28/01/2026
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नेक औलाद बेहतरीन सदका-ए-जारिया। Nek aulad behtarin sadke jariya.

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Nek aulad behtarin sadke jariya.
Nek aulad behtarin sadke jariya.

हदीस पाक में आता है कि जब इनसान इस दुनिया से चला जाता है तो उसके अमल का सिलसिला टूट जाता है सिवाये तीन अमलों के, उनमें से एक अगर उसने अल्लाह के रास्ते में सदका किया तो सदका-ए-जारिया बराबर जारी रहने वाले सदके का सवाब उसे मिलता रहता है।

और दूसरा अगर उसने अपने इल्म से दूसरों को फायदा पहुँचाया तो यह भी उसको सवाब मिलता रहता है। और तीसरा हदीस पाक में फरमाया “नेक औलाद” अगर उसने अपने पीछे नेक औलाद छोड़ी, औलाद का जितना भी अमल होगा उनके अज्र के मुताबिक औलाद को भी मिलेगा और अल्लाह तआला उनके माँ-बाप के नामा-ए-आमाल में भी लिखेंगे।

बल्कि बाज़ रिवायतों में आता है कि बच्चा जब दुनिया में पैदा होता है उस वक़्त से लेकर मरने तक अगर वह नेक बना तो जितनी मर्तबा दुनिया में साँस लेता है हर-हर साँस के बदले उसके माँ-बाप को अज्र दिया जाता है। इसी लिये औलाद माँगें तो हमेशा नेक माँगे।

हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम दुआयें माँग रहे हैं। अल्लाह तआला की शान देखिये कि बीबी मरियम मस्जिद की मेहराब में हैं, ज़करिया अलैहिस्सलाम उनको छोड़कर कहीं दावत के काम पर चले गये। देर से ज़रा वापस आये तो उनको बे-मौसम के फल खाते हुए देखा।

पूछाः ऐ मरियम ! ये फल कहाँ से आये? हज़रत मरियम ने जवाब दिया कि यह अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त की तरफ से। जब मरियम ने यह बात कही कि बे मौसम के फल मुझे परवर्दिगार ने अता किये अब दिल में बेटे की तमन्ना तो थी ही, दुआयें तो पहले भी माँगते थे, लेकिन मौके के मुताबिक फिर दिल में याद आ गई।

कुरआन ने बतला दियाः ज़करिया अलैहिस्सलाम को अपनी बात याद आ गई और इस मौके पर उन्होंने अपने रब से पुकार की, दुआ कीः ऐ अल्लाह! मुझे भी पाक नेक बेटा अता फरमा दे। ऐ अल्लाह ! आप मरियम को बे मौसम के फल दे सकते हैं मैं भी बूढ़ा हो चुका हूँ। मेरी भी औलाद का मौसम तो नहीं मगर मुझे भी बे मौसम का फल अता कीजिये। अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त ने दुआ को उसी वक़्त कबूल फ़रमाया।

खूबसूरत वाक़िआ:-वो माँ जिसने वुज़ू की हालत में दूध पिलाया |

हज़रत ज़करिया को फरिश्ते ने आकर बतायाः बेटा भी दिया तो यहया अलैहिस्सलाम ऐसा नाम जो पहले कभी किसी ने रखा नहीं। और फिर यह भी फरमा दिया कि यह इतना पाकबाज़ होगा कि यह औरतों से एक तरफ रहने वाला, अल्लाह का नबी नेकोकार होगा। अल्लाह तआला औलाद भी देते हैं और नेकोकार भी देते हैं, यही सबसे बड़ी तमन्ना होती है।

चुनाँचे बाप की दुआ कुरआन मजीद में आपने सुन ली, कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने भी दुआयें माँगीं और हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम ने भी दुआयें माँगीं। आख़िरकार अल्लाह रब्बुल्- इज़्ज़त ने उनको नेक बच्चे अता फरमाये। चुनाँचे कब से यह दुआयें शुरू होती हैं? कुरआन मजीद की तरफ रूजू करें।

हज़रत इमरान की बीवी थीं उनको उम्मीद हो गई, गर्भ ठहर गया, अब जिस वक़्त से उम्मीद लग गई उन्होंने अपने दिल में नीयत की, कुरआन मजीद में वह खूबसूरत नीयत नकल की गयी है। फरमाने लगींः हज़रत इमरान की बीवी पूरी आजिज़ी के साथ दुआ करने लगीं, अपने परवर्दिगार के सामने दामन फैलाकर दुआ माँगी ऐ मेरे मालिक ! जो कुछ मेरे पेट में है मैंने उसको तेरे दीन के लिये वक़्फ़ (समर्पित) कर दिया।

ऐ अल्लाह ! उसको मेरी तरफ से कबूल फरमा ले। अभी तो बच्चे की पैदाईश भी नहीं हुई अभी तो सिर्फ बुनियाद पड़ी है। उम्मीद लगी है, मगर माँ को उस वक़्त से फिक्र होती है कि मेरी होने वाली औलाद नेक बन जाये। चुनाँचे उन्होंने उस वक़्त दुआ माँगीः ऐ मेरे रब ! जो कुछ मेरे पेट में है मैंने उसको तेरे दीन के लिये वक़्फ़ (समर्पित) कर दिया। ऐ अल्लाह ! उसको मुझसे (मेरी तरफ से) कबूल फरमा ले। (सूरह इमरान)

तो सोचिये नेक औलाद के लिये माँ-बाप कब से दुआयें माँगनी शुरू कर देते हैं।

अनमोल मोती

उलेमा ने लिखा है कि कुरआन मजीद की यह आयत अगर कोई भी औरत हमल (गर्भ) के बाद कसरत के साथ पढ़ेगी तो अल्लाह रब्बुल्-इज़्ज़त उसको नेक और पाक औलाद अता फरमायेंगे। और यह हमारे बुजुर्गों का दस्तूर रहा है और उन्होंने तस्दीक भी की कि जो हामिला (गर्भवती) औरत भी हमल के दिनों में इस आयत को पढ़ती रहती है समय-समय पर तो उसकी नेक-नीयती की वजह से अल्लाह तआला उसको नेक औलाद अता फरमाते हैं।

यहाँ से माँ-बाप की दुआयें हैं। अभी बच्चे की बुनियाद पड़ रही है। और कब तक माँ-बाप की तमन्नायें रहती हैं कि औलाद नेक बन जाये, जब तक इस दुनिया से रुख़्सत न हो जाये। चुनाँचे कुरआन पाक की तरफ रुजू करें।

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

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