सब्र और उसका तरीक़ा
नफ़्स को दीन की बात पर पाबंद रखना और दीन के खिलाफ उससे कोई काम न होने देना, इसको सब्र कहते हैं और इसके कई मौके हैं
एक मौका यह है कि आदमी चैन अमन की हालत में हो। अल्लाह तआला ने सेहत दी हो। माल व दौलत, इज़्ज़त व आबरू, नौकर-चाकर, आल-औलाद, घर-बार, साज़-सामान दिया हो, ऐसे वक़्त का सब्र यह है कि दिमाग खराब न हो, अल्लाह तआला को न भूल जाए, गरीबों को हकीर न समझे, उनके साथ नर्मी और एहसान करता रहे।
दूसरा मौका इबादत का वक़्त है कि उस वक़्त नफ़्स सुस्ती करता है, जैसे नमाज़ के लिए उठने में या नफ़्स कंजूसी करता है जैसे ज़कात-खैरात देने में। ऐसे मौके पर तीन तरह का सब्र करना चाहिए- एक इबादत से पहले की नीयत दुरूस्त रखे।
अल्लाह ही के वास्ते वह काम करे, नफ़्स की कोई ग़ज़ न हो। दूसरे इबादत के वक़्त कि कम-हिम्मती न हो। जिस तरह इबादत का हक़ है, उसी तरह अदा करे। तीसरी इबादत के बाद कि उसको किसी के सामने ज़िक्र न करे।
तीसरा मौका गुनाह का वक़्त है। उस वक़्त का सब्र यह है कि नफ़्स को गुनाह से रोके।
चौथा मौका वह वक़्त है कि उस शरअ को कोई मख्लूक तक्लीफ पहुंचाए, बुरा-भला कहे। उस वक़्त का सब्र यह है कि बदला न ले, खामोश हो जाए।
पांचवां मौका मुसीबत, बीमारी, माल के नुक्सान या किसी क़रीबी अज़ीज़ के मर जाने का है। उस वक़्त का सब्र यह है कि जुबान से शरअ के ख़िलाफ कलमा न कहे बयान करके न रोये।
खूबसूरत बयान:इस्तिन्जे का बयान और दुआ | istinje ka bayan aur Dua.
तरीक़ा सब किस्म के सब्रो का यह है कि इन सब मौकों के सवाब को याद कर ले और समझे कि ये सब बातें मेरे फायदे के वास्ते हैं और सोचे कि बे-सब्री करने से तक़दीर तो टलती नहीं, ना-हक सवाब भी क्यों खोया जाए।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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