Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
कुरआन मजीद में कई पिछली क़ौमों के ऐसे वाक़िए बयान किए गए हैं, जिनमें हमारे लिए बहुत बड़ी सीख छिपी हुई है। उन्हीं में से एक है क़ौम-ए-समूद का वाकिया, जो अपनी ताकत, दौलत और शानदार बस्तियों पर बहुत घमंड करती थी।
अल्लाह तआला ने उनकी हिदायत के लिए हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को अपना रसूल बनाकर भेजा। उन्होंने अपनी क़ौम को अल्लाह की इबादत करने, शिर्क से बचने और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करने की नसीहत की। लेकिन क़ौम के बहुत से लोगों ने उनकी बात मानने के बजाय उनका विरोध किया और एक बड़ी निशानी का मुतालबा किया।
फिर अल्लाह की ऊंटनी उनके सामने एक निशानी के तौर पर आई। लेकिन क़ौम-ए-समूद ने इस निशानी के साथ जो सलूक किया, उसके बाद उनका अंजाम बेहद दर्दनाक हुआ।
आइए, इस पूरे वाकिए को आसान और दिलचस्प अंदाज़ में जानते हैं और साथ ही यह भी समझते हैं कि क़ौम-ए-समूद के अंजाम में हमारे लिए कौन-कौन सी बड़ी इबरत छिपी हुई है।
समूद क़ौम
समूद, क़ौम के वही लोग हैं जो पहले आद की हलाकत के बाद हज़रत हुद अलैहिस्सलाम के साथ बच गए थे और उनकी नस्ल आदे सानिया (दुसरी आद) कहलाई। उनको ‘समूदे इरम’ भी कहा गया।
समूद की बस्तियां
समूद की आबादियां हिज्र में थी। हिजाज़ और शाम के दर्मियान वादी कुरा तक जो मैदान नज़र आता है, यह सब उनके रहने की जगह है। समूद की बस्तियों के खंडर और निशान आज तक मौजूद हैं। इनकी ख़ास बात यह है कि इन बस्तियों में मकान पहाड़ों को काट कर बनाए गए थे, गोया समूद तामीरात के मामले में बहुत ज़्यादा माहिर थे।
समूद का ज़माना
समूद के ज़माने के मसले के बारे में कोई तै शुदा बाक़ायदा वक़्त नहीं बताया जा सकता, अलबता यक़ीनी तौर पर कहा जा सकता है कि इनका ज़माना हज़रत इबराहीम अलैहिस्सलाम से पहले का जमाना है।
समूदियों का मज़हब
समूद अपने बुतपरस्त पुरखों की तरह बुतपरस्त थे। वे ख़ुदा के अलावा बहुत से बातिल माबूदों के परस्तार थे और शिर्क में डूबे हुए थे। इसलिए उनकी इस्लाह के लिए भी और उन पर हक़ वाज़ेह करने के लिए भी उन्हीं के क़बीले में से हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को नसीहत करने वाला पैग़म्बर और रसूल बनाकर भेजा, ताकि वह उनको सीधे रास्ते पर लाए, उन पर वाज़ेह करे कि कायनात की हर चीज़ अल्लाह के एक होने और अकेले होने पर गवाह है।
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उन्हें अल्लाह की नेमत याद दिलाए और बताए कि परस्तिश और इबादत के लायक़ एक ज़ात के अलावा दूसरा कोई नहीं है।
कुरआन मजीद में आए क़िस्सों का मतलब
कुरआन मजीद की यह सुन्नत है कि वह इंसानों की हिदायत के लिए पिछली क़ौमों के और उन्हें हिदायत के रास्ते पर लगाने के वाक़िए और हालात बयान करके नसीहतों और वाजों का सामान जुटाता है, ताकि यह मालूम हो सके कि जिन उम्मतों ने उनकी बातों का इंकार किया, और उनका मज़ाक़ उड़ाया और उन्हें झुठलाया, तो अल्लाह तआला ने अपने सच्चे रसूल की तस्दीक़ के लिए कभी अपने आप और कभी क़ौम के मांग करने पर ऐसी निशानियां नाज़िल फ़रमाईं जो नबियों और रसूलों की तस्दीक़ की वजह बनीं और ‘मोजजा’ कहलाईं, लेकिन अगर क़ौम ने इस निशानी और मोजज़ा के बाद भी झुठलाने को न छोड़ा और न दुश्मनी छोड़ी, बल्कि ज़िद पर अड़े रहे, तो फिर ‘अल्लाह के अज़ाब’ ने आकर उनको तबाह व हलाक कर दिया और उनके वाकियों को आने वाली क़ौम के लिए इबरत व नसीहत का सामान बना दिया।
