Dua Mangne Ka Sahi Tarika: 43 Sunnat Tareeke
दुआ मोमिन का सबसे बड़ा हथियार और अल्लाह तआला से अपना रिश्ता मज़बूत करने का बेहतरीन ज़रिया है। लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि दुआ माँगने का सही तरीका क्या है, दुआ के आदाब क्या हैं और किन बातों का ख़याल रखने से दुआ जल्दी क़ुबूल होती है। कुरआन-ए-करीम और सहीह हदीसों में दुआ के ऐसे उसूल और आदाब बताए गए हैं जो हर मुसलमान के लिए जानना बेहद ज़रूरी हैं।
इस आर्टिकल में आप दुआ माँगने के 43 अहम आदाब, दुआ की क़ुबूलियत की शर्तें, दुआ करते समय की सुन्नतें, किन गलतियों से बचना चाहिए और नबी-ए-करीम ﷺ की तालीमात की रोशनी में दुआ का मुकम्मल तरीक़ा जानेंगे। अगर आप चाहते हैं कि आपकी दुआएँ अल्लाह तआला की बारगाह में ज़्यादा पसंदीदा और क़ुबूलियत के क़रीब हों, तो इस आर्टिकल को आखिर तक ज़रूर पढ़ें।
दुआ माँगने के तरीकों का बयान
दुआ माँगने के कुछ आदाब तो रुक्नियत के दर्जे को पहुँचते हैं ‘ और कुछ शर्त के दर्जे को यानी बाज़ रुक्न है और बाज़ शर्त और कुछ “मामूरात” हैं यानी जिन के करने का हुक्म दिया गया है और कुछ “मनहिय्यात” यानी जिन्हें करने से रोका गया है वह आदाब यह हैं।
“रुकन” से मुराद वह काम जिस पर दुआ के कबूल होने न होने का मदार हो, जिन्हें दुआ की रूह और जान कह सकते हैं। जैसे “इखलास ” कि इस के बिना दुआ, दुआ ही नहीं होती।
“शर्त” वह चीज़ जिस पर दुआ की कबूलियत निर्भर हो कि अगर वह न पायी जाये तो दुआ कबूल ही न हो, अगरचें कितने ही इखलास से की जाये। जैसे हराम चीज़ों यानी हराम खान-पान, हराम पहनावा, हराम रोज़ी से बचना, कि अगर यह शर्त न पाई जाएगी और दुआ करने वाला इन हराम चीज़ों का इस्तेमाल न छोड़ेगा तो दुआ कबूल न होगी, जैसा कि हदीस शरीफ में इस की वज़ाहत मौजूद है।
“मामूरात” से मुराद वह बेहतरीन काम और अच्छी सूरतें हैं जो दुआ को ज़्यादा से ज़्यादा कारगर और कबूल होने लायक बना देती हैं, इसलिये नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इनको करने का हुक्म दिया है। अगर इन पर न अमल किया जाये तब भी दिल से निकली हुयी दुआ अल्लाह ने चाहा तो कबूल हो जायेगी।
जैसे, दुआ माँगते समय दोनों घुटनों के बल बैठना, या किब्ला की तरफ मुँह कर के बैठना कि यह चीजें अल्लाह की तरफ तवज्जुह अदब और एहतराम की पहचान हैं, अगरचे दुआ के कबूल होने या न होने का दारो मदार इन पर नहीं है।Dua Mangne Ka Sahi Tarika: 43 Sunnat Tareeke
“मनहिय्यात” से मुराद वह नापसन्दीदा काम, या दुआ माँगने के वह तरीके जो दुआ के मुनासिब, या अल्लाह तआला के शायाने शान नही है, जैसे, दुआ माँगते समय आसमान की ओर आँख उठाना और देखना, इस तरह की दुआ, दुआ की वह बुरी शक्ल है जिस से नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मना फरमाया है इसलिये कि यह तरीक़ा अल्लाह के एहतराम और दुआ माँगने वाले के लिये सही नही है। हो सकता है कि वह तरीक़ा बे अदबी, गुस्ताखी बन कर दुआ को कबूल होने से रोक दे, इसलिये इन से बचना चाहिये। ताहम वह दुआ के कबूल होने में रुकावट नहीं है।
