यहाँ एक नुक्ता समझने का यह है कि जो परवर्दिगार दूसरों की नाराज़गी को बरदाश्त नहीं करता, वह अगर खुद किसी बात पर नाराज़ हो तो उसको कैसे बरदाश्त करेगा कि वह नाराज़ रहे।
इसलिए अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त की यह चाहत है कि मेरे बन्दे गुनाहों से सच्ची तौबा करें। मेरे दर पर आकर माफी माँग लें और मैं उनको माफ़ कर दूँ। बच्चा अपनी माँ से जब भी माफ़ी माँगता है माँ जल्दी माफ कर देती है। अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त तो उससे भी ज़्यादा मोमिन पर मेहरबान हैं।
इसलिए अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त से माफी माँगना बहुत आसान है। और ख़ास तौर पर रमज़ान शरीफ के महीने में जो रहमतों का महीना है, परवर्दिगार की रहमतों और मगफिरतों के दरवाज़े खुल जाते हैं। अब तो मग़फिरत हासिल करने के लिए बहाने की ज़रूरत है।
यह हमारी खुशनसीबी है कि हम रमज़ान मुबारक के आख़िरी दशक में ज़िन्दा हैं। अल्लाह ने हमें सुनहरा मौका दे दिया। अपने गुज़रे हुए गुनाहों पर नादिम और शर्मिन्दा हो जायें। माफी माँग लीजिए। परवर्दिगारे-आलम माफ फरमा देंगे। हमारे सर से गुनाहों का बोझ हट जायेगा।
माँ चाहे जितनी भी नाराज़ हो बच्चे की तकलीफ नहीं देख सकती, माफ़ कर देती है। चुनाँचे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक बार एक क़ाफ़िले को देखा। एक माँ परेशान थी उसको अपने सर पर दुपट्टे का होश भी नहीं था। उसका बेटा गुम हो गया था।
वह भागी फिर रही थी। लोगों से पूछती थीः किसी ने मेरे बेटे को देखा हो तो मुझे बताओ। यह मन्ज़र भी अजीब होता है कि माँ का जिगर का टुक्ड़ा उससे जुदा हो, उस पर क्या गुज़रती है। उसका दिल मछली की तरह तड़प रहा होता है। शब्दों में बयान नहीं कर सकती कि उस पर क्या मुसीबत गुज़रती है।
उसकी आँखें तलाश कर रही होती हैं कि मेरा बेटा मुझे नज़र आ जाये। नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से पूछाः यह माँ अपने बेटे की वजह से परेशान है, अगर इसे इसका बेटा मिल जाये तो क्या यह उसको आग में डाल देगी।
सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने कहा ऐ अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम! कभी नहीं डालेगी। इतनी मुहब्बत है इसको बच्चे से, यह तो गवारा नहीं करेगी। नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया जिस तरह माँ अपने बच्चे को आग में डालना गवारा नहीं करती इसी तरह अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त भी मोमिन बन्दे को आग में डालना गवारा नहीं करते। इस्लाम में औरत और पर्दे का हुक्म।
तो अल्लाह तआला से माफी माँगनी तो बहुत आसान है। इसलिए कि उनकी मुहब्बत तो सारी दुनिया की माँओं से सत्तर गुना ज़्यादा है।
हदीस पाक में आता है कि एक नौजवान सहाबी थे, उन्होंने अपनी माँ को नाराज़ कर रखा था। कोई तकलीफ़ पहुँचाई थी, नाराज़ होकर धक्का दिया और माँ को चोट आ गयी। तो वह दिल से नाराज़ थीं। अब इन सहाबी की मौत का वक़्त आ गया।
आख़िरी वक़्त की कैफियात तारी हैं मगर मौत नहीं आती, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़िदमत में अर्ज किया गया। इरशाद फरमायाः मैं खुद चलता हूँ। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तशरीफ लाये, सूरतेहाल मालूम की, आपने उनकी वालिदा से सिफारिश फरमायी कि अपने बेटे को माफ कर दे।
वह कहने लगी मैं हरगिज़ माफ नहीं करूँगी। उसने मुझे इतना दुख दिया इतना सताया कि मैं उसे माफ कर ही नहीं सकती। जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने देखा कि यह अपनी बात पर अड़ी हुई है तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया लाओ आग के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करो।
जब उसने यह सुना तो वह पूछने लगी कि लकड़ियाँ क्यों मंगवा रहे हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया आग जलायेंगे और तुम्हारे बेटे को उस आग में डालेंगे। तू उससे राज़ी जो नहीं हो रही। उसने जैसे ही यह सुना दिल मोम हो गया। कहने लगी ऐ अल्लाह के नबी! मेरे बेटे को आग में न डालिये मैंने अपने बेटे की गलतियों को माफ कर दिया।
तो जब माँ नहीं चाहती कि बेटा आग में जाये तो अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त कैसे चाहेंगे कि उसके मोमिन बन्दे जहन्नम में जायें। माँ ने जितनी भी तकलीफें उठायी हों आख़िरकार माँ, माँ होती है। मुहब्बत के हाथों मजबूर होती है।
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क्या पता अल्लाह तआला को हमारी ये अदा पसंद आ जाए और जन्नत में जाने वालों में शुमार कर दे। अल्लाह तआला हमें इल्म सीखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की तौफीक अता फरमाए ।आमीन।
खुदा हाफिज…
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