औरतों को दीनी तालीम देना बहुत ज़रूरी है। यह नाचीज़ पहले भी कई बार कह चुका है कि अगर किसी इनसान के दो बच्चे हों एक बेटा और एक बेटी और उसकी हैसियत इतनी हो कि दो में से एक को तालीम दिलवा सके तो उसको चाहिए कि बेटी को तालीम दिलवाये, इसलिए कि मर्द पढ़ा तो एक फर्द पढ़ा, औरत पढ़ी तो एक परिवार पढ़ा ।
आजकल के मर्दों में एक बात आम मशहूर है कि अज़ी हदीस पाक में आया है कि औरतें अक़्ल और दीन में नाक़िस होती हैं। यह बात सौ फीसद ठीक है, इसकी वजह यह है कि उनकी अक़्ल में जज़्बातियत ज़्यादा होती है। ज़रा सी बात पर भड़क उठती हैं। महसूस जल्दी कर लेती हैं।
नरम भी जल्दी पढ़ जाती हैं, गरम भी जल्दी हो जाती हैं। तो यह अक़्ल की कमी-बेशी, यह अक़्ल का नुक़्स है। दूसरे अपने जज़्बात पर काबू नहीं रख पातीं, जज़्बात में आ जायें तो दीन की बातों को भी ठुकरा बैठती हैं, इसलिए फरमाया कि उनमें अक़्ल और दीन की कमी है। वैसे अगर ये किसी काम के करने पर तुल जायें तो माशा-अल्लाह करके दिखा दिया करती हैं।
हदीस पाक में हैः कि औरतों को अक़्ल और दीन के जैसा नाक़िस नहीं देखा, लेकिन ये ऐसी नाक्सि हैं कि बड़े-बड़े अक्लमन्द मर्दों की अक़्ल को उड़ा देती हैं।
इसलिए यह बात तर्जुबे में आई कि औरतें जब किसी चीज़ को मनवाने पर तुल जायें, ये ज़िद करें, हठधर्मी करें या शौहर को प्यार मुहब्बत’ की गोली खिलायें, तो शौहर को मजबूर करके अपनी बात मनवा लेती हैं। जब ये दुनिया की बातें मनवा लेती हैं तो दीन की तालीम हासिल करने की ये बात क्यों नहीं मनवा सकतीं?
इसमें ग़लती मर्दों और औरतों दोनों की तरफ से है। कुछ घरों के मर्द चाहते हैं कि औरतें दीन में आगे बढ़ें मगर औरतों के दिल में शौतानियत ग़ालिब होती है, रस्म व रिवाज की मुहब्बत होती है, वे आगे कदम नहीं बढ़ातीं और दीनदारी की ज़िन्दगी गुज़ारने पर अमादा नहीं होतीं।
और कई घरों में औरतें दीनदार होती हैं, वे चाहती हैं कि हमारे मर्द नेक बन जायें, मगर मर्दों की अक़्ल पर पर्दे पड़े होते हैं, वे सुनी अनसुनी कर देते हैं। ये बेचारी रो-रोकर उनको समझाती हैं कि यूँ न करो यह गुनाह न करो। यह गुनाह न करो, मगर ये तवज्जोह भी नहीं करते। तो ऐसे मर्दों की वजह से घर की औरतों के दीन में भी रुकावटें आ जाती हैं।
तो किसी घर में औरत रुकावट बनती है और किसी घर में मर्द रुकावट बनता है। इन रुकावटों को दूर करने की ज़रूरत है। मर्दों में जहाँ दीनदारी का शौक होता है इसी तरह औरतों में भी दीनदारी का शौक होता है, उनके अन्दर रूहानी तरक्की करने की ख़ासियत और सलाहियत मौजूद होती है।
खूबसूरत वाक़िआ:-मुहब्बत से बनी दुनिया
अगर उनके दिल में अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त की मारिफ़त को हासिल करने का शौक आ जाये तो रातों की इबादत उनके लिए मुश्किल नहीं, तहज्जुद की पाबन्दी उनके लिए मुश्किल नहीं। पाँच वक़्त की नमाज़ की पाबन्दी उनके लिए मुश्किल नहीं।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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