14/03/2026
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नेकी की हौसला अफ़ज़ाई देने की फज़ीलत|Neki ki Hausla Afzaie dene ki fazilat.

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Neki ki Hausla Afzaie dene ki fazilat.
Neki ki Hausla Afzaie dene ki fazilat.

देखिये ! मैं आपको एक मसला समझा दूँ कि जो आदमी किसी दूसरे को नेकी की बात कहता है और दूसरा उसके कहने की वजह से नेकी कर लेता है तो करने वाले को भी सवाब मिलता है कहने वाले को भी सवाब मिलता है।

अब मसला सुनो! हदीस पाक का मफ़्हूम है कि क़ियामत के दिन एक आदमी खड़ा किया जायेगा और उसका आमाल-नामा उसे दिया जायेगा। जब वह अपना आमाल नामा देखेगा तो उस नामा-ए-आमाल में कई हज़ार साल की नमाज़ों का सवाब, कई हज़ार साल के रोज़ों का सवाब और कई हज़ार हज और उमरे करने का सवाब लिखा हुआ होगा।

वह कोई सीधा-सादा आदमी होगा, कोई मेरे जैसा होता तो चुप लगा जाता। मगर वह कोई भला आदमी होगा। सच्चा बन्दा होगा। अल्लाह तआला की बारगाह में अर्ज़ करेगा। ऐ अल्लाह! मेरी तो उम्र ही सौ साल से थोड़ी थी, मैं अगर पूरे साल रोज़े रखता तो भी मेरे रोज़े सौ साल से थोड़े होते, यह तो हज़ार सालों के रोज़े लिखे हुए हैं।

मैं हर साल हज करता तो भी मेरे हज सौ से थोड़े होते, यह तो हज़ारों सालों के हज लिखे हुए हैं। इसी तरह हर दिन में जितनी चाहे नमाज़ें पढ़ता वे सौ साल से थोड़ी नमाज़ें होतीं, मगर यहाँ तो हज़ारों सालों की नमाज़ें लिखी हुई हैं।

ऐ अल्लाह ! यह नामा-ए-आमाल मेरा नहीं है। अल्लाह तआला फ़रमायेंगे, ऐ मेरे बन्दे ! आमाल-नामा तो यह तेरा ही है और तूने एक या दो हज ही किये थे मगर जब लोगों में बैठता था तो लोगों को हज की तर्गीब हौसला अफ़ज़ाई देता था, अच्छे अन्दाज़ से उनको हज करने का शौक दिलाता था। जितने लोग हज करते रहे हम उनका सवाब तेरे नामा-ए-आमाल में भी लिखते रहे।

आपने तो सौ साल से थोड़े रोज़े रखे मगर औरों को आप इस तरफ तवज्जोह दिलाते थे लिहाज़ा जितने लोगों ने रोज़े रखे हमने उनका सवाब आपके नामा-ए-आमाल में भी लिख दिया।

यह कितनी सआदत की बात है कि इनसान की अपनी ज़िन्दगी तो सौ साल से थोड़ी थी लेकिन जब वह फौत हुआ (मर गया) तो क़ियामत के दिन उसके नामा-ए-आमाल में हज़ारों सालों के हज, हज़ारों सालों की नमाज़ें और हज़ारों कुरआन पाक पढ़ने की तिलावत लिखी जायेगी।

इसलिये हर मर्द और औरत को चाहिये कि वह समाज में दूसरों के साथ नेकी की गुफ़्तगू करे ताकि नेकी समाज और माहौल में फैले।

जो औरतें आज बयान में आई हैं बेशक दिलों में यह इरादा कर लें कि आईन्दा फिर कभी ऐसी महफिल हुई तो हम अपनी बहनों को, करीबी रिश्तेदार औरतों को, अपनी सहेलियों को, पड़ोसियों को सबको लेकर आयेंगी। एक-एक औरत अगर दस-दस औरतों को भी दावत देकर ले आये तो इतनी हो जायें कि यह मकान छोटा हो जायेगा।

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सबका सवाब उसको मिलेगा जो उनको लेकर आयेगी। देखो यह सब कुछ नीयत पर निर्भर होता है।

मैं बुनियादी बात यह कर रहा था कि औरत को अगर पता हो कि मुझे किस काम के करते वक़्त क्या नीयत करनी है तो वह बड़ी-बड़ी नेकियाँ कमा सकती है। लेकिन पता नहीं होता।

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….

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