Ifk Ka Dardnaak Waqia
इफ़्क का वाक़िया इस्लामी तारीख़ का एक ऐसा दर्दनाक और सबक़-आमोज़ वाक़िया है, जिसे पढ़कर इंसान को झूठ, बोहतान, बदगुमानी और बिना तहक़ीक़ किसी बात को आगे फैलाने के नुकसान का अंदाज़ा होता है। यह वह वाक़िया है जिसमें उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की पाकदामनी पर एक बहुत बड़ा बोहतान लगाया गया, जिससे नबी-ए-करीम ﷺ और आपके अहले बैत को भी बेहद तकलीफ़ पहुँची।
लेकिन अल्लाह तआला ने अपनी हिकमत और रहमत से इस मुश्किल घड़ी को हमेशा के लिए एक बड़ी नसीहत बना दिया। सूरह अन-नूर की आयतें नाज़िल हुईं और हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की पाकदामनी और बरअत का ऐलान फ़रमा दिया गया। साथ ही मुसलमानों को यह भी सिखाया गया कि किसी के बारे में सुनी-सुनाई बात पर यक़ीन करने से पहले तहक़ीक़ करना कितना ज़रूरी है।
आइए, इफ़्क के इस दर्दनाक वाक़िए को समझते हैं और जानते हैं कि इसमें हमारे लिए कौन-कौन से अहम सबक़ और नसीहतें छुपी हुई हैं।
इफ़्क का वाक़िया
शाबान 05 हिजरी मुताबिक़ दिसम्बर सन् 626 ई० में बनी-मुस्तलक़ के सरदार हारिस बिन ज़रार के फ़ित्नो की वजह से बनू-मुस्तलक़ की लड़ाई पेश आई। मुनाफ़िक़ों का यह दस्तूर बन गया था कि जिस लड़ाई के ज़ाहिरी अस्बाब से गुमान ग़ालिब फ़त्ह का होता उससे माले ग़नीमत की लालच से ज़रूर साथ हो जाते। चुनांचे इस लड़ाई में भी मुनाफ़िक़ों का गिरोह मय अपने सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई के मौजूद था, वापसी पर एक मामूली हादसा पेश आ गया।
बुख़ारी शरीफ़ में इस वाक़िए की जिस तफ्सील का ज़िक्र है, उसका हासिल यह है कि जब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कामियाबी के साथ ग़ज़वा बनी मुस्तलक़ से वापस हुए तो मदीना के क़रीब एक मंज़िल पर पड़ाव था कि रात के आख़िरी हिस्से में कूच का एलान हुआ।
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा एलान सुन कर ज़रूरत पूरी करने के लिए तेज़ी के साथ क़ियामगाह से दूर चली गईं। फ़ारिग़ होने के बाद वापस हुईं तो गले में जो हार पहने हुए थीं, वह सीने पर न पाया, वह यह समझ कर कि टूट कर वहीं गिर गया होगा, जहां ज़रूरत पूरी करने के लिए गई थीं, उसको तलाश करने के लिए वापस गईं।
इसी बीच जो जमाअत उनके हौदज को ऊंट पर सवार कराती थी, उसने हौदज उठा कर ऊंट पर कस दिया और चूंकि उस ज़माने में कम खाने की वजह से औरतें आमतौर पर मोटी नहीं होती थीं, और इसलिए वह भी बहुत दुबली थीं, इसलिए हौदज पर लगी टीम ने उनके न होने का मुतलक़ एहसास नहीं किया और ऊंट पर हौदज रख कर रवाना हो गए।
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा जब हार को तलाश करती हुई वापस हुई तो क़ाफ़िला जा चुका था और अब हार भी हौदज के करीब ही मिल गया। वह बहुत परेशान हुईं फिर सोचा कि ज्योंही मुसलमानों को यह महसूस होगा कि मैं हौदज में नहीं हूं तो फ़ौरन नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इसी जगह सवारी भेज देंगे, इसलिए मुनासिब यह है कि क़ाफ़िले का पैदल पीछा करने के बजाए उसी जगह इंतिज़ार किया जाए। रात का आख़िरी हिस्सा था, उजाला होने वाला था कि उनकी आंख लग गई।