अल्लाह की ऊंटनी
हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम क़ौम को बार-बार समझाते और फ़रमाते रहे, पर क़ौम पर विल्कुल असर न हुआ, बल्कि उसकी दुश्मनी तरक़्क़ी पाती रही और उसका विरोध बढ़ता ही रहा और वह किसी तरह बुतपरस्ती से बाज़ न आई। अगरचे एक छोटी और कमज़ोर जमाअत ने ईमान कुबूल कर लिया और वह मुसलमान हो गई, मगर क़ौम के सरदार और बड़े-बड़े सरमायादार उसी तरह बातिल-परस्ती पर क़ायम रहे और उन्होंने दी हुई हर क़िस्म की नेमतों का शुक्रिया अदा करने के बजाए नाशुक्री का तरीक़ा अपना लिया।
वे हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा करते कि सालेह ! अगर हम बातिल परस्त होते, अल्लाह के सही मज़हब के इंकारी होते और उसके पसंदीदा तरीक़े पर क़ायम न होते, तो आज हमको यह सोने-चांदी की बहुतात, हरे-भरे बाग़ और दूसरी नेमते हासिल न होतीं। तुम खुद को और अपने मानने वालों को देखो और फिर उनकी तंगहाली, और गुर्वत पर नज़र करो और बतलाओ कि अल्लाह के प्यारे और मक्क़्बूल कौन हैं?
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हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम फ़रमाते कि तुम अपने इस ऐश और अमीरी पर शेखी न मारो और अल्लाह के सच्चे रसूल और उसके सच्चे दीन का मज़ाक़ न उड़ाओ, इसलिए अगर तुम्हारे घमंड और दुश्मनी का यही हाल रहा, तो पल में सब कुछ फ़ना हो जाएगा और फिर न तुम रहोगे और न यह तुम्हारा समाज, बेशक ये सब अल्लाह की नेमते हैं, बशर्ते कि इनके हासिल करने वाले उसका शुक्र अदा करें और उसके सामने सरे नियाज़ झंकाएं और बेशक यही अज़ाब व लानत के सामान हैं, अगर इनका इस्तिक़बाल शेख़ी व गुरूर के साथ किया जाए। इसलिए यह समझना ग़लती है कि ऐश का हर सामान अल्लाह की खुश्नूदी का नतीजा है।
समूद को यह हैरानी थी कि यह कैसे मुम्किन है कि हमीं में का एक इंसान अल्लाह का पैग़म्बर बन जाए और वह अल्लाह के हुक्म सुनाने लगे। वे बड़े ताज्जुब से कहते-
तर्जुमा – ‘कि हमारी मौजूदगी में उस पर खुदा की नसीहत उतरती है।'(साद 38 : 8)
यानी अगर ऐसा होना ही था तो इसके अल हम थे, न कि सालेह और कभी अपनी क़ौम के कमज़ोर लोगों जो कि मुसलमान हो गए थे को ख़िताब करके कहते-,
तर्जुमा – ‘क्या तुमको यक़ीन है कि बिला शुबहा सालेह अपने परवरदिगार का रसूल है?'(अल-आराफ़ 7 : 59)
और मुसलमान जवाब देते-
तर्जुमा- ‘बेशक्त हम तो इसके लाए हुए पैग़ाम पर ईमान रखते हैं।’ (अल-आराफ़ 9 : 75)Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
तब ये क़ौम के इंकार करने वाले (समूद क़ौम गुस्से में कहते :
तर्जुमा – ‘बेशक हम तो उस चीज़ का जिस पर तुम्हारा ईमान है, इंकार करते है।’ (अल-आराफ़ 7 : 7)
वहरहाल हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की मग़रूर व सरकश क़ौम ने उनकी पैग़म्बराना दावत व नसीहत को मानने से इंकार किया और अल्लाह के निशान (मोजज़े) का मुतालबा किया, तब सालेह अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के दरबार में दुआ की और कुबूलियत के बाद अपनी क़ौम से फ़रमाया कि तुम्हारा मत्लूब निशान ऊंटनी की शक्ल में यहां मौजूद है। देखो, अगर तुमने इसको तकलीफ़ पहुंचायी तो फिर यही हलाकत का सामान साबित होगा और अल्लाह ने तुम्हारे और उसके दर्मियान पानी के बारी तै कर दी है। एक दिन तुम्हारा है और एक दिन इसका, इसलिए इसमें फ़र्क़ न आए।
