Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ि.) इस्लाम के सबसे बड़े सहाबा में से एक हैं। उनकी ज़िंदगी ईमान, सब्र और अल्लाह तआला पर अटूट भरोसे की बेहतरीन मिसाल है। जब उन्होंने इस्लाम कबूल किया, तो उन्हें तरह-तरह की तकलीफ़ें और ज़ुल्म सहने पड़े। तपती हुई रेत पर लिटाया गया, सीने पर भारी पत्थर रखा गया, लेकिन फिर भी उनकी ज़ुबान से सिर्फ एक ही आवाज़ निकलती रही—”अहद… अहद” यानी अल्लाह एक है।
हज़रत बिलाल (रज़ि.) की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चे ईमान वाले इंसान मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपने दीन पर डटे रहते हैं। यही सब्र और इस्तिक़ामत का इनाम था कि अल्लाह तआला ने उन्हें इस्लाम का पहला मुअज्जिन बनने का मौका दिया।
आइए, इस आर्टिकल में हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ि.) की ज़िंदगी, उनके सब्र, कुर्बानी और अज़ान की ख़िदमत के बारे में विस्तार से जानते हैं और उनसे अपनी ज़िंदगी के लिए अहम सीख हासिल करते हैं।
हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ि.) का वाक़िआ
हज़रत बिलाल हब्शी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु एक मशहूर सहाबी हैं, जो मस्जिदे नबवी के हमेशा मुअज्जिन’ रहे। शुरू में एक काफ़िर के गुलाम थे, इस्लाम ले आये जिसकी वजह से तरह-तरह की तकलीफें दी जाती थीं।
उमैय्या बिन खल्फ जो मुसलमानों का सख़्त दुश्मन था, उनको सख्त गर्मी में दोपहर के वक्त तपती हुई रेत पर सीधा लिटा कर उनके सीने पर पत्थर की बड़ी चट्टान रख देता था ताकि वह हरकत न कर सकें। और कहता था कि या इस हाल में मर जाएं और ज़िन्दगी चाहें तो इस्लाम से हट जायें,
मगर वह इस हालत में भी ‘अहद- अहद’ कहते थे यानी माबूद एक ही है। रात को जंजीरों में बांध कर कोड़े लगाये जाते और अगले दिन उन जख्मों को गर्म ज़मीन पर डाल कर और ज्यादा जख्मी किया जाता ताकि बेकरार होकर इस्लाम से फिर जायें,
या तड़प-तड़प कर मर जाएं। अज़ाब देने वाले उकता जाते, कभी अबू जहल का नम्बर आता कभी उमैय्या बिन खल्फ का कभी औरों का और हर शख्स इसकी कोशिश करता कि तकलीफ देने में जोर ख़त्म कर दे। हजरत अबूबकर सिद्दीक रजियल्लाहु तआला अन्हु ने इस हालत में देखा तो उनको खरीद कर आज़ाद फ़रमाया ।
चूंकि अरब के बुतपरस्त अपने बुतों को भी माबूद कहते थे। इसलिए उनके मुकाबले में इस्लाम की तालीम तौहीद की थी, जिसकी वजह से हज़रत बिलाल रजियल्लाहु तआला अन्हु की ज़बान पर एक ही एक’ का विर्द था। यह ताल्लुक और इश्क की बात है।
हम झूठी मुहब्बतों में देखते हैं कि जिससे मुहब्बत हो जाती है, उसका नाम लेने में लुत्फ़ आता है, बे फायदा उसको रटा जाता है, तो अल्लाह की मुहब्बत का क्या कहना जो दीन और दुनियां में दोनों जगह काम आने वाली है।
यही वजह है कि हज़रत बिलाल रजियल्लाहु तआला अन्हु को हर तरह से सताया जाता था, सख्त से सख्त तकलीफें पहुंचाई जाती थीं, मक्का के लड़कों के हवाले कर दिया जाता कि वह उनको गली कूचों में चक्कर देते फिरें और यह थे कि, ‘एक ही एक है. की रट लगाते थे।
ये भी पढ़ें: आयतुल कुर्सी की फ़ज़ीलत: 10 हैरतअंगेज़ फ़ज़ाइल और बरकतें | कुरआन व हदीस की रोशनी में
इस का यह सिला’ मिला कि फिर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में मुअज्जिन बने और सफरे हज़र में हमेशा अज़ान की खिदमत इनके सुपुर्द हुई। हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाल के बाद मदीना तैय्यबा में रहना और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खाली जगह देखना मुश्किल हो गया,
इसलिए इरादा किया कि अपनी जिंदगी के जितने दिन हैं, जिहाद में गुज़ार दूं, इसलिए जिहाद में शिरकत की नीयत से चल दिए। एक अर्से तक मदीना ‘मुनव्वरा लौट कर नहीं आये। एक मर्तबा हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख्वाब में जियारत की । हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया , बिलाल !
