08/02/2026
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सहरी खाने इफ़्तार और करने का बयान|Sehri khane aur Iftar karne ka bayan.

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Sehri khane aur Iftar karne ka bayan.
Sehri khane aur Iftar karne ka bayan.

सहरी खाने इफ़्तार और करने का बयान

मस्अला 1:- सहरी खाना सुन्नत है और भूख न हो और खाना न खाये, तो कम से कम दो-तीन छोहारे ही खाले या कोई और चीज़ थोड़ी बहुत खा ले, कुछ न सही तो थोड़ा सा पानी ही पीले।

मस्अला 2 :- अगर किसी ने सहरी न खायी, उठ कर एक आध पान ही खा लिया तो भी सहरी खाने का सवाब मिल गया।

मस्अला 3 :- सहरी में जहां तक हो सके, देर करके खाना बेहतर है, लेकिन इतनी देर न करे कि सुबह होने लगे और रोज़े में सुबह पड़ जाये।

मस्अला 4:- अगर सहरी बड़ी जल्दी खा ली, मगर उसके बाद पान-तम्बाकू, चाय-पान बड़ी देर तक खाती-पीती रही, जब सुबह होने में थोड़ी देर रह गयी, तब कुल्ली कर डाले, तब भी देर करके खाने का सवाब मिल गया और इसका भी वही हुक्म है, जो देर करके खाने का हुक्म है।

मस्अला 5 :- अगर रात को सहरी खाने के लिए आंख न खुली, सब के सब सो गये तो बे-सहरी खाये सुबह का रोज़ा रखो, सहरी छूट जाने से रोज़ा छोड़ देना बड़ी कम-हिम्मती की बात है और बड़ा गुनाह है।

मस्अला 6 :- जब तक सुबह न हो और फज्र का वक़्त न आये, जिसका बयान नमाज़ों के वक़्तों में गुज़र चुका है, तब तक सहरी खाना दुरूस्त है, इसके बाद दुरूस्त नहीं।

मस्अला 7 :- किसी की आंख देर में खुली और यह ख्याल हुआ कि अभी रात बाकी है, इस गुमान पर सहरी खा ली, फिर मालूम हुआ कि सुबह हो जाने के बाद सहरी खायी थी, तो रोज़ा नहीं हुआ, कज़ा रखे और कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं, लेकिन फिर भी कुछ खाये-पिये नहीं, रोजेदारों की तरह रहे। इसी तरह अगर सूरज डूबने के विचार से रोज़ा खोल लिया, फिर सूरज निकल आया, तो रोज़ा जाता रहा। इसकी कज़ा करे, कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं। और अब जब तक सूरज न डूब जाये, कुछ खाना-पीना दुरुस्त नहीं।

मस्अला 8 :- इतनी देर हो गयी कि सुबह हो जाने का शुबहा पड़ गया तो अब खाना मकरूह है और अगर ऐसे वक़्त कुछ खा लिया या पानी पि लिया, तो बुरा किया और गुनाह हुआ। फिर अगर मालूम हो गया कि उस वक़्त सुबह हो गयी थी, तो उस रोज़े की कज़ा रखे और अगर कुछ न मालूम हुआ, शुबहा ही शुबहा रह जाये, तो कज़ा रखना वाजिब नहीं है, लेकिन एहतियात की बात यह है कि उसकी क़ज़ा रख ले।

मस्अला 9 :- मुस्तहब यह है कि जब सूरज यकीनी तौर पर डूब जाये, तो तुरंत रोज़ा खोल डाले, देर करके रोज़ा खोलना मकरुह है।

मस्अला 10 :- बदली के दिन ज़रा देर करके रोज़ा खोले। जब खूब यकीन हो जाये कि सूरज डूब गया होगा, तब इफ़्तार करे। और सिर्फ घड़ी-घड़ियाल वगैरह पर कुछ भरोसा न करो, जब तक कि तुम्हारा दिल न गवाही दे दे। क्योंकि घड़ी शायद कुछ गलत हो गयी हो, बल्कि अगर कोई अंजान भी कह दे, लेकिन अभी वक़्त होने में शुबहा है, तब भी रोज़ा खोलना दुरुस्त नहीं।

मस्अला 11:- छोहारे से रोज़ा खोलना बेहतर है और कोई मीठी चीज़ हो उससे खोलें, वह भी न हो, तो पानी से इफ़्तार करें। कुछ औरतें और कुछ मर्द नमक की कंकरी से इफ़्तार करते हैं और इसमें सवाब समझते हैं यह गलत अकीदा है।

मस्अला 12 :- जब तक सूरज डूबने में शुबहा रहे, इफ्तार करना जायज़ नहीं।

खूबसूरत बयान:नफ़्ल रोज़े का बयान | Nafil Roje ka bayan.

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….

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