ज़कात हर उस मुसलमान पर वाजिब है जो आकिल, बालिग, आज़ाद, मालिके निसाब हो और निसाब का पूरे तौर पर मालिक हो, निसाबे दीन और हाजते असलिया से फारिग हो और उस निसाब पर पूरा साल गुज़र जाए। (कुतुब फिकई)
निसाबे ज़कात :-
ज़कात फर्ज़ होने के लिए माल व दौलत की एक खास हद और मुतअय्यन मिक्दार है, जिसको शरीअत की इस्तिलाह में “निसाब” कहा जाता है, जकात उसी वक्त फ़र्ज़ है जब माल बक्द्र निसाब हो, निसाब से कम माल व दौलत पर जकात फर्ज़ नहीं।
सोने का निसाब साढ़े सात तोला है, और चाँदी का निसाब साढ़े बावन तोला है। और माले तिजारत का निसाब यह है कि उसकी कीमत सोने वा चांदी के निसाब के बराबर हो या सोने, चांदी की नकद कीमत बसूरत रुपए हों।
जिसके पास इतना माल हो उस पर ज़कात फर्ज़ है। सोना चाँदी, तिजारती अमवाल, धात के सिक्के, नोट, जेवर सब पर चालीसवां हिस्सा यानी ढाई फीसद (सौ रुपये में ढाई रुपए) ज़कात निकालना फर्ज़ है।
ज़कात क्यों फर्ज़ हुई ?
बारहा लोगों के दिलों में यह सवाल उभरता है कि ज़कात क्यों फर्ज हुई? उसकी फर्जियत का मक्सद क्या है? इसमें मुसलमानों का क्या फायदा है? मुसलमानों को अपनी मेहनत की कमाई दूसरों को देने का क्यों हुक्म दिया जा रहा है? तो इन सवालात के जवाबात गौर से पढ़ो और अपने दिल में पैदा होने वाले वसवसों को खत्म करने की कोशिश करते हुए अल्लाह की राह में फर्राख दिली से खर्च करने का जज़्बा पैदा करो।
जकात का निज़ाम दरअस्ल मोमिन के दिल से हुब्बे दुनिया और उसके जड़ से पैदा होने वाले सारे खुराफात को ख़त्म करके खालिस खुदा की मोहब्बत करने के लिए फर्ज़ की गई, पूरे इस्लामी मुआशरा को बुख्ल, तंग दिली, खुदगर्जी, बुग्ज, हसद, संग दिली और इस्तेहसाल जैसे बेअस्ल जज़्बात से पाक करके उसमें मोहब्बत, इसार, एहसान, खुलूस, खैर ख्वाही, तआवुन, मवासात और रफाक्त के आला और पाकीज़ा जज़्बात पैदा करता है।
ज़कात हर नबी की उम्मत पर फर्ज़ रही, उसकी मिक्दार, निसाब और फिकही एहकाम में ज़रूर फ़र्क रहा लेकिन ज़कात का हुक्म बहरहाल तक़रीबन हर शरीअत में मौजूद रहा।
ज़कात से मुतअल्लिक चंद ज़रूरी मसाइल :-
☆ वह माल जो तिजारत के लिए रखा हुआ है उसे देखा जाए कि उसकी कीमत, साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी के बराबर हो तो उस माले तिजारत की ज़कात अदा करना फर्ज़ है। माले तिजारत से मुराद हर किस्म का सामान है ख्वाह वह गल्ला वगैरा के जिंस से हो या मवेशी, घोड़े, बकरियाँ, गाए वगैरा, अगर यह अशिया बगर्जे तिजारत रखी, हुई हैं तो पूरा साल गुज़रने के बाद उनकी ज़कात अदा करना फर्ज है।
☆ अगर माले तिजारत बकदरे निसाब नहीं है लेकिन सोना चांदी और नकद रुपया मौजूद है तो उन सब को मिलाया जाएगा, अगर उनका मजमूआ बकदरे निसाब हो जाए तो उस पर ज़कात फर्ज़ है वरना नहीं।
☆ जो मकानात या दुकानें किराए पर दे रखी हैं तो उन पर जकात नहीं लेकिन उनका किराया जमा करने के बाद अगर बक्दरे निसाब हो जाए तो उस पर साल गुज़रने के बाद ज़कात फर्ज़ है।
अगर मालिक पहले ही मालिके निसाब है तो किराया उसी निसाब में शामिल होगा, किराया की आमदनी का अलाहिदा निसाब शुमार नहीं किया जाएगा। इसलिए जब पहले निसाब पर साल गुज़र जाए तो किराए की रकम भी उस निसाब में मिला कर ज़कात अदा की जाएगी। रोज़ा के फज़ाईल अहादीष की रोशनी में ।
