हदीसे-कुदसी में अल्लाह तआला का इरशाद हैः मैं एक छुपा हुआ ख़ज़ाना था। मैंने पसन्द किया कि मैं पहचाना जाऊँ। पस मैंने मख़्लूक को पैदा कर दिया।
मख़्लूक के पैदा होने का बुनियादी सबब यह रहा कि अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त को यह बात पसन्द आयी कि लोग मेरी मारिफ़त (पहचान) हासिल करें। मेरी बड़ाईयों से वाकिफ हों। चूँकि मख़्लूक की पैदाईश का सबब मुहब्बत बनी इसलिए हमारे बड़े मुहब्बत को पहला दर्जा देते हैं।
यह मुहब्बत अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त ने अपनी सारी मख़्लूक में तकसीम फरमाई। हर मख़्लूक ने अपनी-अपनी क्षमता और सलाहियत के मुताबिक उसमें से हिस्सा पाया। यह मुहब्बत जानदार चीज़ों को भी मिली और जो गैर-जानदार हैं उनको भी मिली। पूरी दुनिया में मुहब्बत का राज है।
आपने देखा होगा कि लोहा मक़नातीस की तरफ बेइख़्तियार खिंचता है। यह चीज़ों में मुहब्बत की दलील है। जो भी चीज़ ऊपर से फेंकें वह ज़मीन पर गिरती है। यह जमादात (बेजान चीज़ों) में मुहब्बत की दलील है। परिन्दों ने हिस्सा पाया, जानवरों ने हिस्सा पाया, इनसानों ने हिस्सा पाया, मिल-जुलकर रहना था।
खूबसूरत वाक़िआ:-नमाज़ का बयान
अगर दिलों में कोई ताल्लुक ही न होता, लोग एक दूसरे से अजनबी होते, एक की तकलीफ का दूसरा एहसास ही न करता, कोई किसी के साथ हमदर्दी न करता तो यह ज़िन्दगी इनसान के लिए गुज़ारनी मुश्किल हो जाती।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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