12/07/2026
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बच्चों की सालगिरह मनाना कैसा है इस्लाम में? Bacchon ki Salgirah manana kaisa hai Islam mein

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Bacchon ki Salgirah manana kaisa hai Islam mein
Bacchon ki Salgirah manana kaisa hai Islam mein

बच्चों की सालगिरह

आजकल मुसलमानों के बीच बच्चों की सालगिरह (Birthday) मनाने का रिवाज बहुत आम हो गया है। हालाँकि यह एक गैर-शरई रस्म है। इसमें कोई सवाब नहीं, बल्कि कई ऐसे काम शामिल हो जाते हैं जिनकी वजह से गुनाह का खतरा पैदा हो जाता है।

सालगिरह की महफ़िलों में होने वाली गलतियाँ

अक्सर सालगिरह की महफ़िलों में नाम व नमूद (दिखावा), फिजूलखर्ची और गैर-ज़रूरी रस्मों का रिवाज होता है। कई जगह औरतों की दावत होती है, जहाँ वे पूरी ज़ीनत के साथ शरीक होती हैं, जबकि शौहर के अलावा किसी दूसरे के लिए ज़ीनत करना जायज़ नहीं।
इन महफ़िलों में कई बार नमाज़ों की पाबंदी भी छूट जाती है और इस तरह कई दूसरे गुनाह भी शामिल हो जाते हैं।

सहाबा किराम की ज़िन्दगी से सबक

अगर हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा तथा हज़रत हसन और हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा की सालगिरह नहीं मनाई गई, तो हमें भी इस बारे में सोचने की ज़रूरत है कि क्या हमारे बच्चों का दर्जा उनसे बढ़कर है?

दीन में नई रस्में शुरू करने की चेतावनी

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:
“जिसने दीन में ऐसी नई बात पैदा की जिससे अल्लाह और उसके रसूल राज़ी नहीं, तो उस पर उस काम को करने वालों का भी गुनाह होगा और उनके गुनाहों में कोई कमी नहीं की जाएगी।”(तिर्मिज़ी शरीफ़)

मुसलमानों की ज़िम्मेदारी

अल्लाह तआला ने जिन मुसलमानों को दीन की समझ और अमल की तौफीक़ दी है, उन्हें चाहिए कि अपने घरों और समाज में दीन की बातें फैलाएँ और लोगों को सही इस्लामी तालीम से जोड़ें।

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हु से फ़रमाया:
“अगर तुम्हारे ज़रिये एक व्यक्ति को भी हिदायत मिल जाए, तो यह तुम्हारे लिए लाल ऊँटों से भी बेहतर है।”

नतीजा

मुसलमानों को चाहिए कि वे गैर-शरई रस्मों से बचें और अपनी ज़िन्दगी को कुरआन व सुन्नत के मुताबिक़ बनाने की कोशिश करें। दुनिया की दिखावे वाली रस्मों की बजाय आख़िरत की तैयारी को अपनी प्राथमिकता बनाएँ।

अल्लाह से एक दिली दुआ

ऐ अल्लाह!
तू हमें सिर्फ़ सुनने और कहने वालों में नहीं, बल्कि अमल करने वालों में शामिल फ़रमा। हमें सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फ़रमा। हमें हज़रत मुहम्मद ﷺ से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फ़रमा। हमारा ख़ातिमा ईमान पर फ़रमा और हमें इस्लाम व ईमान पर ज़िन्दा रख। आमीन या रब्बल आलमीन।

इल्म को आगे पहुँचाइए

प्यारे भाइयों और बहनों! अगर यह बयान आपके दिल को छू गया हो, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुँचाइए। हो सकता है कि अल्लाह तआला आपकी वजह से किसी को हिदायत दे दे और यह आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
जज़ाकल्लाहु ख़ैर।

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