21/08/2026
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पर्दे के बारे में लोगों के एतराज़ और उनके जवाब | इस्लाम में पर्दे की हक़ीक़त| Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab | Islam Mein Parde Ki Haqeeqat amazing story

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Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab.
Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

पर्दा इस्लाम की अहम तालीमात में से एक है, लेकिन जब भी पर्दे का मसअला सामने आता है तो लोगों के ज़ेहन में तरह-तरह के सवाल और एतराज़ पैदा होते हैं। कोई कहता है कि असल पर्दा तो आँखों का होता है, कोई इसे तालीम और तरक़्क़ी के रास्ते में रुकावट समझता है, तो कोई इसे औरत के लिए क़ैद के बराबर मानता है।

इसलिए इस लेख में हम पर्दे से जुड़े ऐसे ही आम एतराज़ात को आसान और दोस्ताना अंदाज़ में समझेंगे और उनके जवाब जानने की कोशिश करेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि इस्लाम में पर्दे की असल हक़ीक़त क्या है और इसे किस नज़रिए से समझना चाहिए।

अगर आपके ज़ेहन में भी पर्दे को लेकर ऐसे सवाल आते हैं, तो इस लेख को आखिर तक ज़रूर पढ़िए। उम्मीद है कि कई गलतफ़हमियाँ दूर होंगी और मसअले को समझने में आसानी होगी।

अगर किसी मज्लिस में पर्दे का मसअला छिड़ जाए तो बेपर्दा औरतें तड़प उठती हैं और अपनी बेपर्दगी को जाएज़ साबित करने के लिए तरह-तरह के एतिराज़ात करती हैं। इस तरह बेपर्दगी जाएज़ तो नहीं हो सकती।

अलबत्ता उनके गुनाह की शिद्दत में इज़ाफ़ा हो जाता है। गुनाह को गुनाह समझकर करने वाला अगर तौबा करे तो गुनाह जल्दी माफ़ हो जाता है जबकि गुनाह को जाएज़ समझकर करने वाला तो कुफ्र की हदों तक पहुँच जाता है। हुज्जत क़ायम करने के लिए चंद एतिराजात उनके जवाबात समेत पेश किये जाते हैं :

पहला एतिराज़

चादर या बुर्का पहनने से क्या होता है। असल पर्दा तो आँखों का हुआ करता है?

जवाब : लोग कहते हैं कि पर्दा आँखों का हुआ करता है, उन्हें चाहिए कि फिर नंगे फिरा करें। उन्हें कपड़े पहनने की क्या ज़रूरत है? ज़रा बेलिबास होकर घर की ही औरतों के सामने आए तो खुद ही अक़्ल ठिकाने आ जाएगी। यह एतिराज़ वही औरतें करती हैं जिनकी अक़्ल पर पर्दा पड़ जाता है या जिनके मर्दों की अक़्ल पर पड़ जाता है।

बेपर्दा नज़र आयीं मुझे चंद बीबियाँ अकबर ज़मीं में गैरते क़ौमी से गड़ गया पूछा जो उनसे आपका वो पर्दा क्या हुआ कहने लगीं के अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया

हमारे ख्याल से ऐसे एतिराजात उस वक़्त पैदा होते हैं जब दिल पे गफ़लत का पर्दा पड़ जाता है। आम दस्तूर यही है कि पहले आँखों से पर्दा उतरता है उसके बाद चेहरे से पर्दा उतारा जाता है।

दूसरा एतिराज़
पर्दा तालीम के रास्ते में रुकावट है? रुकावट नहीं है बल्कि मददगार हैं जिन तालीमी इदारों में लड़के लड़कियाँ इकट्ठे तालीम पाते हैं वहाँ आए दिन नए अफ़साने जन्म लेते हैं। लड़कियाँ बन संवरकर अपने हुस्न की ज़कात निकालने आती हैं और लड़के उनकी जादूगरियों की वजह से उन पर डोरे डालने में लगे रहते हैं। न लड़कों की तवज्जेह पढ़ाई की तरफ़ होती है न ही लड़कियों की तवज्जेह पढ़ाई की तरफ़ होती हैं बेचारों को हाल कुछ इस तरह होता है-

किताब खोलकर बैठू तो आँख रोती है वर्क वर्क़ तेरा चेहरा दिखाई देता है और कई जगहों पर तो प्रोफ़ेसर लड़कियों पर कुर्बान होते फिरते हैं-