उधर सफ़वान बिन मुअत्तल सहमी इस ख़िदमत पर लगे हुए थे कि क़ाफ़िले से बहुत पीछे रह कर निगरानी करते हुए और जो चीज़ भी क़ाफ़िले की रह जाए उसको लेते हुए आएं। वह पीछे से चलते हुए जब उस जगह पहुंचे तो उन्होंने महसूस किया कि यहां कोई इंसान मौजूद है। क़रीब आए तो उनको पहचान लिया, क्योंकि हिजाब की आयत से पहले वह उनको देख चुके थे।
उन्होंने देखते ही फ़ौरन बुलंद आंवाज़ से ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन’ पढ़ा। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा आवाज़ सुन कर बेदार हो गईं और सिमट कर बैठ गईं। सफ़वान ने एक लफ़्ज़ कहे बगैर ऊंट को बिठाया और वह ख़ामोशी के साथ ऊंट पर हौदज में सवार हो गईं और सफ़वान महार पकड़े हुए रवाना हुए और दोपहर के क़रीब लश्कर में जा पहुंचे।
जब यह ख़बर अब्दुल्लाह बिन उबई को मालूम हुई तो उसने और उसकी जमाअत ने मौक़े को ग़नीमत जाना और तेज़ी के साथ इफ्तिरा और बोहतान को फ़ौज में फैला दिया, मगर मुसलमानों ने किसी तरह उसको बावर नहीं किया, अलबत्ता सिर्फ़ तीन मुसलमान दो मर्द और एक औरत हस्सान बिन साबित, मिस्तह बिन असासा और हमना बिन्त जह्श अपनी सादगी से मुनाफ़िक़ों के जाल में फंस गए।
ख़ुदा का करम व फ़ज़्ल देखिए कि ज़्यादा दिन न गुज़रे थे कि अल्लाह तआला ने वह्य (कुरआन) के जरिए मुनाफ़िक़ों की ख़बासत को आशकारा कर दिया और हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की पाक दामनी पर मुहर लगा कर बुहतान लगाने वालों पर कोड़ों की सज़ा जारी करने का हुक्म दिया और इस तरह झूठ बोलने वाले और बुहतान लगाने वाले अपने नतीजे को पहुंचे।
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कुरआन ने इस वाकिए पर मुसलमानों को साफ़ तौर पर बतला दिया कि झूठ और बुहतान पर गढ़ी यह दास्तान सुन कर तुमने खुद ही क्यों न कह दिया कि यह सिर्फ़ झूठ और बुहतान है।
तर्जुमा – ‘जिन लोगों ने बुहतान का यह तूफ़ान उठाया है, वह तुममें से ही एक जमाअत (मुनाफ़िक़ों की जमाअत) है। ऐ पैग़म्बर ! तुम इसको अपने हक़ में बुरा न समझो, बल्कि यह तुम्हारे हक़ में बेहतर है यानी अल्लाह की मस्लहत के राज़ ने इसमें तुम्हारी बेहतरी का अंजाम पोशीदा रखा है इनमें से हर एक आदमी के लिए वह सब कुछ है, जो उसने गुनाह कमाया है और जिसने इस गुनाह का बड़ा बोझ उठाया है, उसके वास्ते बहुत बड़ा अज़ाब है।
जब तुमने इस बुहतान को सुना था, क्यों न ईमान वाले मर्द और ईमान वाली औरतों ने अपने लोगों पर नेक ख़्याल क़ायम कर लिया और क्यों यह न कह दिया कि यह खुले बुहतान का तूफ़ान है। वे तूफ़ान उठाने वाले अपने बुहतान पर क्यों चार गवाह न लाए, पस जब वे गवाह न पेश कर सके तो यही लोग अल्लाह के यहां बिल्कुल ही झूठे हैं और अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रहमत दुनिया और आख़िरत दोनों में तुम पर न होती तो पड़ जाती इस झूठी चर्चा करने में तुम पर कोई बड़ी आफ़त, जबकि तुम इस बुहतान को अपनी जुबानों पर जारी करने लगे और ऐसी बात मुंह से निकालने लगे,