☆ दुकानों में माले तिजारत रखने के लिए शो केस, तराजु, अलमारियाँ वगैरा, नीज़ इस्तेमाल के लिए फरनीचर, सर्दी, गर्मी से बचाव के लिए हीटर, एयरकंडीशन वगैरा और ऐसी चीजें जो ख़रीद व फरोख्त में सामान के साथ नहीं दी जातीं बल्कि खरीद व फरोख्त में उनसे मदद ली जाती हो तो उन पर ज़कात फर्ज़ नहीं, क्योंकि यह तिजारत में हवाइजे असलिया में शामिल हैं।
☆ मोती और जवाहिरात पर ज़कात वाजिब नहीं अगर्चे हज़ारों के हीं हो अगर तिजारत की नियत से ली है तो ज़कात बाजिव हो गई।
☆ साल गुजरने से मुराद क़मरी साल है यानी चांद के महीनों से बारा महीने, अगर शुरू साल और आखिर साल में निसाब कामिल है और दर्मियान साल में निसाब नाक़िस भी हो गया हो तो भी ज़कात फर्ज़ है।
☆ ज़कात देते वक्त या ज़कात के लिए माल अलाहिदा करते वक़्त ज़कात की नियत शर्त है। नियत के यह माना हैं कि अगर पूछा जाए तो विला ताम्मुल बता सके कि ज़कात है।
साल भर तक खैरात करता रहा अब नियत की जो कुछ दिया है जकात है, तो ज़कात अदा न होगी, माल को ज़कात की नियत से अलाहिदा कर देने से बरीउज़्ज़िमा न होगा जब तक कि फकीर को न दे दें, यहाँ तक कि वह जाता रहा तो ज़कात साकित न हुई।
☆ ज़कात का रुपया मुरदा की तजहीज़ व तक्फीन या मस्जिद की तामीर में नहीं सर्फ कर सकते कि फकीर को मालिक बनाना न पाया गया, अगर इन उमूर में खर्च करना चाहें तो उसका तरीक़ा यह है कि फकीर को मालिक कर दें और वह सर्फ करे और सवाब दोनों को होगा, बल्कि हदीस पाक में है अगर सौ हाथों में सदका गुज़रा तो सब को वैसा ही सवाब मिलेगा जैसा देने वाले के लिए, और उसके अज्र में कुछ कमी न होगी।
☆ ज़कात देने में यह जरूरी नहीं कि फकीर को ज़कात कह कर दे बत्कि सिर्फ नियते ज़कात काफी है। यहाँ तक कि हिबा या कर्ज़ कह कर दे और नियत ज़कात की हो तो भी अदा हो जाएगी।
☆ यूँ ही नज़र, हदिया, ईदी वा बच्चों की मिठाई खाने के नाम से दी तव भी अदा हो गई, बाज मोहताज ज़रूरतमंद ज़कात का रुपया नहीं लेना चाहते उन्हें ज़कात कह कर दिया जाएगा तो नहीं लेंगे लिहाजा ज़कात का लफ़्ज़ न कहे।
सोने, चाँदी के अलावा तिजारत की कोई चीज हो जिसकी कीमत सोने या चांदी के निसाब को पहुंचे तो उस पर भी ज़कात वाजिब है। यानी कीमत के चालीसवें हिस्से पर जकात वाजिब है।
अल्लाह रबबुल इज्ज़त हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे, हमे एक और नेक बनाए, सिरते मुस्तक़ीम पर चलाये, हम तमाम को रसूल-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और इताअत की तौफीक आता फरमाए, खात्मा हमारा ईमान पर हो। जब तक हमे जिन्दा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे, आमीन ।
इस बयान को अपने दोस्तों और जानने वालों को शेयर करें। ताकि दूसरों को भी आपकी जात व माल से फायदा हो और यह आपके लिये सदका-ए-जारिया भी हो जाये।
क्या पता अल्लाह ताला को हमारी ये अदा पसंद आ जाए और जन्नत में जाने वालों में शुमार कर दे। अल्लाह तआला हमें इल्म सीखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की तौफीक अता फरमाए । आमीन ।
खुदा हाफिज…
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