर चले तो उस वक़्त दीन की हक़ीक़त समझ में आती है,

लेकिन अगर सिर्फ किताब लेकर बैठ जाये और रिजालुल्लाह यानी अल्लाह वालों से गाफिल हो जाये तो भी गुमराही में मुब्तला हो सकता है, और अगर तन्हा रिजालुल्लाह की तरफ देखे और किताबुल्लाह से गाफिल हो जाये तो भी गुमराही में मुब्तला हो सकता है, इसलिये दोनों चीज़ों को साथ लेकर चलने की ज़रूरत है।

दीन किताबों से नहीं, सोहबत से ज़िंदा होता है।

इसी लिये हमारे बुजुर्गों ने फ़रमाया कि इस वक़्त दीन को हासिल करने और उस पर अमल करने का आसान तरीक़ा यह है कि आदमी अल्लाह वालों की सोहबत इख्तियार करे, और ऐसे लोगों की सोहबत इख़्तियार करे जो अल्लाह तआला के दीन की समझ रखते हैं, और दीन पर अमल पैरा हैं, जो शख़्स जितनी सोहबत इख़्तियार करेगा वह उतना ही दीन के अन्दर तरक्की करेगा।

बहर हाल! यह हज़ाते सहाबा-ए-किराम चूंकि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दूर रहते थे, इसी लिये ये हज़रात बीस दिन निकाल कर हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़िदमत में रहे और उन बीस दिनों में दीन की जो बुनियादी तालीमात थीं वे हासिल कर लीं, दीन का तरीका सीख लिया और हुज़ूरे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सोहबत से फैज़ हासिल करने वाले बन गये।

अपने छोटों का ख़्याल

फिर खुद ही हुज़ूर ए अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दिल में यह ख़्याल आया कि ये नौजवान लोग हैं, ये अपने घर बार छोड़ कर आये हैं, इसलिये इनको अपने घर वालों की याद आती होगी, और इनको अपने घर वालों से मिलने की ख़्वाहिश होगी, तो खुद ही हुज़ूर ए अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनसे पूछा कि तुम अपने घर में किस किसको छोड़ कर आये हो?

उनमें से कुछ ऐसे नौजवान थे जो नये शादी शुदा थे। जब उन्होंने बताया कि हम फलां फलां को छोड़ कर आये हैं, तो आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनसे फरमाया कि अब तुम अपने घरों को वापस जाओ।

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….

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