जब मसीहा दुश्मने जाँ हो तो क्या हो ज़िन्दगी कौन राह बतला सके जब खिज़र बहकाने लगे

इन तमाम मसाइल का बेहतरीन हल यही है कि लड़कियों के तालीमी इदारे अलग हों और लड़कों के तालीमी इदारे अलग हों। लड़के लड़कियाँ एक-दूसरे के चेहरे पढ़ने के बजाए किताबों के पढ़ने में मशगूल रहें।

तीसरा एतिराज़

पर्दा समाजी तरक्की में रुकावट है क्योंकि समाज का आधा हिस्सा मफ़लूज (बेकार) हो जाता है और समाज की तरक्की अपना किरदार अदा नहीं कर सकता।

जवाब : पहली बात तो यह समझने की है कि हम तरक्की किसे समझते है? क्या औरत का सिर्फ़ घर से निकलकर दफ़्तरों में, कल्बों में और पब्लिक मुक़ामात पर आ जाना समाजी तरक्की है या यकसू होकर अपनी उन ज़िम्मेदारियों को अदा करना तरक़्क़ी है जो कुदरत की तरफ़ से उसे दी गई हैं।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

औरत की असल ज़िम्मेदारी यह है कि वह मुआशरे को बेहतरीन नस्ल मुहैय्या करे जो मुस्तक़बिल को बनाने वाली बन सके। यह तभी हो सकता है जब औरत घर में रहकर यकसई के साथ अपनी औलाद की तर्बियत करे।

तरक़्क़ी को यूरोप वालों के मैयार से देखने की ज़रूरत नहीं बल्कि तरक़्क़ी को उस मैयार से देखने की ज़रूरत है जो अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने कायम किया हैं

चौथा एतिराज़ : पर्दा औरतों के लिए कैद की मानिन्द है?

जवाब : क़ैद और पर्दे के अल्फ़ाज़ व मानी में बहुत ज़्यादा
फ़र्क़ है। क़ैद कहते हैं किसी आदमी को उसकी मर्जी व मंशा के ख़िलाफ़ किसी जगह बंद कर देना। जबकि पर्दा कहते हैं औरत का अपनी खुशी से गैर-मर्दों की नज़र से ओझल रहना। कैद का मंशा होता हैं कि लोग उस आदमी के शर से बच जाए जबकि पर्दे का मंशा यह होता है कि औरत गैर-मर्दों के शर. से बच जाए।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

जब कोई आदमी अपना लिबास तब्दील करना चाहे तो वह पसन्द नहीं करता कि दूसरे लोग उसका सतर देखें। लिहाज़ा वह किसी कमरे में या दीवार वगैरह की ओट में लिबास तब्दील कर लेता है तो इसे कैद नहीं कहते पर्दा कहते हैं। मालूम हुआ कि क़ैद मजबूरी में होती है जबकि पर्दा खुशी से होता है।

क़ैद अरमान के जुर्म की सज़ा के तौर पर होती है जबकि पर्दा तो ईनामाते इलाहिया हासिल करने की नीयत से होता है। बस औरत पर्दे में रहकर क़ैद नहीं होती बल्कि बहुत सारी आफ़तों मुसीबतों से आज़ाद हो जाती है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

पाँचवाँ एतिराज़

हरकतें करती हैं? बुर्का तो ढकने की मानिन्द है, बुर्के वालियाँ भी तो ग़लत

जवाब : यह बात ज़हन में बिठा लें कि पर्दे वालियों में भी गड़बड़ बेपर्दगी की वजह से होती हैं अगर वह बेपर्दगी से पूरे तौर पर बच जाए तो गड़बड़ का सवाल ही पैदा नहीं होता। एक नुक़्ता गौर करने के लायक़ है कि अर पर्दे वालियाँ भी थोड़ी-सी बेपर्दगी कर बैठती हैं तो गड़बड़ हो जाती है तो फिर जो औरतें पर्दा करती ही नहीं उनसे क्या कुछ हो जाता होगा। इसलिए देखा गया है कि बेपर्दा फिरने वाली औरतों का अक्सर वक़्त अपने कारनामों पर पर्दा डालने में गुज़र जाता है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

छठा एतिराज़

कुछ औरतें कहती हैं कि हम तीन बच्चों की माँ बन गयी, अब हमें कौन देखता है?