जिसकी तुमको ख़बर तक नहीं और तुम इसको हल्की बात समझते हो, हालांकि (बुहतान और इफ्तिरा) अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ी बात है और जब तुमने उसको सुना था, तो क्यों न कहा कि हमारे लिए मुनासिब नहीं कि ऐसी झूठी बात मुंह से निकालें, ‘अल्लाह ही के लिए पाकी है’ यह तो बहुत बड़ा बहुतान है। अल्लाह तुमको समझाता है कि ऐसा काम फिर कभी न कर बैठना, अगर तुम वाक़ई सच्चे ईमान वाले हो और अल्लाह तुम्हारे लिए पते की बातें वाज़ेह करता है और अल्लाह खूब जानने वाला, हिक्मत वाला है।
जो लोग चाहते हैं कि बदकारी की चर्चा हो ईमान वालों में, उन चाहने वालों के लिए दर्दनाक अज़ाब है, दुनिया में भी, आख़िरत में भी। बेशक अल्लाह (हक़ीक़ते हाल का) जानने वाला है और तुम जानने वाले नहीं हो और अगर अल्लाह का फ़ज़्ल न होता और उसकी रहमत न होती तुम पर और यह बात न होती कि वह नर्मी करने वाला है और मेहरबान है तो क्या कुछ न हो जाता।” (24 :11-20)
सूरह की इन आयतों ने आइशा की तहारत और पाकदामनी का ही सिर्फ एलान नहीं किया, बल्कि मुसलमानों को यह तंबीह भी की कि उनको एक लम्हे का इन्तिज़ार किए बगैर इस क़िस्म के झूठ बोलने वालों के झूठ बोलने पर साफ़-साफ़ कह देना चाहिए था कि यह सिर्फ़ झूठ और बोहतान है।
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ये आयतें इस वजह से ‘आयते बरअत’ भी कहलाती हैं कि उनमें हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बरअत (छूट जाने) का एलान है और मुनाफ़िक़ों और दुश्मनों की ज़िल्लत व ख़्वारी का इज़्हार।
सबक़ और नसीहत
इस वाक़िए ने कुरआन में जिन सबक़ों और नसीहतों का सामान जुटाया है, उनमें ये खुसृसियत के साथ तवज्जोह के क़ाबिल हैं-
1. फ़ासिक़ व फ़ाजिर या बद बातिन इंसानों की दी हुई ख़बर, ख़ासतौर से जबकि वह इस्मत व इफ़्फ़त और तक़्वा और खैर के ख़िलाफ़ हो, हरगिज़ तवज्जोह के क़ाबिल नहीं और इसके लिए सिर्फ इतना कह देना ही काफ़ी है कि सिर्फ़ झूठ है, जब तक कि ख़बर देने वाला उस पर रोशन दलील व हुज्जत क़ायम न कर दे।
2. बेगुनाह पर इलज़ाम और तोहमत लगाना बहुत बड़ा गुनाह है और चूंकि इस गुनाह का करने वाला बन्दों के हक़ों में एक हक़ को निशाने पर रखता है और उसकी तौहीन करता है, इसलिए न सिर्फ़ अख़लाक़ की निगाह में, बल्कि इज्तिमाई क़ानून की नज़र में भी हद-दर्जा मुज्रिम है।
कुरआन की आयतों ने इसके लिए हद्दे क़ज़फ़ (बे-गुनाह पर तोहमत लगाने की सज़ा) के लिए अस्सी कोड़े तज्वीज़ किए हैं, ताकि आगे किसी को भी जुर्रात न हो सके कि वह एक पाकबाज़ इंसान पर तोहमत लगाए या बगैर गवाही के उसका प्रोपगंडा करे।