यह क्या जुल्म है हमारे पास कभी नहीं आते, तो आंख खुलने पर मदीना तैय्यबा हाजिर हुए। हजरत हसन व हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हुम ने अज़ान की फर्माइश की, लाडलो की दरख्वास्त ऐसी नहीं थी कि इन्कार की गुजाइश होती।
अज़ान कहना शुरू की और मदीना में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के जमाने की अजान कानों में पड़ कर कुहराम मच गया । औरतें तक रोती हुई घर से निकल पड़ीं। चंद रोज कियाम के बाद वापस हुए सन् 20 हिजरी के करीब दमिश्क में विसाल हुआ ।
ये भी पढ़ें: बेटियाँ अल्लाह की रहमत हैं, बोझ नहीं |
FAQ (सवाल-जवाब)
1. हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ि.) कौन थे?
हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ियल्लाहु अन्हु) रसूलुल्लाह ﷺ के मशहूर सहाबी और इस्लाम के पहले मुअज्जिन थे। उन्होंने अपने ईमान की खातिर बहुत ज़ुल्म और तकलीफ़ें बर्दाश्त कीं।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
2. हज़रत बिलाल (रज़ि.) पर ज़ुल्म क्यों किया गया?
उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया था। इसी वजह से मक्का के मुश्रिकों ने उन्हें इस्लाम छोड़ने के लिए तरह-तरह की सख़्त तकलीफ़ें दीं।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
3. “अहद… अहद” का क्या मतलब है?
“अहद” का मतलब है “एक”। हज़रत बिलाल (रज़ि.) ज़ुल्म सहते हुए भी कहते रहे कि अल्लाह एक है।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
4. हज़रत बिलाल (रज़ि.) को आज़ाद किसने कराया?
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें खरीदकर आज़ाद किया।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
5. इस्लाम में हज़रत बिलाल (रज़ि.) का क्या मकाम है?
उन्हें इस्लाम का पहला मुअज्जिन बनने का सम्मान मिला। रसूलुल्लाह ﷺ के दौर में मस्जिद-ए-नबवी में अज़ान देने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के पास थी।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
6. रसूलुल्लाह ﷺ के विसाल के बाद हज़रत बिलाल (रज़ि.) ने क्या किया?
रसूलुल्लाह ﷺ के विसाल के बाद उनका मदीना में रहना बहुत मुश्किल हो गया। इसलिए वे जिहाद में शामिल होने के लिए शाम (दमिश्क) की तरफ चले गए।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
7. क्या हज़रत बिलाल (रज़ि.) ने बाद में फिर अज़ान दी थी?
जी हाँ। एक बार उन्होंने ख़्वाब में रसूलुल्लाह ﷺ की ज़ियारत की। फिर मदीना आए और हज़रत हसन व हुसैन (रज़ि.) की फ़रमाइश पर अज़ान दी, जिसे सुनकर पूरा मदीना ग़म से भर गया और लोग रो पड़े।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
8. हज़रत बिलाल (रज़ि.) की ज़िंदगी से हमें क्या सीख मिलती है?
उनकी ज़िंदगी हमें मज़बूत ईमान, सब्र, अल्लाह पर भरोसा, दीन पर क़ायम रहने और हर हाल में सच्चाई का साथ देने की सीख देती है।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
9. हज़रत बिलाल (रज़ि.) का विसाल कहाँ हुआ?
ज़्यादातर रिवायतों के मुताबिक़, उनका विसाल लगभग 20 हिजरी में दमिश्क (शाम) में हुआ।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
10. हर मुसलमान को हज़रत बिलाल (रज़ि.) की कहानी क्यों पढ़नी चाहिए?
क्योंकि यह कहानी बताती है कि सच्चा ईमान इंसान को हर मुश्किल में मज़बूत रखता है और अल्लाह तआला अपने नेक बंदों को दुनिया और आख़िरत दोनों में इज़्ज़त अता फ़रमाता है।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Hazrat Bilal Habshi (RA) Ki Zindagi: Imaan, Sabr
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