यह तमाम आदाब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मन्कूल हैं लेकिन लिखने वाले ने अपने अल्फाज़ में इन को बयान किया है और हर अदब से मुतअल्लिक हदीस के हवाले हदीस की किताबों के इशारों में दिये हैं। हम ने मुख्तसर में इन इशारों को भी छोड़ दिया है और हिस्ने हसीन किताब के अन्दाज़ में ही उन तमाम आदाब का तर्जुमा कर दिया है। सिर्फ नंबर शुमार का इजाफा किया है।
यह कुल 43 आदाब हैं जिन में कुछ दुआ के अरकान हैं और कुछ शरतें, कुछ ऐसे हैं जिन के करने का हुक्म आया है और कुछ को करने से मना किया गया है। पढ़ने वालों की सहूलत के हिसाब से और उन की जानकारी की गरज से हम ने हर अदब के सामने बिरैकट के दर्मियान उन का हुक्म लिख दिया है कि यह रुक्न है और यह शर्त, और मामूरात यानी जिन को करने का हुक्म दिया गया है के लिये “मुस्तहब” का शब्द लिखा है और “मनहिय्यात यानी जिन को करने से रोका गया है के लिये “मकरुह”।
1) खाने, पीने, पहनने और हराम कमाने (यानी रोजी कमाने के हराम जरीये) से बचना। (शर्त)
2) अल्लाह तआला के लिये इखलास (रुकन)
3) दआ माँगने से पहले कोई नेक काम करना (जैसे सदका देना या नमाज़ पढ़ना वगैरह) सख्तियों और मुसीबतों के समय खास तौर पर अपने नेक कामों का जिक्र करना (यानी उन के वास्ते से दुआ माँगना। (मुस्तहब)
4) नापाकी, गन्दगी और पलीदी से पाक और मैल-कुचैल से साफ सुथरा होना। (मुस्तहब)
5) वुजू करना। (मुस्तहब)Dua Mangne Ka Sahi Tarika: 43 Sunnat Tareeke
6) किब्ला की ओर मुँह करना। (मुस्तहब)
7) दुआ माँगने से पहले नमाज़ हाजत पढ़ना (मुस्तहब)
8) दुआ के लिये दोनों घुटनों के बल बैठना (मुस्तहब)
9) दुआ माँगने से पहले और बाद में अल्लाह तआला की हम्द व सना करना (मुस्तहब)
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10) इसी तरह दुआ के अव्वल और अखिर में नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दुरूद व सलाम भेजना (मुसत्हब)
11) दोनों हाथों को फैला कर दुआ माँगना (मुस्तहब)
12) सवाल करने वाले की तरह दोनों हाथ ऊपर उठाना (मुस्तहब) :
13) दोनों हाथों को मोंढों तक उठाना (मुस्तहब)
14) दोनों हाथों को खुला रखना (मुस्तहब)
15) दुआ के समय कौली और अमली तौर पर अल्लाह की शान के मुताबिक उस के आदाब और एहतराम को इख़्तियार करना (मुस्तहब)
16) दुआ माँगने में आजिज़ी और इन्किसारी इख़्तियार करना (मुस्तहब )
17) गिड़गिड़ाना (मुस्तहब)
18) दुआ माँगने के समय आसमान की ओर नज़र उठाना (मक्रूह)Dua Mangne Ka Sahi Tarika: 43 Sunnat Tareeke
19) अल्लाह पाक के “अस्माए हुस्ना” और उस की खूबियों और अच्छाइयों का वास्ता दे कर दुआ माँगना (मुस्तहब)
20) दुआ में तकल्लुफ से काफ़िया बन्दी से परहेज़ न करना (मकरूह)
21) दुआ में जान बूझं कर गाने की तरह अच्छी आवाज इख़्तियार करना (मकरूह)
22) नबियों के वसीले से दुआ माँगना (मुस्तहब)
23) अल्लाह के नेक बन्दों उस के वलियों के वसीले से दुआ माँगना (मुस्तहब)
24) दुआ में आवाज़ को पस्त यानी नीची आवाज़ में दुआ माँगना (मुस्तहब )