कुरआन मजीद ने इसे ‘नाकतुल्लाह’ (अल्लाह की ऊंटनी) कहा है, ताकि यह बात नज़रों में रहे कि यूं तो तमाम मख़लूक़ अल्लाह ही की मिल्कियत है, मगर समूद ने चूंकि उनको ख़ुदा की एक निशानी की शक्ल में तलब किया था, इसलिए उसको मौजूदा खुसूसियत ने उसको ‘अल्लाह की निशानी’ का लकब दिलाया, साथ ही उसको ‘लकुम आयातिही’ (तुम्हारे लिए निशानी) कहकर यह भी बताया कि यह निशानी अपने भीतर ख़ास अहमियत रखती है,
लेकिन बदक़िस्मत क़ौम समूद ज़्यादा देर तक इसको बरदाश्त न कर सकी और एक दिन साज़िश करके ऊंटनी को हलाक कर डाला। हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को जब यह मालूम हुआ तो आंखों में आंसू लाकर फ़रमाने लगे, बदबख़्त क़ौम ! आख़िर तुझसे सब्र न हो सका। अब अल्लाह के अज़ाब का इंतज़ार कर। तीन दिन के बाद न टलने वाला अज़ाब आएगा और तुम सबको हमेशा के लिए तहस-नहस कर दिया जाएगा।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
समूद पर अज़ाब
समूद पर अज़ाव आने की निशानियां अगली सुबह से ही शुरू हो गईं, यानी पहले दिन इन सबके चेहरे इस तरह पीले पड़ गए जैसा कि हर शुरूआती हालत में हो जाया करता है और दूसरे दिन सबके चेहरे लाल थे, गोया ख़ौफ़-दहशत का यह दूसरा दर्जा था और तीसरे दिन इन सबके चेहरे स्याह थे और अंधेरा छाया हुआ था। यह ख़ौफ़ व दहशत का वह तीसरा दर्जा है जिसके वाद मौत का दर्जा रह जाता है।
बहरहाल इन तीन दिनों के वाद वायदा किया गया वक़्त आ पहुंचा और रात के वक़्त एक हैबतनाक आवाज़ ने हर आदमी को उसी हालत में हलाक कर दिया, जिस हालत में वह था। कुरआन मजीद ने हलाक कर देने वाली आवाज़ को किसी जगह साईक़ा (कड़कदार बिजली) और किसी जगह रजफ़ा (ज़लज़ला डाल देने वाली चीज़), किसी जगह ताग़िया (दहशतनाक) और कहीं सैहा (चीख) फ़रमाया।
एक तरफ समूद पर यह अज़ाब आया और उनकी बस्तियों को तबाह व बर्बाद करके सरकशों की सरकशी और घमंडियों का अंजाम ज़ाहिर हुआ, जबकि दूसरी ओर हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम और उनकी पैरवी करने वाले मुसलमानों को अल्लाह ने अपनी हिफ़ाज़त में ले लिया और उनको इस अज़ाब से महफूज़ रखा।
कुछ इबरतें
अल्लाह की सुन्नत यही रही है (मगर अल्लाह की इस सुन्नत से नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहिस्सलाम की रिसालत का पैग़ाम अलग है। इसलिए कि आपने साफ़ कहा है कि मैंने अल्लाह से दुआ मांगी कि वह मेरी उम्मत (उम्मते दावत हो या उम्मते इजाबत) में अज़ाब मुसल्लत न फ़रमाए और अल्लाह तआला ने मेरी दुआ कुबूल फ़रमा ली।) कुरआन मजीद ने इसकी तस्दीक़ इस तरह की है-
तर्जुमा- ‘ऐ रसूल ! इस हाल में कि तू उनमें मौजूद है अल्लाह तआला (इन काफ़िरों) पर आम अज़ाब मुसल्लत न करेगा।’ (अल-अंफ़ाल : 33)Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
लेकिन जो क़ौम अपने नबी से इस वायदे पर निशान तलब करे कि अगर उनका मतलूब निशान ज़ाहिर हो गया, तो वे ज़रूर ईमान लाएंगे, फिर वे ईमान न लाए तो उस क़ौम की हलाकत यक़ीनी हो जाती है। अल्लाह तआला उसको माफ़ नहीं करता, जब तक कि वह तौबा न कर ले और अल्लाह के दीन को कुबूल न कर ले या अल्लाह के अज़ाब से सफ़्हा-ए-हस्ती से मिटकर दूसरों के लिए इबरत का सबब न बन जाए।