3. यह वाक़िया जो शुरूआत के एतबार से नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए बहुत सख़्त तक्लीफ़ की वजह बना और अहले बैत को उसने बेहद परेशान ख़ातिर बनाया, लेकिन अंजाम के पेशेनजर अहले बैत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए यह पूरी तरह खैर साबित हुआ, क्योंकि इससे एक तरफ़ मुनाफ़िक़ों का भेद खुल गया और दूसरी तरफ़ हज़रत सिद्दीक़ा आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा और अह्लै बैते रसूल की शान की अज़्मत का बेनजीर मुज़ाहरा अमल में आ गया कि कुरआन की दस आयतों ने उनकी बरअत के लिए नाज़िल होकर उनकी इस्मत व अज़्मत दोनों पर बेमिसाल मुहरे तस्दीक़ सब्त कर दी।
4. कभी-कभी गन्दे और शरीर (दुष्ट) इंसानों की गन्दी बातें इस दर्जा आब व रंग रखती हैं कि सादा-लौह मुसलमानों और नेक लोगों को भी ग़लतफ़हमियां और धोखे हो जाते हैं। इसके लिए मुसलमान का फ़र्ज़ है कि सुनी सुनाई बात पर उस वक़्त तक हरगिज़-हरगिज़ यक़ीन न करे जब तक कि इस्लामी शहादत के उसूल के मुताबिक़ सुनी सुनाई ख़बर की तस्दीक़ न हो जाए। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि बदगुमानी से बचो, क्योंकि कुछ बदगुमानियां गुनाह करने वाला बना देती हैं।
5. बन्दों के हक़ में अल्लाह ने जो हदें और क़सास और ताज़ीरात मुक़र्रर फ़रमा दिए हैं, जुर्मों के करने पर उन पर मुस्लिम और गैर-मुस्लिम का कोई फ़र्क़ नहीं है और इस्लामी क़ानून की निगाह में इस हैसियत से तमाम मुज्रिम एक जैसे पकड़ के क़ाबिल हैं, इसलिए इफ़्क के वाक़िए में मुनाफ़िक झूठों के साथ तीन मुसलमान (मर्द व औरत) हज़रत हस्सान, हज़रत मिस्तह और हज़रत हमना बिन्त जह्श को भी झूठी तोहमत लगाने के इलज़ाम में कोड़े खाने पड़े।
FAQ — इफ़्क का वाक़िया
1. इफ़्क का वाक़िया क्या था?
इफ़्क का वाक़िया वह दर्दनाक घटना है जिसमें उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर एक झूठा और बेहद संगीन बोहतान लगाया गया था। अल्लाह तआला ने सूरह अन-नूर की आयतों के ज़रिए उनकी पाकदामनी और बरअत को ज़ाहिर फ़रमा दिया।
2. हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर किस तरह का बोहतान लगाया गया?
उन पर बदकारी का झूठा इल्ज़ाम लगाया गया था। यह सरासर इफ़्तिरा और बोहतान था, जिसका कोई सही सबूत या गवाह मौजूद नहीं था।
3. इफ़्क का वाक़िया किस सूरह में बयान हुआ है?
इस वाक़िए के बारे में सूरह अन-नूर की आयत 11 से 20 तक खास तौर पर नाज़िल हुईं, जिनमें बोहतान की सख़्त मज़म्मत और हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बरअत का बयान है।
4. हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बरअत कैसे साबित हुई?
अल्लाह तआला ने वह्य के ज़रिए उनकी पाकदामनी को बयान फ़रमाया। सूरह अन-नूर की आयतों में इस बोहतान को झूठ बताया गया और मुसलमानों को ऐसे इल्ज़ामों के सामने सबूत और चार गवाह की शर्त की याद दिलाई गई।
5. सफ़वान बिन मुअत्तल रज़ियल्लाहु अन्हु कौन थे?
