28/01/2026
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बेहतर है बेटी को दीन सिखाएँ। Behtar hai beti ko din sikhayen.

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Behtar hai beti ko din sikhayen.
Behtar hai beti ko din sikhayen.

एक आदमी ने अपनी बेटी की तालीम का कोई ख़्याल न किया यहाँ तक कि उसको खूब माल पैसा दिया, फैशन-पसन्द खूबसूरत लड़की बन गयी। यहाँ तक कि जवानी में उसको मौत आ गयी। उसकी बड़ी तमन्ना थी कि बेटी को कभी ख़्वाब में तो देखूँ मेरी बेटी किस हाल में है।

एक दिन उसने ख़्वाब में देखा कि अपनी बेटी की कब्र पर खड़ा है, अचानक उसकी बेटी की क़ब्र खुल गयी। क्या देखता है कि बेटी बेलिबास (नंगी) पड़ी है। उसने अपने सतर को छुपाया मगर उसकी तो हालत अजीब थी, उसका सर बिल्कुल गंजा है और उसकी शक्ल अजीब। उसने पूछा बेटी तेरा क्या हाल है?

कहने लगी अब्बू मैं बेपर्दा फिरती थी। जब यहाँ कब्र में आई तो मेरे सर को बहुत बड़ा बना दिया गया, पहाड़ों की तरह, मेरा हर-हर बाल बढ़ाकर दरख़्त की तरह बना दिया गया जिसकी शाखें ज़मीन में दूर तक फैली होती हैं। फिर फरिश्ते आये उन्होंने मेरे एक-एक बाल को नोचा और जिस तरह लड़के दरख़्त को खींच लें ज़मीन में गड्ढ़े पड़ जाते हैं, अब्बू एक-एक बाल को नोचने से मेरे सर के अन्दर गड्ढ़े पड़ गये, इसलिए मेरे सर की खाल भी चली गयी, सिर्फ हड्डी है जो आप देख रहे हैं।

उसने कहा बेटी तुम्हारा चेहरा भी नहीं? वह कहने लगी अब्बू आप देख रहे हैं आपको मेरे दाँत नज़र आ रहे हैं होंठ नहीं हैं, इसकी वजह यह है कि मेरे होंठों पर सुर्खी लगी हुई थी और मैं उसी तरह वुजू करके नमाज़ें पढ़ लेती थी। फरिश्ते आये उन्होंने कहा तू तहारत (पाकी) का ख़्याल नहीं करती थी। तेरा गुस्ल भी नहीं होता था, चुनाँचे उन्होंने मेरी सुर्खी को जो खींचा यह सुर्खी चिपक गयी थी, मेरे होंठों से सुर्खी के साथ ऊपर और नीचे के दोनों होंठ भी कट गये इसलिए आपको मेरे बत्तीस दाँत नज़र आ रहे हैं। होंठ ऊपर नहीं हैं।

बाप ने कहा बेटी तेरे हाथों की उंगलियाँ ज़ख़्मी नज़र आती हैं। कहने लगी अब्बू मैं नाखून पालिश लगाया करती थी, फरिश्ते आये, कहने लगे तेरे नाखूनों को हम खींचेंगे। उन्होंने मेरे एक-एक नाखून को खींचा, अब्बू मेरे हाथ पर ज़ख़्म हैं, मेरे चेहरे पर ज़ख़्म हैं, मेरे सर पर ज़ख़्म हैं। मैं बता नहीं सकती आपने मुझे इतनी मुहब्बत दी थी। मैंने जो ख़्वाहिश की, अब्बू आपने पूरी कर दी, मुझे इतनी मुहब्बत दी मैं तो ग़म परेशानो को जानती नहीं थी।

शहज़ादों की तरह आपने पाला। काश! अब्बू आप मुझ पर एक एहसान करते मुझे कुछ दीन की समझ भी बता देते, तो मैं आज इस अज़ाब में गिरफ़्तार न होती। न मैं शौहर को बुला सकती हूँ न मैं आपको पैग़ाम भेज सकती हूँ। मैं अकेली यहाँ पड़ी हूँ फरिश्ते आते हैं हाथों में गुर्ज़ (एक हथियार जो ऊपर से मोटा और गोल होता है और नीचे से पतला होता है) होते हैं मेरी पिटाई करते हैं। अब्बू मेरा दुख बाँटने वाला कोई नहीं।

इसके बाद उसकी आँख खुल गयी तब उसको एहसास हुआ काश कि मैं अपनी बेटी को दीन सिखाता तो मेरी बेटी आगे जाकर जन्नत की नेमतों में पल जाती। तो जिन बेटियों को इतने प्यार मुहब्बत से पालते हैं उनको अगर हम दीनदार नहीं बनायेंगे तो ये जहन्नमी फरिश्तों के हाथों में जायेंगी और इनका बुरा हाल बनेगा।

इसलिए बेहतर यह है कि हम अपनी बेटियों को दीन पढ़ायें दीनदार बनायें, अपनी बेटियों अपनी बीवियों को दीनदार बनायें, औरतों के दीनी मामलात में उनका सहयोग और मदद करें। उनको तवज्जोह दिलायें, उनको दीन की बुनियाद पर ज़िन्दगी का साथी बनायें ताकि माहौल के अन्दर दीनदारी आये।

औरतों को भी चाहिये कि वे खुद भी कोशिश करें। जब वो मर्दों से दुनिया की बातें मनवा लेती हैं तो दीन की बातें क्यों नहीं मनवा सकतीं? मर्दों को चाहिये कि अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करें। औरतों को चाहिये कि वे अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करें ताकि हम नेक बनकर ज़िन्दगी गुज़ारें और अपने रब के फरमाँबरदार बन्दे बन जायें।

खूबसूरत वाक़िआ:-ऐ बहन ! दो दहेजों की तैयारी कर|

अब अपने रब को तन्हाईयों में रो-रोकर मनाने की ज़रूरत है। अपने रब को सज्दे में जाकर मनाना, अपने रब से हाथ उठाकर दुआयें माँगना, दामन फैलाकर दुआयें माँगना। ऐ अल्लाह ! तेरे दर पर एक फकीरनी हाज़िर है तेरी रहमत की तलबगार है। वह परवर्दिगार जो मर्दों को हुक्म देता है कि औरतों के साथ नर्मी से पेश आओ, जब आप दुआयें माँगेगी वह परर्दिगार आपके साथ क्यों नहीं नर्मी फ़रमायेगा?

इसलिए इन वक़्तों को गनीमत समझ लीजिए। अपने गुनाहों को बख़्शवाईये और आईन्दा नेकी की ज़िन्दगी का दिल में इरादा कर लीजिए। अल्लाह तआला हमारे आने वाले वक़्त को गुज़रे वक़्त से बेहतर फरमा दे। आमीन।

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….

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