हिकायात में बयान किया जाता है कि हज़रत उमर इब्ने अल्-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने अपने ज़मान-ए-ख़िलाफ्त में हज़रत हुजैफा बिन यमान रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मुलाक़ात की तो हज़रत हुज़ैफ़ा रजियल्लाहु तआला अन्हु से पूछाः ऐ हुजैफा!
तुमने किस हाल में सुब्ह की? फरमायाः ऐ अमीरुल मोमिनीन! फ़ितने से मुहब्बत करता हूँ, अ-हक़ को पसन्द करता हूँ, जो चीज़ पैदा नहीं हुई उसका काइल हूँ, जो नहीं देखा उसकी गवाही देता हूँ, बगैर वुज़ू के नमाज़ अदा करता हूँ, ज़मीन में मेरे पास एक ऐसी चीज़ है जो अल्लाह तआला के पास आसमान में नहीं है।
तो हज़रत उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु इस बात पर सख्त गुस्सा हुए और इरादा किया कि उनको सख्त सज़ा दें फिर आप आंहज़रत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के यहाँ सहाबियात का लिहाज़ करके रुक गये, आप इसी कश्मकश में थे कि आप के पास से हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु तआला अन्हु गुज़रे तो उनके चेहरे से गुस्से को भांप गये और अर्ज़ किया ऐ अमीरुल मोमिनीन! आपको किसने गुस्सा आलूद किया है?
तो उन्होंने सारा क़िस्सा बयान किया। हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने फरमायाः ऐ अमीरुल मोमिनीन! आपको यह बात गुस्सा न दिलाए। यह यानी हुजैफा फितने को पसन्द करते हैं। इससे मुराद अल्लाह तबारक व तआला का यह फरमान है: यह औलाद और माल को पसन्द करते हैं, उनकी मुराद यही है फितने से।
उनका यह कहना है कि वह हक़ को पसन्द नहीं करते तो हक़ से मुराद मौत है, जिससे कोई चारा नहीं। उनका यह कहना है कि वह ही कहते हैं जो पैदा नहीं हुआ मुराद उससे कुरआन पाक है जो पैदा शुदा नहीं बल्कि अल्लाह पाक की सिफत कलाम है।
उनका यह कहना है कि उसको गवाही देता हूँ जिसको देखा नहीं। यह अल्लाह तआला की तस्दीक़ कर रहे हैं जिसको उन्होंने नहीं देखा। उनका यह कहना है कि बगैर वुज़ू के नमाज़ अदा करता हूँ तो यह बगैर वुजू के हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर सलात यानी दुरूद पढ़ते हैं और दुरूद का बगैर वुज़ू पढ़ना गुनाह नहीं।
खूबसूरत वाक़िआ:-क़ब्रिस्तान जाने के आदाब।
उनका यह कहना है के उनके पास ज़मीन में वह है जो अल्लाह के लिए आसमान में नहीं है। वह इस तरह से कि हुजैफा रजियल्लाहु तआला अन्हु की बेटी भी है और बीवी भी, जबकि अल्लाह तआला के पास न बेटे हैं न बीवी तो हज़रत उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने फरमायाः ऐ अबुल हसन ! यह हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की कुन्नियत है तेरी ख़ूबी अल्लाह तआला के लिए है तुमने मेरी बहुत बड़ी फिक्र ख़त्म कर दी है।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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