हदिया क़ुबूल करने का सुन्नती तरीका
आम तौर पर लोगों की यह आदत होती है कि जब उनको हदिया पेश किया जाए तो वे तकल्लुफ के तौर पर यह कहते हैं कि भाई, इस हदिये की क्या ज़रूरत थी। आपने बेकार तकल्लुफ किया।
लेकिन हमारे हज़रत डा० साहिब रहमतुल्लाहि अलैहि को देखा कि जब हज़रत के बे-तकल्लुफ दोस्तों में से कोई मुहब्बत के साथ उनकी खिदमत में हदिया पेश करता, तो हज़रते वाला तकल्लुफ नहीं फ़रमाते थे, बल्कि उस हदिये की तरफ शौक और रग्बत का इज़्हार फ़रमाते, और यह कहते भाई, तुम तो ऐसी चीज़ ले आए हो जिसकी हमें ज़रूरत थी।
एक बार मैं हज़रते वाला की ख़िदमत में एक कपड़ा ले गया, और मुझे इस बात का तसव्वुर भी नहीं था कि हजरते वाला इस पर इतनी खुशी का इज़्हार फरमायेंगे। चुनांचे जब मैंने वह पेश किया तो हजरते वाला ने फरमाया कि हमें ऐसे कपड़े की ज़रूरत थी। हम तो इसकी तलाश में थे, और फरमाया कि जिस रंग का कपड़ा लाए हो यह रंग तो हमें बहुत पसन्द है। और यह कपड़ा भी बहुत अच्छा है।
बार बार उसकी तारीफ करते और फरमाते थे कि जब एक शख़्स मुहब्बत से हदिया लेकर आया है तो कम से कम इतनी तारीफ तो उसकी करो कि उसकी मुहब्बत की कद्र-दानी हो जाए, और उसका दिल खुश हो जाए कि जो चीज मैंने हदिये में पेश की, वह पसन्द आ गयी, और यह जो हदीस शरीफ में है किः “तहाद्दू तहाब्बू” यानी आपस में हदिया दिया करो, और उसके ज़रिये मुहब्बत में इज़ाफा करो। तो मुहब्बत में इज़ाफे का ज़रिया उस वक़्त होगा जब तुम हदिया वुसूल करके उसके पसन्द होने और मुहब्बत का इज़्हार करो।
बन्दों का शुक्रिया अदा कर दो
एह हदीस में हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः यानी जो शख़्स इन्सानों का शुक्र अदा नहीं करता, वह अल्लाह का भी शुक्र अदा नहीं करता।
(तिरमिजी शरीफ़)
इस से मालूम हुआ कि जो शख़्स भी तुम्हारे साथ मुहब्बत और इख़्लास का मामला करे, और उसके ज़रिये से तुम्हें कोई फायदा पहुंचे तो कम से कम ज़बान से उसका शुक्रिया अदा कर दो, और उसकी तारीफ में दो कलिमे कह दो। यह सुन्नत है, इसलिये कि ये सब हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तालीमात हैं।
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अगर हम इन तरीकों को अपना लें तो देखो कितनी मुहब्बतें पैदा होती हैं, और ताल्लुकात में कितनी खुश्गवारियां पैदा होती हैं। और ये अदावतें और नफ़रतें यह बुग्ज़ और ये सब दुश्मनियां ख़त्म हो जायेंगी। बशर्ते कि इन्सान हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तालीमात पर ठीक ठीक अमल कर ले। अल्लाह तआला हम सब लोगों को अमल की तौफीक अता फरमाये, आमीन।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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