25) अपने गुनाहों का इनकार स्वीकार करना (मुस्तहब)
26) नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जो दुआएँ सहीह हदीसों से साबित हैं उन्हीं को इख़्तियार करना, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किसी दूसरे को बतलाने की ज़रूरत ही नहीं छोड़ी है यानी वह तमाम जरुरतें जिन के लिये इन्सान दुआ मांगता है आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने न सब के लिये दुआएँ बतला दी हैं (मुस्तहब)
27) ठोस और जामे यानी तमाम जरुरतो को शामिल दुआएँ इख्तियार करना (मुस्तहब)
28) अपनी ज़ात से दुआएँ शुरू करे, फिर अपने माँ-बाप और सारे मोमिन भाइयों के लिये दुआ करे। यानी पहले अपने लिये फिर एक के बाद दूसरे के लिये पद के लिहाज़ से दुआ माँगे (मुस्तहब)
29) अगर इमाम हो तो अकेले अपने लिये दुआ न माँगे, बल्कि अपने और तमाम मुक्तदियों के लिये दुआ माँगे (जैसे “मेरी” के जगह पर “हमारी” और “मैं” के जगह पर “हम” के लफ्ज़ का इस्तेमाल करे। (मुस्तहब)
30) पूरे भरोसे के साथ और यकीनी तौर पर दुआ माँगना कि अल्लाह तआला दुआ हकीकत में कबूल करते हैं और मैं बिला किसी खटक के दुआ माँगता हूँ और दुआ को अपनी तरफ से किसी चीज़ पर मौकूफ भी न करे यानी यह न कहे कि अगर तू चाहे तो मेरा कर्ज़ अदा कर दे, बल्कि इस तरह माँगे “मेरे मौला! मेरा कर्ज़ अदा कर दे”) (रुक्न)
31) बड़े शौक और ध्यान से दुआ माँगे (बेतव्वजुही से न माँगे) (मुस्तहब)Dua Mangne Ka Sahi Tarika: 43 Sunnat Tareeke
32) दिल की गहराइयों से पूरी कोशिश और मेहनत से दुआ माँगे और दिल (दुआ की तरफ) पूरी तरह मुतवज्जह हो और अल्लाह से पूरी उम्मीद रखे। (रूक्न)
33) (एक ही मक्सद और मुराद के लिये) बार-बार दुआ माँगे (मुस्तहब)
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एक ही दुआ बार-बार माँगने का कम से कम दर्जा तीन मर्तबा है (यानी हर दुआ कम से कम तीन मर्तबा माँगे) (मुस्तहब)
35) किसी दुआ पर इसरार न करे (कि मेरी यह दुआ तो तुझे कबूल करनी ही होगी) (मक्रूह)
36) किसी गुनाह की बात या रिश्ता-नाता तोड़ने की दुआ न करे। (शर्त)
37) जो चीज़ पहले ही हो चुकी है उस के खिलाफ दुआ न माँगे (जैसे, मेरे मौला! तू मुझे औरत से मर्द, या मर्द से औरत बना दे) (शर्त)
38) दुआ में हद से आगे न बढ़े कि किसी न मुमकिन और न होने वाली चीज़ के लिये दुआ माँगे। (शर्त)
39) अल्लाह की रहमत में तन्गी न करे (यानी यह न कहे कि मेरे मौला ! तू केवल मुझे ही माफ कर दे और किसी को माफ न कर) (मक्रूह)
40) अपनी सब जरुरतें (छोटी हों या बड़ी कितनी ही हल्की क्यों न हों) अल्लाह ही से माँगे। (मुस्तहब)
41) दुआ माँगने वाला और सुनने वाला दोनों आमीन कहें। (मुस्तहब)Dua Mangne Ka Sahi Tarika: 43 Sunnat Tareeke
42) दुआ पूरी करने के बाद दोनों हाथों को मुँह पर फेरे। (मुस्तहब)
43) दुआ के कबूल होने में जल्द बाज़ी न करे, जैसे यूँ न कहे, “दुआ पूरी होने में ही नहीं आती” या “मैं ने दुआ की थी लेकिन कबूल ही नही हुयी” (शर्त)
FAQ (सवाल व जवाब)
1. दुआ कब सबसे ज़्यादा क़ुबूल होती है?
