एक रोज़ शैतान हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पास आया, आप ने उससे दरियाफ़्त फ़रमाया, भला यह तो बतला वह कौन सा काम है जिस के करने से तू आदमी पर ग़ालिब आ जाता है, उसने जवाब दिया कि जब आदमी अपनी ज़ात को बेहतर समझता है और अपने अमल को बहुत कुछ समझता है और अपने गुनाहों को भूल जाता है,
ऐ मूसा ! मैं आप को तीन ऐसी बातें बताता हूँ जिन से आप को डरते रहना चाहिए, एक तो गैर महरम औरत के साथ तनहाई में न बैठना, क्यूँकि जब कोई शख़्स तनहाई में गैर महरम औरत के साथ बैठता है, तो उनके साथ तीसरा मैं होता हूँ,
यहाँ तक कि औरत के साथ उस को फितने में डाल देता हूँ दूसरे अल्लाह तआला से जो अहद करो उस को पूरा किया करो क्योंकि जब कोई अल्लाह से अहद करता है तो उसका हमराही मैं होता हूँ यहाँ तक कि उस शख़्स और वफा-ए-अहद के दरमियान में हाएल हो जाता हूँ।
तीसरे जो सदका निकाला करो उसे जारी कर दिया करो क्यूंकि जब कोई सदका निकालता है तो उसे जारी नहीं करता तो मैं उस सदके को पूरा करने के बीच में हाएल हो हो जाता हूँ, यह कह कर शैतान चल दिया और तीन बार कहा हाए अफ़सोस !
मैंने अपने राज़ की बातें मूसा से कह दीं वह बनी आदम को डराएगा!(तलबीस इब्लीस सः 39)
अपनी ज़ात को बेहतर समझना, इसी बात से शैतान खुद हलाक हुआ, क्यूँकि उसने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से अपने को बेहतर समझा था, दीन व मज़हब तवाजुओं व इंकिसार सिखाता है, लेकिन दुनिया फख्र व अनानियत सिखाती है यही वजह है कि अहले दुनिया अहले दीन को नज़रे हिकारत से देखते हैं और उन पर फब्तियाँ कसते हैं और उनकी हरकत से शैतान खुश होता है कि वह उस जैसा काम कर रहे हैं।
अपने अमल को भी बहुत ज़्यादा नहीं समझना चाहिए, उमर भर एक एक लम्हा भी खुदा की याद में गुज़ारा जाये तो भी कुछ नहीं और खुदा के बेशुमार इनआमात् के मुकाबले में उसकी कोई वक्अत नहीं, हर हाल में अमल करो और नज़र खुदा के फज़्ल व करम पर रखो और अमल करके अपने से ऊपर के लोगों को देखो ताकि अमल करके गुरूर पैदा न हो,
मस्लन अगर पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ी है तो बुजुरगाने दीन की तरफ देखे जिन्होंने पाँच नमाजों के इलावा तहज्जुद की नमाजें और दीगर नवाफिल भी पढे हैं, इस तरह अपने अमल का “बहुत कुछ” होना नजर में न रहेगा, किसी गैर महरम औरत के साथ तनहाई में बैठना बहुत खतरनाक काम है,
ऐसी तनहाई में शैतान ज़रूर पहुँचता है, और अपना रंग दिखाता है, आज कल नई तहज़ीब ने शैतान का यह काम बड़ा आसान कर दिया है, खुदा तआला से हमारा हर अहद पूरा होना चाहिए, और शैतान के बस में आकर इस मिसर पर अमल न करना चाहिए कि- वह वादा ही क्या जो वफा होगया!
और सदका व खैरात में ताखीर हरगिज़ न करनी चाहिए, ताकि शैतान को रूकावट डालने का मौका न मिल सके।
सदका व खैरात शैतान के लिए ऐसा है, जैसे लकड़ी के लिए आरा, लिहाज़ा शैतान को जितनी जल्दी हो सके उस आरे के नीचे ले आना चाहिए।
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे, हमे एक और नेक बनाए, सिरते मुस्तक़ीम पर चलाये, हम तमाम को नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और इताअत की तौफीक़ आता फरमाए, खात्मा हमारा ईमान पर हो। जब तक हमे ज़िन्दा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे, आमीन ।
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क्या पता अल्लाह ताला को हमारी ये अदा पसंद आ जाए और जन्नत में जाने वालों में शुमार कर दे। अल्लाह तआला हमें इल्म सीखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की तौफीक अता फरमाए । आमीन ।
खुदा हाफिज…
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