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यह मोहलिक ग़लती और नफ़्स का धोखा है कि इंसान खुशऐशी. रफ़ाहियत और दुन्यिावी जाह व जलाल देखकर यह समझ बैठे कि जिस क़ौम या फ़र्द के पास यह सब कुछ मौजूद है, वह ज़रूर अल्लाह तआला के साए में है और उनकी खुशऐशी अल्लाह की ख़ुशनूदी की निशानी है।
❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1: क़ौम-ए-समूद कौन थी?
जवाब: क़ौम-ए-समूद एक प्राचीन क़ौम थी, जिसके बीच अल्लाह तआला ने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को अपना रसूल बनाकर भेजा था।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 2: हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को किस क़ौम की तरफ भेजा गया था?
जवाब: हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को क़ौम-ए-समूद की हिदायत के लिए भेजा गया था। उन्होंने अपनी क़ौम को सिर्फ अल्लाह की इबादत करने और शिर्क से बचने की दावत दी।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 3: अल्लाह की ऊंटनी का क्या वाकिया था?
जवाब: क़ौम-ए-समूद ने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम से निशानी मांगी थी। अल्लाह तआला ने उनके लिए ऊंटनी को एक निशानी बनाया और उन्हें उसे नुकसान न पहुंचाने की हिदायत दी।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 4: क़ौम-ए-समूद ने अल्लाह की ऊंटनी के साथ क्या किया?
जवाब: क़ौम के सरकश लोगों ने अल्लाह की निशानी समझाई गई ऊंटनी को मार डाला और हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की नसीहत को ठुकरा दिया।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 5: क़ौम-ए-समूद पर अज़ाब क्यों आया?
जवाब: उन्होंने अल्लाह की निशानियों को झुठलाया, अपने रसूल की नाफरमानी की और सरकशी पर कायम रहे। आखिरकार उन पर अल्लाह का अज़ाब आया।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 6: क़ौम-ए-समूद का अंजाम क्या हुआ?
जवाब: कुरआन के मुताबिक़ एक भयानक आवाज़ और अज़ाब के जरिए सरकश लोगों को हलाक कर दिया गया, जबकि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम और ईमान लाने वालों को अल्लाह ने बचा लिया।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 7: क़ौम-ए-समूद के वाकिए से हमें क्या सीख मिलती है?
जवाब: हमें घमंड, सरकशी और नाफरमानी से बचना चाहिए। दौलत और दुनिया की खुशहाली को हमेशा अल्लाह की खुशी की निशानी नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसकी नेमतों का शुक्र अदा करना चाहिए।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 8: क्या क़ौम-ए-समूद की बस्तियों के निशान आज भी मौजूद हैं?
जवाब: हिज्र/अल-हिज्र क्षेत्र में प्राचीन चट्टानों को काटकर बनाए गए मकान और पुरातात्विक अवशेष आज भी मौजूद हैं, जिन्हें इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता से जोड़ा जाता है।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
सवाल 9: कुरआन में क़ौम-ए-समूद का वाकिया क्यों बयान किया गया है?
जवाब: इन वाक़िआत का मकसद इंसानों को इबरत और नसीहत दिलाना है, ताकि हम पिछली क़ौमों की गलतियों से सबक लें और अल्लाह की नाफरमानी से बचें।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Qaum-e-Samood ka Dardnaak Anjaam
जज़ाकल्लाह खैर….