जवाब : देखने वाले तो दस बच्चों की माँ को भी देखने से
बाज़ नहीं आते। फिर तीन बच्चों वाली माँ के क्या कहने। एतिराज़ करने वाली ने कैसे फैसला कर लिया कि अब हमे कौन देखता है। हम कहते हैं कि अगर मान लें किसी ने देख लिया तो शामत तो आपकी ही आएगी। ऐसे बेकार बहानों से बेपर्दगी जाएज़ तो नहीं हो सकती। अगर कोई उनसे सवाल करे कि क्या आप तीन बच्चों की माँ बनने के बाद खाविन्द की तवज्जेह के क़ाबिल नहीं रहीं। अगर खाविन्द की ज़रूरत आपसे पूरी हो सकती है तो फिर गैर मर्द के लिए क्या रुकावट है? हर गिरी पड़ी चीज़ को उठाने वाला कोई-न-कोई होता है।

ये भी पढ़ें:चेहरे का पर्दा क्या इस्लाम में ज़रूरी है? | क़ुरआन और हदीस की रोशनी में पूरा मसला

सातवाँ ऐतिराज़

आप खुद सोचें कि अगर पर्दे वालियों को गैर मर्द इतनी शौकिया नज़रों से देखते हैं तो फिर बेपर्दा फिरने वालियों को कैसी हवसनाक नज़रों से देखते होंगें। हमारे ख्याल से जैसे कसाई बकरी को देखते है इस नज़र से देखते होंगे। दलील इसकी यह है कि पर्दे वाली को देखने से काले कपड़े के सिवा कुछ नज़र नहीं आता मगर बेपर्दा औरत को देखकर तो उन्हें सब कुछ नज़र आ जाता है। यह भी अन्दाजा हो जाता है कि गोश्त कितने किलो है और चर्बी कितने किलो है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

FAQ — पर्दे के बारे में सवाल और जवाब

1. क्या इस्लाम में पर्दा करना ज़रूरी है?
जी हाँ, इस्लाम में औरत को गैर-महरम मर्दों से पर्दे और हया का हुक्म दिया गया है। पर्दा इस्लामी ज़िंदगी का अहम हिस्सा है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

2. क्या सिर्फ़ आँखों का पर्दा काफ़ी है?
सिर्फ़ नज़र नीची करना ही पूरा पर्दा नहीं है। इस्लाम में नज़र की हिफ़ाज़त के साथ लिबास और हया के भी अहकाम हैं।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

3. क्या पर्दा तालीम के रास्ते में रुकावट है?
नहीं। पर्दे के साथ औरत तालीम हासिल कर सकती है। असल बात यह है कि तालीम के दौरान भी शरीअत के आदाब और हया का ख़याल रखा जाए।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

4. क्या पर्दा औरत के लिए क़ैद है?
पर्दे को क़ैद समझना सही नहीं। पर्दा हया, इज़्ज़त और हिफ़ाज़त का ज़रिया है। साथ ही शरीअत ने औरत को अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ बाहर निकलने की भी गुंजाइश दी है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

5. क्या पर्दा करने वाली औरत से भी ग़लती हो सकती है?
बिल्कुल। पर्दा करने वाला इंसान भी इंसान ही है और उससे ग़लती हो सकती है। किसी एक शख़्स की ग़लती की वजह से पर्दे के हुक्म को गलत नहीं कहा जा सकता।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

6. क्या शादीशुदा या बच्चों की माँ होने के बाद पर्दे की ज़रूरत नहीं रहती?
नहीं। उम्र या बच्चों की तादाद से गैर-महरम से पर्दे का हुक्म खत्म नहीं होता। हया और पर्दे का ख़याल रखना ज़रूरी रहता है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

7. क्या पर्दा सिर्फ़ औरतों के लिए है?
नहीं। इस्लाम ने मर्दों को भी नज़रें नीची रखने, हया अपनाने और अपने लिबास व किरदार की हिफ़ाज़त करने का हुक्म दिया है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

8. क्या पर्दे का मक़सद औरत को समाज से अलग करना है?
पर्दे का मक़सद औरत को समाज से काट देना नहीं, बल्कि हया और शरीअत की हदों की हिफ़ाज़त करना है। औरत अपनी ज़रूरत और जायज़ कामों के लिए बाहर जा सकती है, मगर इस्लामी आदाब के साथ।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

9. क्या पर्दे में सिर्फ़ कपड़ा पहनना ही काफ़ी है?
पर्दा सिर्फ़ कपड़े का नाम नहीं। इसमें लिबास के साथ हया, नज़र, बातचीत और व्यवहार में भी शरीअत की पाबंदी शामिल है।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

10. पर्दे का सबसे अहम पैग़ाम क्या है?
पर्दे का मक़सद हया, पाकीज़गी और अल्लाह की इताअत को बढ़ाना है। इसलिए इसे सिर्फ़ एक कपड़े के मसअले के तौर पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल इस्लामी अदब के तौर पर समझना चाहिए।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Parde Ke Baare Mein Logon Ke Aitraaz Aur Unke Jawab
खुदा हाफिज़…..

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