सफ़वान बिन मुअत्तल रज़ियल्लाहु अन्हु सहाबी थे। वह क़ाफ़िले से पीछे रह गए थे। उन्होंने हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा को देखा तो उनकी मदद की और उन्हें क़ाफ़िले तक पहुँचाया।
6. हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा क़ाफ़िले से पीछे कैसे रह गईं?
वह अपना हार तलाश करने के लिए क़ियामगाह से पीछे रह गई थीं। इस दौरान जिस हौदज में वह बैठती थीं, उसे उनके मौजूद न होने का पता चले बगैर ऊंट पर रखकर क़ाफ़िला आगे रवाना हो गया।
7. इफ़्क का बोहतान किसने फैलाया?
इस फ़ित्ने को फैलाने में मुनाफ़िक़ों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई का अहम किरदार था। उसकी तरफ़ से फैलाई गई बात ने लोगों के बीच फ़ितना पैदा करने की कोशिश की।
8. क्या सभी मुसलमानों ने इस बोहतान को सच मान लिया था?
नहीं। बहुत से मुसलमानों ने इसे सच नहीं माना। कुछ लोग सादगी की वजह से इस अफ़वाह में आ गए और उन्होंने इस बात को आगे बयान कर दिया।
9. इफ़्क के वाक़िए से सबसे बड़ी नसीहत क्या मिलती है?
सबसे बड़ी नसीहत यह है कि किसी के बारे में सुनी-सुनाई बात पर फ़ौरन यक़ीन नहीं करना चाहिए। ख़ास तौर पर किसी की इज़्ज़त और पाकदामनी से जुड़ी बात हो तो पूरी तहक़ीक़ के बग़ैर उसे आगे फैलाना बहुत बड़ा गुनाह है।
10. किसी पाकदामन इंसान पर बदकारी का इल्ज़ाम लगाने के बारे में कुरआन क्या कहता है?
कुरआन ने ऐसे इल्ज़ाम के लिए सख़्त हुक्म बयान किया है और चार गवाह पेश करने की शर्त रखी है। बिना गवाह के ऐसा इल्ज़ाम लगाना बेहद संगीन जुर्म है।
11. क्या अफ़वाह फैलाना भी गुनाह है?
जी हाँ। इफ़्क के वाक़िए से मालूम होता है कि बिना तहक़ीक़ किसी बात को आगे बयान करना बहुत ख़तरनाक है। इंसान को चाहिए कि किसी की इज़्ज़त से जुड़ी बात में बेहद एहतियात करे।
12. इफ़्क की आयतों को आयते बरअत क्यों कहा जाता है?
उन्हें आयते बरअत इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन आयतों में हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की उस झूठे बोहतान से बरअत और पाकदामनी का ऐलान हुआ।
13. इफ़्क के वाक़िए से बदगुमानी के बारे में क्या सबक मिलता है?
यह वाक़िया सिखाता है कि मुसलमान को अपने भाई-बहन के बारे में अच्छा गुमान रखना चाहिए और बिना दलील किसी इल्ज़ाम या अफ़वाह को सच नहीं मानना चाहिए।
14. हमें सोशल मीडिया के दौर में इफ़्क के वाक़िए से क्या सबक लेना चाहिए?
आज WhatsApp, Facebook और सोशल मीडिया पर कोई भी ख़बर कुछ ही सेकंड में फैल सकती है। इसलिए किसी की इज़्ज़त, किरदार या निजी ज़िंदगी से जुड़ी बात को बिना तहक़ीक़ शेयर नहीं करना चाहिए। हो सकता है हमारी एक फ़ॉरवर्ड की हुई झूठी बात किसी बेगुनाह की ज़िंदगी मुश्किल बना दे।
15. इफ़्क का वाक़िया मुसलमानों के लिए क्यों अहम है?
क्योंकि इसमें सिर्फ़ हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बरअत का बयान नहीं, बल्कि झूठ, बोहतान, बदगुमानी, अफ़वाह और बिना तहक़ीक़ ख़बर फैलाने से बचने की बहुत बड़ी नसीहत भी मौजूद है।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
खुदा हाफिज़ ….
