अल्लाह तआला की नजदीकियां कैसे हासिल हो?
जब तक इनसान गुनाहों को न छोड़े उस वक़्त तक उसको अल्लाह की नजदीकी हासिल नहीं हो सकती। ज़ेहन में रख लेना, दिल के कानों से सुन लेना, अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त पाक हैं और गुनाहों की गंदगी होती है।
जिस इनसान के बदन पर गुनाहों की गंदगी लगी हुई होगी यह नापाक इनसान अल्लाह के साथ ताल्लुक नहीं जोड़ सकता। उस पाक ज़ात के साथ जुड़ने के लिए इनसान को गंदगी और नापाकी से पाक होना पड़ता है। लिहाज़ा गुनाहों से माफी माँगनी निहायत ज़रूरी है।
यूँ सोचिए कि अगर सत्रह कबीरा गुनाह लिखे गये तो हम अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त से सत्रह कदम दूर खड़े हैं। अगर हम सत्रह गुनाह करते हैं। अगर उनमें से हमने कुछ गुनाह छोड़ दिये तो हम उनके ही करीब हो गये। जिसने पन्द्रह गुनाह छोड़ दिये वह पन्द्रह कदम करीब हो गया, जिसने सत्रह गुनाह छोड़ दिये वह अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त के साथ मिल गया।
तो इस काग़ज़ के आईने में हम अपनी हैसियत देख सकते हैं कि हम अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त से कितने दूर हैं या कितने करीब हैं। खुशनसीब हैं वे औरतें जो अपनी ज़िन्दगी को सब गुनाहों से बचायें और सच्ची माफी माँग कर अपने रब को मनायें।
खूबसूरत वाक़िआ:आपका घर जन्नत में होगा या जहन्नम में? Aapka Ghar Jannat mein hoga ya jahannum mein.
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
