एक बार हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा के पास कहीं से कुछ गोश्त आया और प्यारे नबी सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम को गोश्त बहुत अच्छा लगता था, इसलिए हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु ताआला अन्हा ने नौकरानी से फरमाया कि गोश्त ताक में रख दे, शायद हज़रत खाना पसंद करें।
उसने ताक में रख दिया। इतने में एक मांगने वाला आया और दरवाज़े पर खड़े होकर आवाज़ दी, भेजो अल्लाह के नाम पर, खुदा बरकत दे। घर में से जवाब आया, खुदा तुझको भी बरकत दे। इस लफ़्ज़ में यह इशारा है कि कोई चीज़ देने को मौजूद नहीं है। वह मांगने वाला चला गया।
इतने में अल्लाह के रसूल सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाये। फरमाया, ऐ उम्मे सलमा ! तुम्हारे पास खाने की कोई चीज़ है ? उन्होंने कहा, हां और नौकरानी से कहा, जा आपके लिए गोश्त लेती आ। वह गोश्त लेने गई। क्या देखती है कि वहां गोश्त का तो नाम भी नहीं है, सिर्फ एक सफेद पत्थर का एक टुकड़ा रखा है। आपने फ़रमाया कि तुमने मांगने वाले को न दिया था, इसलिए वह गोश्त पत्थर बन गया।
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सोचिए, खुदा के नाम पर न देने की यह नहूसत हुई कि उस गोश्त की सूरत बिगड़ गई और पत्थर बन गया। इसी तरह जो शख़्स मांगने वाले से बहाना करके खुद खाता है, वह पत्थर खा रहा है, जिसका यह असर है कि पत्थर-दिली और दिल की सख़्ती बढ़ती चली जाती है। चूंकि हज़रत सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम के घर वालियों के साथ खुदावन्द करीम की बड़ी इनायत और रहमत है, इसलिए इस गोश्त की सूरत खुली निगाहों में बदल दी, ताकि इसके इस्तेमाल से बची रहे।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