दुआ कई मुबारक औक़ात में ज़्यादा क़ुबूल होती है, जैसे तहज्जुद का वक़्त, अज़ान और इक़ामत के बीच, सज्दे में, जुमे के दिन, रोज़ेदार की इफ्तार के वक़्त और सफ़र के दौरान।
2. दुआ क़ुबूल होने की सबसे अहम शर्त क्या है?
सबसे अहम शर्त इख़लास (ख़ालिस नियत) और हलाल रोज़ी है। हराम कमाई और गुनाहों पर ज़िद दुआ की क़ुबूलियत में रुकावट बन सकती है।
3. क्या दुआ से तक़दीर बदल सकती है?
हदीस शरीफ़ में आया है कि दुआ तक़दीर के फैसले को टालने का ज़रिया बन सकती है, इसलिए हर मुसलमान को हमेशा दुआ करते रहना चाहिए।
4. दुआ माँगने का सही तरीका क्या है?
दुआ से पहले वुज़ू करना, क़िब्ले की तरफ़ रुख करना, अल्लाह की हम्द और नबी ﷺ पर दुरूद पढ़ना, दोनों हाथ उठाना, पूरे यक़ीन और इख़लास के साथ दुआ करना सुन्नत तरीक़ा है।
5. क्या अपनी ज़बान में दुआ माँग सकते हैं?
हाँ, इंसान अपनी ज़रूरत के मुताबिक अपनी भाषा में भी दुआ कर सकता है। हालांकि, कुरआन और सहीह हदीसों में आई हुई दुआएँ पढ़ना सबसे बेहतर है।
6. दुआ के बाद आमीन कहना चाहिए?
जी हाँ, दुआ के बाद “आमीन” कहना सुन्नत है और अल्लाह से दुआ की क़ुबूलियत की उम्मीद रखनी चाहिए।
7. दुआ क़ुबूल न होने की वजह क्या हो सकती है?
हराम कमाई, गुनाहों पर इसरार, रिश्ते तोड़ना, जल्दबाज़ी करना, और अल्लाह से मायूस होना दुआ की क़ुबूलियत में रुकावट बन सकते हैं।
8. क्या बार-बार एक ही दुआ माँगना सही है?
जी हाँ। नबी-ए-करीम ﷺ से साबित है कि एक ही दुआ को बार-बार माँगना पसंदीदा अमल है। अल्लाह से लगातार उम्मीद के साथ दुआ करनी चाहिए।
9. क्या दुआ के लिए हाथ उठाना ज़रूरी है?
हाथ उठाकर दुआ करना सुन्नत और मुस्तहब है, लेकिन बिना हाथ उठाए भी दुआ की जा सकती है।
10. दुआ माँगते समय किन बातों से बचना चाहिए?
दुआ में तकल्लुफ़, गुनाह की दुआ, रिश्ते तोड़ने की दुआ, आसमान की तरफ़ लगातार नज़र उठाना, और क़ुबूलियत से मायूस होना—इन सब से बचना चाहिए।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
