28/01/2026
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एक दिलचस्प मुनाज़रा। Ek dilchasp munajra.

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Ek dilchasp munajra.
Ek dilchasp munajra.

हज़रत अबुअलहज़ील फरमाते हैं के एक यहूदी बसरे में आया। और उसने आम मुतकल्लमीन को बन्द कर दिया। मैंने अपने चचा से कहा। की मैं इस यहूदी से मुनाज़रा करने के लिए जाना चाहता हूँ। चचा ने कहा। बेटा ! वो मुतकल्लमीन बसरा की एक जमात को हरा चुका है। मैंने कहा। की मुझे ज़रूर जाना है। तो चचा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। और हम इस यहूदी के पास पहुँच गए।

तो मैंने उसे इस हाल में पाया। के वो इन लोगों से जो उन से बहस करते थे। अपने सामने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत का इकरार कराता है। फिर हमारे नबी-ए-करीम सललल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करता है। फिर कहता है की हम उस नबी के दीन पर हैं जिसकी नबुव्वत पर मुसलमानों ने भी इत्तिफाक किया। और तुम उस नबी की दीन पर हो। जिसकी नबुब्त पर हम इत्तिफाक नहीं करते।

तो हम इस दीन को क्यों मानें जिसका नबी मुत्तफिक अलैह नहीं है। और उसका इकरार क्यों करें? अब मैं उसके सामने पहुंच गया। मैंने कहा। की मैं तुझ से सवाल करूं या तू मुझ से सवाल करेगा? उसने कहा। बेटा ! क्या तू देखता नहीं के मैंने तेरे बड़ों को गुफ्तगू में बन्द कर रखा है। मैंने कहा। तुम इन बातों को छोड़ो। और इन दो बातों में से एक को इख़्तियार करो। उसने कहा। मैं सवाल करता हूँ। की मूसा अल्लाह के अंबिया में से एक ऐसे नबी नहीं हैं, जिनकी नबुव्वत सही और उनकी नबुव्वत साबित है?

तो उसका इंकार करता है या इकरार? अगर तू इंकार करता है तो अपने नबी की मुखालफत करेगा मैंने उससे कहा। की जो सवाल तू मूसा के बारे में मुझ से कर रहा है। मेरे नज़दीक इसमें दो सूरतें हैं। एक ये के मैं इकरार करता हूँ उस मूसा की नबुव्वत का जिसने हमारे नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की नबुव्वत के सही होने की खबर दी और हम को हुक्म दिया की उनका इत्तिबा करें।

अगर तू उस मूसा के बारे में सवाल कर रहा है। तो मैं उस मूसा अलैहिस्स्लाम की नबुव्वत का इकरार करता हूँ। और अगर तू जिस मूसा के बारे में सवाल कर रहा है वो ऐसा है के हमारे नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नबुव्वत का इकरार नहीं करता और उसने उनके इत्तिबा का हुक्म हमें दिया और ना उसने उनकी आमद की बशारत दी तो मैं उसको नहीं पहचानता। और ना मैं उसकी नबुव्वत का इकरार करता हूँ।

तो मेरे जवाब से वो यहूदी बौखला कर रह गया। फिर उसने कहा तौरात के बारे में तू क्या कहता है। मैंने कहा। तौरात के बारे में भी मेरे नज़दीक दो सूरतें हैं। अगर वही तौरात मुराद है जो उस मूसा पर नाज़िल हुई जिसने हमारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नबुव्वत का इकरार किया था।
तो ये तौरात हक़ है और अगर वो तौरात मुराद है जिसका तू दावा कर रहा है तो झूटी है। और मैं उसकी तसदीक नहीं करूंगा।

फिर उसने कहा। मैं तुझ से अलेहदगी में एक बात कहना चाहता हूँ। जो सिर्फ मेरे और तेरे दरमियान होगी। मैंने खयाल किया के शायद कोई नेक बात हो। मैं उसके करीब हो गया। उसने आहिस्ता आहिस्ता मुझे गालियाँ देना शुरू कीं के तेरी माँ ऐसी और ऐसी है। और जिसने तुझे तालीम दी उसकी माँ ऐसी है। वो गालियों में बजाए कनाया के उरयाँ अलफाज़ इस्तेमाल कर रहा था। दर असल वो कोशिश ये कर रहा था के मैं उस पर हमला कर बैठूं। फिर उसको ये कहने का मौका मिल जाए की मुझ पर हमला कर दिया गया हैं इसलिए मैं जा रहा हूँ।

मगर वो इसमें कामयाब ना हो सका। फिर मैंने हाज़रीने मजलिस से खिताब किया। और मैंने कहा। अल्लाह तुम को इज़्ज़त दे। क्या मैंने उसको जवाब नहीं दिया? सब ने कहा। बेशक। फिर मैंने कहा। क्या इस पर लाज़िम ना था। की मेरे जवाबात को रद करता। सब ने कहा। ज़रूर फिर मैंने कहा। के उसने जब मुझ से सरगोशी की। तो मुझे ऐसी गालियाँ दीं। जिनसे हद वाजिब होती है। और मेरे उस्ताद को भी ऐसी गालियाँ दीं और उसने ये समझा था के मैं ये गालियाँ सुनकर उस पर हमला कर दूंगा।

खूबसूरत वाक़िआ: मुहब्बत और अक़्लमंदी की मिसाल।

फिर उसको ये कहने का मौका मिल जाएगा के हम ने उस पर हमला किया था। अब तुम पहचान चुके हो की ये किस कमाश का शख़्स है। बस फिर तो अवाम के हाथों से उस पर जूते पड़ना शुरू हो गए। और वो भागता हुआ निकला। और वहाँ लोगों के ज़िम्मे उसका बहुत सा कर्ज़ था। उसको भी छोड़ गया। (किताब-उल-अज़किया, सफा 253)

बद मज़हब हमेशा अय्यारी व चालाकी के साथ अपने अकायद बातिला की तशहीर करते हैं। और ऐसे चालाक लोगों के दाव से बचने के लिए बड़ी दानाई और होशियारी दरकार होती है। और ये भी मालूम हुआ के बदअक़ीदगी का पोल आखिर खुल कर ही रहता है।

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….

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